पुनर्वसु नक्षत्र परिचय || Introduction of Punarvasu Nakshatra in Hindi
वर्तमान भारतीय ज्योतिष में ‘पुनर्वसु नक्षत्र’ क्रम से 7वां नक्षत्र हैं। भचक्र में 80° अंश से लेकर 93° अंश 20′ कला तक का विस्तार क्षेत्र ‘पुनर्वसु नक्षत्र’ हैं। पाश्चात्य ज्योतिष में इसे ‘जेमिनोरम (Geminorum)’ अथवा ‘जेमिनोरम’ तारामंडल के मुख्य दो तारों ‘कैस्टर (Castor) और पोलक्स (Pollux)’ के नाम पर इसे ‘(Castor & Pollux)’ भी कहा जाता हैं। अरेबिक नक्षत्र प्रणाली (Manzil Al-Qamar) में इसे ‘अल-धिरा (Al-Dhira), चाइनीज सियु में इसे ‘जिंग’ (Jǐng Xiù) कहा जाता हैं; जो चाइनीज चन्द्र भवन के प्रमुख 4 वर्गीकरण में से, ‘दक्षिण लाल पक्षी’ (Vermilion Bird of the South) के अंतर्गत आता हैं। इसका अर्थ ‘कुआंँ’ (Well) या जलस्रोत हैं। ‘पुनर्वसु’ शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘पुनः’ और ‘वसु’। ‘पुन:’ का अर्थ, ‘दुबारा’ से वा ‘पुनरावृत्ति’ से हैं; और ‘वसु’ का अर्थ ‘बसना / निवास करना’ हैं। अर्थात ‘पुनर्वसु’ का शाब्दिक अर्थ हुआ— पुनर्स्थापन / पुन: प्रतिष्ठित होना / दुबारा बसना आदि। अतः इस नक्षत्र में नवीनीकरण (Rejuvenation), पुनर्प्राप्ति (Recovery), और नए सिरे से शुरुआत की शक्ति हैं। ‘वसु’ के अन्य अर्थ — उत्कृष्ट, अच्छा, मधुर, लाभकारी, धन, संपत्ति, वैभव, प्रकाश की किरण, चमक व तेज भी हैं। वैदिक 33 कोटि (प्रकार / श्रेणी) के देवताओं में 8 वसुओं का उल्लेख मिलता हैं। ‘वसु’ का एक तात्पर्य यह भी हैं।
मिथुन राशि में सर्वाधिक चमकीले 2 तारें ‘कैस्टर (Castor) और पोलक्स (Pollux)’ हीं पुनर्वसु नक्षत्र में मुख्य तारें माने गये हैं। कुछ स्रोतों में “पुनर्वसु चतुष्टयं गृहाकारं” अर्थात पुनर्वसु नक्षत्र में 4 तारें गृह / घर की आकृति बनाते हैं; ऐसा कहा गया हैं। कुछ स्रोतों में इसे तरकश वा धनुष-तरकश अथवा नमस्कार मुद्रा में जोड़े गए हाथ की आकृति का भी माना गया हैं। किन्तु आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र में 6 या 7 तारें माने है। अकेले कैस्टर (Castor) — 3 जोड़ी अर्थात 6 तारों का समुह हैं, जो नंगी आँखों से एक तारा दिखता है। पोलक्स (Pollux) — मुख्य रूप से एक single giant star (हालाँकि यह भी binary हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से अभीतक एक ही प्रमुख है।)
अतः मिथुन राशि अंतर्गत 20° अंश से लेकर कर्क राशि अंतर्गत 03° अंश 20′ कला तक का विस्तार क्षेत्र ‘पुनर्वसु नक्षत्र’ है। इस नक्षत्र का स्वामी – गुरु, अधिष्ठाता देवता – देवमाता देवी अदिति, जाति – वैश्य, योनि – मार्जार / बिलार, योनिवैर – मूषक / चूहा, देवगण, आद्य नाड़ी, सत्तोगुणी, भयकारक, शुभ, सात्विक, पुरुष नक्षत्र हैं। यह उत्तर दिशा का स्वामी हैं। यह चर / चल वा चंचल, तिर्यकमुखी, सुलोचन नक्षत्र हैं।
चूंकि पुनर्वसु नक्षत्र को “Star of Renewal” कहा जाता है। इसलिए इसमें नए आरम्भ, परिवर्तन, पुनर्निर्माण और विस्तार से जुड़े कार्य विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। अतः पुनर्वसु नक्षत्र में घर खरीदना, नया घर बनाना या निर्माण शुरू करना (नींव डालना), घर/भवन में प्रवेश, मरम्मत या रेनोवेशन, गाँव या बस्ती बसाना, पुराने काम को फिर से शुरू करना, प्रोजेक्ट्स को री-लॉन्च करना, नई योजनाओं की शुरुआत, लंबी यात्रा, तीर्थ यात्रा, विदेश यात्रा, एक्सप्लोरेशन, पर्यटन से जुड़े कार्य, शिक्षा शुरू करना, नया कोर्स/पाठ्यक्रम आरंभ करना, अध्ययन, लेखन, शिक्षण, दर्शनशास्त्र या आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना, विवाह, रिश्तों की नई शुरुआत, सुलह या संबंधों का नवीनीकरण, बागवानी, पेड़ लगाना, कृषि कार्य, बाग-बगीचे से संबंधित काम, चिकित्सा शुरू करना, हीलिंग, रिकवरी से जुड़े कार्य, स्वास्थ्य सुधार, वेदी/अल्टर स्थापना, ध्यान, मंत्र जप, आध्यात्मिक साधना, नया वाहन खरीदना, वाहन बदलना, परिवहन से जुड़े कार्य, बच्चों की देखभाल, दान-पुण्य, होटल/रेस्तरां/हॉस्पिटैलिटी से जुड़े नए काम शुरू करना, व्यापार में विस्तार (कुछ सीमाओं के साथ) आदि कार्य पुनर्वसु नक्षत्र में सिद्ध होते हैं।
यह पुनर्वसु नक्षत्र — विजय, पुनर्स्थापना, नवनिर्माण, वापसी, करुणा, दया, धर्मनिरपेक्षता, सहृदयता आदि का प्रतीक हैं।
8 वसुओं (अष्ट वसुओं) के नाम || Names of 8 Vasus (Ashta Vasus)
महाभारत के आदिपर्व में अष्ट वसुओं के नाम इस प्रकार हैं —
“धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥”
अर्थात धरा (पृथ्वी), ध्रुव, सोम, अह (दिन), अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास — ये आठ वसु कहे गये हैं।ये आठों प्रकृति के मूल तत्वों — पृथ्वी, ध्रुव तारा, चंद्रमा, दिन, वायु, अग्नि, प्रभात / भोर और सूर्य का प्रकाश, तेज चमक, दीप्ति — ये सभी स्थिरता, आकाश, ऊर्जा, नवप्रभात व तेजस्विता के प्रतीक हैं।
विष्णु पुराण / हरिवंश पुराण / स्कंद पुराण में अष्ट वसुओं के नाम थोड़ी भिन्नता के साथ इस प्रकार हैं—
“आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरोऽनिल अनलस्तथा।
प्रत्यूषः प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥”
अर्थात
आप (अप्) — जल
ध्रुव — ध्रुव तारा / स्थिरता
सोम — चंद्रमा
धरा (धर) — पृथ्वी
अनिल — वायु
अनल — अग्नि
प्रत्यूष (प्रत्युष) — प्रभात / सूर्य का प्रारंभिक प्रकाश
प्रभास — आकाश / भोर / चमक
ये 8 ‘वसु’ कहे गये हैं। इसमें आप (जल) को अह के स्थान पर लिया गया है। महाभारत का श्लोक सबसे प्रामाणिक माना जाता है क्योंकि पितामह भीष्म स्वयं अष्ट वसुओं में से एक (द्यौ/प्रभास) के अवतार हैं।

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ज्योतिषीय संकेतात्मक विवरण || Symbolic Description of Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र का देवता वा अधिष्ठात्री देवी — (Mother of the Gods) देवमाता अदिति हैं। ‘अदिति’ नाम का शाब्दिक “अ” (निषेध) + “दिति” (बंधन या सीमा)। अर्थात असीम, अनंत, बंधनरहित, असीमित, अखंड। अतः देवी अदिति— अनंत आकाश, असीम स्थान, सार्वभौम मातृत्व और नवीकरण (renewal) का प्रतीक हैं।
ऋग्वेद में अदिति का उल्लेख 250 बार से अधिक मिलता है। वे देवताओं की जननी, रक्षक और यज्ञ की संरक्षक के रूप में वर्णित हैं। एक महत्वपूर्ण श्लोक मिलता हैं कि—
“अदि॑तिर्द्यौरदि॑तिरन्तरि॑क्षमदि॑तिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिजातमदितिजनित्वम् ॥” (ऋग्वेद 1.89.10)
अर्थात अदिति ही द्यौ (आकाश) है, अदिति ही अंतरिक्ष है, अदिति ही माता है, अदिति ही पिता है, अदिति ही पुत्र है। विश्व के सभी देवता अदिति हैं, पाँच जन (पञ्च देव) अदिति हैं, जो जन्मा है वह अदिति है, और जो जन्म देगी वह भी अदिति है।यह श्लोक अदिति को सर्वव्यापी, अखंड चेतना और समस्त सृष्टि का मूल बताता है।
अदिति का — ‘दक्ष प्रजापति’ की पुत्री व ऋषि कश्यप की पत्नी के रुप में आख्यान प्राप्त होता है। ऋषि कश्यप से ये 12 आदित्यों की माता बनीं। विष्णु पुराण के अनुसार ये 12 आदित्य इस प्रकार हैं —
“विष्णु: शक्रश्च आर्यम्णा धाता त्वष्टा तथैव च।
पूषा विवस्वान् सविता मित्रो वरुण एव च॥
अंशुमान् भगश्चैव द्वादशैते महाबलाः।
आदित्या इति विख्याताः कश्यपाददितेः सुताः॥”
अर्थात विष्णु, शक्र (इन्द्र), आर्यमन्, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मित्र, वरुण, अंशुमान् और भग — ये बारह महाबली आदित्य कहलाते हैं, जो कश्यप और अदिति के पुत्र हैं।
महाभारत के अनुसार 12 आदित्य इस प्रकार हैं —
“इन्द्रो धाता च पर्जन्यस्त्वष्टा पूषा तथा अर्यमा।
भगो विवस्वान् विष्णुश्च अंशुमान् वरुणो मित्रः॥”
अर्थात इन्द्र (शक्र), धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, विष्णु, अंशुमान्, वरुण, और मित्र — 12 आदित्य हैं। देवी अदिति के पुत्र होंने से हीं इनका नाम ‘आदित्य’ हैं।
विष्णु पुराण व भागवत् पुराण के अनुसार श्रीहरि विष्णु के वामन अवतार की माता देवी अदिति थी। ऋग्वेद में अदिति को ‘पृथ्वी व गौ (गाय)’ भी कहा गया हैं। जो अमृतत्व और पोषण का प्रतीक है।
वे यज्ञ की रक्षा, पापमुक्ति, समृद्धि, संतान, पशु-धन और स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र का अर्थ “फिर से समृद्धि/प्रकाश की वापसी” है, जो अदिति के अनंत मातृत्व, दयालुता, तेजस्विता, समृद्धि, पुनर्निर्माण, क्षमा और नवीकरण के गुणों से मेल खाता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के स्वामी गुरु से यह नक्षत्र उच्च शिक्षा, दर्शन, शिक्षण, मार्गदर्शन, आध्यात्मिक खोज का पोषक हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र की मूल विशेषताएँ || Basic Characteristics of Punarvasu Nakshatra
वराह मिहिर का कथन हैं कि— सत्य भाषण करने वाले, दानी, शौचयुत (शुद्ध), दूसरे के धनादि का लोभ नहीं करने वाले, क्लेश सहने वाला, कुलीन, सुन्दर, बुद्धिमान, अच्छे स्वभाव वाला, विनम्र, संयमी, इन्द्रिय-निग्रह करने वाला, आत्मसंयम रखने वाला, यशस्वी, घनी, उत्तम धान्य, धीमा समझने वाला, रोगों को भोगने वाला, बार-बार बीमार पड़ने वाला, प्यासा रहने वाला, अधिक प्यास लगने वाला, तृष्णा से पीड़ित, थोड़े लाभ में ही संतुष्ट रहने वाला, सुखी, वणिक्, सेवक, शिल्पी – ये सब पुनर्वसु नक्षत्रगत पदार्थ हैं।
आचार्य रामदीन दैवज्ञ का कथन हैं कि— जौ, गेहूँ, धान्य, गन्ना, वन, मन्त्री, राजा, जल-जीवी, सज्जन और यज्ञ ज्ञाता – ये पुष्य नक्षत्र के आश्रित पदार्थ हैं। यह 2 तारों के योग से दो सूर्य के गोलाई के स्वरूप वाला, अदिति देवता वाला है। वात्स्यायनी गोत्र वाला हैं। इसमें मंत्र ग्रहण, समस्त शुभ व मांगलिक कार्य, चिकित्सा, इन्द्राणी की स्थापना, इन्द्र के स्थान संबंधित कार्य करना चाहिए। इसमें बुद्धिमान का जन्म होता हैं।
वशिष्ठ संहिता का कथन हैं कि —
“शान्तिक पौष्टिकयात्रा व्रतप्रतिष्ठानृपावाद्यखिलम् ।
भूषणवास्तु-विधानं वाह्नकृषिकर्म सप्तमे धिष्ण्ये॥”
अर्थात शान्तिकर्म, पौष्टिक कर्म, यात्रा, व्रत, प्रतिष्ठा, राज-कार्य यथा तर्क-वितर्क व नीति नियमों पर मंथन, भूषण (आभूषण) बनवाना या धारण करना, वास्तु-विधान (घर, भवन या स्थापत्य निर्माण), वाहन निर्माण तथा कृषि कर्म — ये सभी कार्य सप्तम नक्षत्र (पुनर्वसु) में शुभ होते हैं।”
अर्थात ज्ञान, विस्तार, समृद्धि, आध्यात्मिकता, शुभता, लक्ष्य भेदने और पुनर्निर्माण की शक्ति, स्वतंत्रता, संवेदनशीलता, विनम्र, शांत, धैर्यवान, संतोषी, सदाचारी, सत्यवादी, दानी, न्यायप्रिय, बुद्धिमान, अच्छी स्मरण शक्ति वाले, धीमी गति से समझने वाले, धार्मिकता, परोपकार, आशावादी विचार, क्षमाशीलता, मिलनसार, कभी-कभी अति सरल या भौतिक सुखों से दूर, तरल पदार्थ, घर-आश्रय, वाहन, शिक्षा संबंधी वस्तुएँ, आश्रम, स्कूल, विद्यालय, यूनिवर्सिटी, शैक्षणिक संस्थान, घी, चने की दाल, लड्डू आदि खाद्य पदार्थ, उंगलियाँ, नाक, श्वसन तंत्र, फेफड़े, छाती, पेट, अग्नाशय, जिगर, वक्ष क्षेत्र, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, कफ-कास, फेफड़ों की समस्या, टीबी, कान में दर्द, सूजन, घेंघा (Goitre), रक्त विकार, कमर/सिरदर्द, ज्वर, पाचन संबंधी (अम्लपित्त, अनियमित भूख) बिमारियाँ, पीलिया, हृदय की बाहरी झिल्ली में सूजन, जलशोथ, बेरी-बेरी, लीवर/पेट की समस्याएँ, यात्रा, भ्रमण, तीर्थयात्रा, नई शुरुआत (रिश्ते, परियोजना, व्यवसाय, घर/वाहन खरीदना, कल्पना, नवाचार, रचनात्मक कार्य, माता/मातृ देवी (अदिति, दुर्गा, लक्ष्मी आदि) की पूजा, गृह स्थापना, वेदी/अल्टर स्थापना, कृषि, बागवानी, बच्चों का पालन-पोषण, ध्यान/आध्यात्मिक साधना, चिकित्सा शुरू करना, प्रयोग, सुधार संबंधी कार्य पुनर्वसु नक्षत्र की विशेषताएंँ हैं। व बांँस, पुनर्नवा, दूधी की जड़, नीम, एलोवेरा, बबूल, वासक आदि वनस्पतियांँ पुनर्वसु नक्षत्रगत पदार्थ हैं।
लग्न में पुनर्वसु नक्षत्र के फल || Result of Punarvasu Nakshatra in Ascendant / Lagna
यदि लग्न में पुनर्वसु नक्षत्र हो तो जातक सामान्य शारीरिक सौष्ठव वाला, शांत, धीर-गंभीर, विनम्र, परोपकारी, दयालु, संतुष्ट, मैत्रीपूर्ण स्वभाव वाला, जीवदया करने वाला, पराक्रम से अभावों को नष्ट करने वाला, समदर्शी, चुनौतियों को स्वीकार करने वाला, आध्यात्मिक, बार-बार के प्रयासों से अप्राप्य को भी प्राप्त करने वाला, स्वादिष्ट भोजन का प्रेमी, इन्द्रिय सुखों पर विजयी, व्रत-उपवास करने वाला, चरित्रवान्, अपनी शर्तों पर क्रय-विक्रय, व्यापार-व्यवसाय करके लाभी, आत्मप्रशंसा करने वाला, अचल संपत्तियों से युक्त, क्षमाशील, आदर्शवादी बौद्धिक क्षमता वाला, भावनात्मक रुप से प्रबल, वादे का पक्का, भावुक व हास्य-व्यंग्य लिखने-पढ़ने वाला, स्वतंत्र विचारक, अभिनय कला में निपुण, व्यवसाय करने मे विशेष कुशल, घर-परिवार के प्रति ईमानदार, समाज में आदरणीय होता हैं। जीवन भयंकर उतार-चढ़ाव दिखाती हैं। शुन्य से शिखर तक जाने की क्षमता वाला होता है। जठराग्नि की प्रबलता से तृष्णा विशेष होती हैं। प्यासा हीं रहता हैं; अतः पेय पदार्थ दूध, दही, छांछ (मट्ठा), शरबत, फलों का रस, पानी व तरल पदार्थों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता। वियोग, तलाक अथवा जीवनसाथी के अरिष्ट के योग बनते हैं। संतान प्राप्ति में विलंब होता हैं। शुभाशुभ ग्रहों की युति-दृष्टि से शुभता-अशुभता में कमी-वृद्धि हो सकती हैं।
पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न पुरुष जातक के गुण-दोष || Qualities of Male Chart/ Horoscope born in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न पुरुष जातक मध्यम आकारी, सुन्दर शारीरिक सौष्ठव वाला, बुद्धिमान, आस्तिक, धर्म-कर्म में अनुरक्त, संस्कृति व परंपराओं का रक्षक, अवैधानिक कार्यों का धुर-विरोधी, अन्याय के विरुद्ध प्रचण्ड क्रोधी, दयालु, शरण में आये की रक्षा करने वाला, समस्त जीवों के विपत्तियों में सहायक, दानशील, सादगीपूर्ण जीवन जीने वाला, प्रायः सभी विषयों का ज्ञाता, शिक्षा, अध्ययन-अध्यापन, अभिनय, चिकित्सा, लेखन कार्य, ज्योतिष, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा, नवाचार, राजकार्य, कुटनीति आदि क्षेत्रों में सफल होता हैं। सामान्य शारीरिक सुंदरता होने के बावजूद भी अनेक सुन्दरियों का प्रिय होता हैं, किन्तु वैवाहिक जीवन असंतोषपूर्ण होता हैं। संतान प्राप्ति में भी समस्या आती है अथवा विलंब होता है।
पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न स्त्री जातिका के गुण-दोष || Qualities of Female Chart/ Horoscope born in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न स्त्री जातक मध्यम कद-काठी वाली, चौड़ा गोल मुखाकृति वाली, गौरवर्णी, घुंघराले बालों वाली, लम्बी बड़ी आँखों वाली, उन्नत नाक व ललाट, गोल उन्नत वक्षस्थल, थुलथुले शरीर वाली, मधुरभाषिणी, उत्तम बुद्धिमत्ता वाली, ललित-कला प्रेमी, नृत्य-संगीत में रुचिवान्, धार्मिक वृत्तियों वाली, पाक कला निपुण, अल्प ईर्ष्यालु, वाद-विवाद करने वाली, निकट संबंधियों व परिजनों से मतभेद वाली, कफ जनित (सर्दी से होने वाली) बिमारियों से पीड़ित होती हैं। संतान देरी से होती हैं, किन्तु दिव्य संतान की जननी होती हैं। सादगीपूर्ण व्यवहार के कारण प्रेम-संबंधों में धोखा खाने वाली होती हैं। टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट, फाइनेंस, आध्यात्म व शिक्षण संबंधी कार्य-व्यवसाय में सफल होती हैं।
प्रत्येक चरणों / पदों के फलों में सूक्ष्म विविधता || Punarvasu Nakshatra Subtel Result Variations in all 4 Charan (Padas)
पुनर्वसु नक्षत्र प्रथम चरण (Punarvasu Nakshatra First Charan/ Padas) : मिथुन राशि अंतर्गत 20° अंश से लेकर 23° अंश 20′ कला तक का विस्तार क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र का प्रथम चरण होता हैं। नवमांश मेष होने से इस चरण का स्वामी मंगल हैं। अतः पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण पर बुध-गुरु-मंगल का संयुक्त प्रभाव हैं। कुशल बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय, आध्यात्मिक मार्ग, सत्यनिष्ठा, साहसिक कार्य, द्रुत गति, सहायक मैत्रीपूर्ण संबंध, गुढ़ दर्शन, साहसिक यात्राएँ, रचनात्मक नवाचार, मज़ाकिया स्वभाव, शिक्षा और कला में निपुण, तेज सोच वाले, वाक्-चातुर्य से युक्त, ताम्र वर्ण (coppery complexion), उन्नत नेत्र, तीक्ष्ण दृष्टि, विशाल वक्षस्थल इस चरण के मूल गुण हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक अपने कार्य में कुशल, जल्दीबाज़, रचनात्मक, पुरुषोचित गुणों वाला, अधिक विपरीत लिंगी मित्रों वाला, धनार्जन करने में निपुण, कुशल आज्ञाकारी संतति वाला, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला, ख्यातिप्राप्त होता हैं। ये सेना, पुलिस, खेल, इंजीनियरिंग, प्रशासन, तकनीकी क्षेत्र (technocrats), नवाचार, आविष्कार, होटल, रियल एस्टेट (revival/renewal), यात्रा, कोचिंग, लेखन, शिक्षण, साहसिक कार्यों में सफलता प्राप्त करते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र द्वितीय चरण (Punarvasu Nakshatra Second Charan/ Padas) : मिथुन राशि अंतर्गत 23° अंश 20′ कला से लेकर 26° अंश 40′ कला तक का विस्तार क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र का द्वितीय चरण होता है। नवमाश वृषभ होने से इस चरण का स्वामी शुक्र हैं। अतः पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण पर बुध-गुरु-शुक्र का संयुक्त प्रभाव हैं। भौतिक सुख और स्थिरता, जीवन में आराम, संपत्ति संग्रह, सुखमय जीवन शैली, सुरक्षा, स्थायित्व, मधुर भाषी और संचार कुशल, लेखन, शिक्षण, वार्तालाप में कुशलता, व्यावहारिकता, संपत्ति संग्राहक गुण, कलात्मकता, रचनात्मकता, मनस्विता, विचारशीलता, व्यापारिक योग्यता इस चरण के मुख्य गुण हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में उत्पन्न जातक मोटा थुलथुले शरीर वाला, गेहूंआ या सांवले रंग का, लम्बी मछली जैसी आँखों वाला, विचारवान्, मधुरभाषी, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, कला, सौंदर्य, संगीत, फैशन, भोजन, होटल, पर्यटन, आयात-निर्यात, रियल एस्टेट आदि क्षेत्रों में रुचिवान्, भौतिकतावादी, शास्त्रज्ञ, आध्यात्मिक व तंत्र-मंत्र संबंधित विषयों के गुढ़ रहस्योद्घाटन में रुचि रखने वाला होता हैं। समय के अभाव के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेशपूर्ण स्थिति बनती हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र तृतीय चरण (Punarvasu Nakshatra Third Charan/ Padas) : मिथुन राशि अंतर्गत 26° अंश 40′ कला से लेकर 30° अंश तक का विस्तार क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र का तृतीय चरण हैं। नवमांश मिथुन होने से यह वर्गोत्तम नवमांश हैं। पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण का स्वामी बुध हैं। अतः पुनर्वसु के तृतीय चरण पर बुध-गुरु-बुध का संयुक्त प्रभाव हैं। अत्यधिक बुद्धिमत्ता, रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, अद्वितीय संचार क्षमता, व्यावसायिक शोध, ज्ञान के प्रति विशेष झुकाव इस चरण का प्रमुख गुण हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में उत्पन्न जातक आकर्षक शारीरिक सौष्ठव वाला, गौरवर्णी, श्वेत क्षील सी सजल आँखें, तेज बुद्धि, तेज ग्रहण शक्ति, गहरी सोच और विश्लेषण क्षमता वाला, मेधावी, विज्ञान, गणित, साहित्य और तकनीकी क्षेत्रों में विशेष रुचि वाला, मजबूत कल्पना शक्ति, नवाचार, अविष्कार, वैज्ञानिक सोच वाला, उत्कृष्ट वक्ता, लेखक, संचार विशेषज्ञ। वार्तालाप, लेखन, मीडिया, शिक्षण व मार्केटिंग में निपुण, व्यापार में चतुराई, धन अर्जन की अच्छी क्षमता, विशेषकर बिना अत्यधिक मेहनत के सफलता पाने वाला, संग्रहक और बुद्धिमान निवेशक, विचारों में लचीलापन, बहुमुखी प्रतिभा, कई क्षेत्रों में रुचि वाला, मित्रप्रिय, लोकप्रिय और मिलनसार, उच्च शिक्षा, साहित्य, कला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में गहरी रुचि, विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग, आईटी, टेक्नोक्रेट, इनोवेशन, आविष्कार, लेखन, पत्रकारिता, मीडिया, शिक्षण, मार्केटिंग, संचार, होटल/पर्यटन प्रबंधन, रियल एस्टेट (revival), आदि व्यापार में सर्वोच्च स्थान आदि क्षेत्रों में सफल होता हैं। पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न जातक विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग, आईटी, टेक्नोक्रेट, इनोवेशन, आविष्कार, लेखन, पत्रकारिता, मीडिया, शिक्षण, मार्केटिंग, संचार, होटल/पर्यटन प्रबंधन, रियल एस्टेट (revival), व्यापार— आदि क्षेत्रों से माननीय, धनी होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र चतुर्थ चरण (Punarvasu Nakshatra Fourth Charan/ Padas) : कर्क राशि अंतर्गत 00° अंश से लेकर 03° अंश 20′ कला तक का विस्तार क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र का चतुर्थ चरण हैं। नवमांश कर्क होने से यह एक वर्गोत्तम व पुष्कर नवमांश है, व इस चरण का स्वामी चन्द्रमा हैं। अतः पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर चन्द्र-गुरु-चन्द्र का संयुक्त प्रभाव हैं। अत्यधिक संवेदनशीलता, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, पोषण व मातृत्व का भाव, भावनात्मक गहराई, अंतर्ज्ञान, कुशल गृहस्थी व गृहस्थी का सुख इस चरण का मूल गुण हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र में उत्पन्न जातक स्वच्छ, भावुक, सौम्य, गौरवर्णी, तेज युक्त गोलाकार मुखाकृति, बड़ी आँखें, गोल नाक, बड़ा पेट, चौड़ी कमर, छोटे मांसल हाथ वाला ममत्व से युक्त करुणामय होता हैं। ऐसा जातक दूसरों की भावनाओं को गहराई से समझने वाला, दयालु, परोपकार की स्वाभाविक प्रवृत्ति वाला, माँ जैसी देखभाल, परिवार और समाज की रक्षा करने वाला, मजबूत intuition, कल्पनाशीलता (imagination), आध्यात्मिक झुकाव और आंतरिक शांति वाला, सादगी पसंद, भौतिक सुखों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक या सामाजिक कार्यों में रुचि वाला, धार्मिक, सदाचारी, क्षमाशील, जीवन में उतार-चढ़ाव के बाद भी आशावादी, प्रबल पुनर्स्थापना शक्ति वाला, परिवार व रक्त संबंधियों का पोषक, समाज सेवा, परोपकार (philanthropy), चिकित्सा (विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य), आयुर्वेद, होमियोपैथ, शिक्षा, आध्यात्मिक/धार्मिक क्षेत्र, लेखन (आध्यात्मिक दर्शन), संगीत, बागवानी, पर्यावरण संरक्षण, होटल/रियल एस्टेट (नवीकरण कार्य), काउंसलिंग, नर्सिंग/देखभाल संबंधी कार्य आदि से संबंधित कार्यों में प्रसिद्धि प्राप्त करता हैं। पेट, छाती, पाचनतंत्र जैसे अंगों में शीत संबंधी व्याधियों से पीड़ा, चिंता, अवसाद व निर्णय लेने में कठिनाई जैसी समस्याएंँ होती हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के विभिन्न चरणों / पदों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फल || Result of various Planets situated in different Charan/ Padas of Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित सूर्य फल || Result of Sun in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में सूर्य हो तो जातक सुसंस्कृत, उच्च शिक्षित, गणित व अर्थशास्त्र में रुचि रखने वाला, राजकाज में निपुण, भूमि-भवन से सुखी, स्वर्ण आदि बहुमूल्य धातुओं व मूल्यवान रत्नों से सुसज्जित अर्थात अच्छी चल-अचल संपत्तिवान्, ससुराल में विशेष सम्मानित, सामान्यतया स्वस्थ किन्तु बिमार पड़ने पर गंभीर पीड़ित होने वाला होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में सूर्य हो तो जातक सुन्दर, अत्यंत पौरुष शक्ति वाला, बलवान, बुद्धि-विवेक से विशेष सक्षम, प्रबंधन व प्रशासनिक गुणों वाला, इन्द्रिय सुखों पर संयमी, अंतर्दृष्टि से सत्य-असत्य के प्रति विशेष संवेदनशील, प्रकृति से सन्निकट संबंध रखने वाला, स्वस्थ राजनीति का पोषक होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में सूर्य हो तो जातक सुन्दर, अतीव चंचल, लक्ष्य प्राप्ति को उन्मुख, विशेष बुद्धिमान्, व्यापार-व्यवसाय में निपुण, उच्चस्तरीय वणिकों का मित्र, धन-धान्य से युक्त, शासन-प्रशासन में विशेष पकड़ रखने वाला, कुशल राजनीतिज्ञ, पराक्रम से शत्रुओं को भी अपने आधीन करने की क्षमता वाला होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में सूर्य हो तो जातक साधारण नयन-नक्श वाला, धीरे-धीरे परिश्रम करने वाला, ऊर्जा-विहीन, दीर्घकालिक रोग या आलस्यपूर्ण आचरण से पीड़ित, निर्धन या सामान्य दैनिक ज़रुरतों को पुरी कर लेने जितना ही कमाने वाला, कर्ज या बहुतों के अहसान अपने सिर पर लेकर जीने वाला होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित सूर्य पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Sun located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित सूर्य पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक भावुक, कल्पनाशील, चंचल मन, कोमल, संवेदनशील, मातृप्रेमी, जीवनसाथी के प्रति कर्तव्यनिष्ठ, आर्थिक उतार-चढ़ाव वाला, कला, मनोरंजन, यात्रा, जलीय वा तरल पदार्थों का व्यवसायी, होटल, नर्सिंग आदि क्षेत्रों में सफल, परिजनों से पीड़ित, खर्चीला होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक साहसी, उग्र, महत्वाकांक्षी, नेतृत्वकार्ता, ऊर्जावान, जोखिम लेने वाला, तकनीकी कुशल, निकट संबंधों में आक्रामक, विवादप्रिय किन्तु रक्षक, इंजीनियरिंग, सेना, पुलिस, भूमि/निर्माण, खेलकूद, सर्जरी आदि क्षेत्रों में सफल, ख्यातिप्राप्त धनवान् होता है।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक आशावादी, धर्मानुरागी, ज्ञान के प्रति उन्मुख, उदार, नैतिक मूल्यों का धनी, शिक्षक वा पथ-प्रदर्शक, दार्शनिक विचारों वाला, शिक्षा, ज्योतिष, कानून, बैंकिंग, धार्मिक वा आध्यात्मिक कार्य, सलाहकार, समाज का नायक होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक गंभीर, अनुशासित, धैर्यवान, उदास, मेहनती, जिम्मेदार, कठोर, न्यायप्रिय, संबंधों में दूरी रखने वाला, विलंब से विवाह करने वाला, कर्तव्यपरायण किन्तु भावुक ठंडा, न्यायिक विभाग, इंजीनियरिंग, खनन, कृषि, रियल एस्टेट, लेबर वर्क, ठेकेदारी आदि क्षेत्रों से धीमी प्रगति से सफल, कठिन परिश्रम के बाद स्थिरता वाला होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक प्रारंभ में तेजस्वी, ज्ञानी, परंपरावादी दिखता हैं किन्तु सफल कुटनीतिज्ञ होता हैं। राजनैतिक व प्रशासनिक प्रबंधक, नीति निर्माता, पुरानी संपत्तियों का कायाकल्प करने वाले, हेरिटेज आर्किटेक्ट, अर्बन प्लानर, विदेशी मुद्रा व्यापारी, कारागार कर्मचारी, अपने पद व गरिमा का स्वार्थवश दुरुपयोग करने वाला, स्वयं से असंतुष्ट, असाध्य रोगों व ऑटोइम्यून बिमारियों से पीड़ित होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक मलीन, क्रूर, जीवन के प्रति उदासीन, समाज का व्यवस्थापक, ऑडिटर व सुरक्षा जांच विभाग, टेक्निकल एक्सपर्ट, मैकेनिक, अस्त्र-शस्त्र निर्माण कार्य संचालक, ध्यान व योग मार्गी, कम मित्रों वाला, अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित चन्द्रमा का फल || Result of Moon in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा हो तो जातक कृशकाय, आवेगी, पराक्रमी, हार नहीं मानने वाला, जुझारू, आक्रामक किन्तु विद्वतापूर्ण बातें करने वाला, रोग व दुर्घटनाओं से पीड़ित, एक से अधिक आय के स्रोत वाला, दूसरों की संपत्ति का लाभी, सहोदरों व मित्रों से लाभी, अधिक कन्या संतति वाला, निवेशक, अपने काम के प्रति जिम्मेदार होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra): पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा हो तो जातक अत्यंत रुपवान्, कलात्मक व रचनात्मक वृत्तियों वाला, लेखन कार्य में प्रतिष्ठा प्राप्त, अनेक स्त्रियों में अनुरक्त, यौन व स्त्रीरोग विशेषज्ञ, उच्चस्तरीय संवैधानिक पदों पर आसीन, अन्वेषक, ज्योतिषी, प्रसिद्ध होता हैं। यौन व चर्मरोगों से पीड़ित होने की संभावना होती है।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा हो तो जातक मनस्वी, सौम्य, चंचल, उच्च शिक्षित, सुन्दर बुद्धिमत्ता वाला, साहित्य-संगीत में रुचिवान्, कलात्मक ढंग से अपनी बात रखने में निपुण, अनेक व्यवसाय सुनियोजित तरीके से चलाने की क्षमता रखने वाला, शेयर, निवेश, जुआ, सट्टा आदि में रुचिवान्, अनेक स्त्रियों का प्रिय, विशेष प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में चन्द्रमा का फल(Result of Moon Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा हो तो जातक गोलाकार मुखाकृति, नुकीले ठुड्डी वाला, कलहप्रिय, क्रूर रक्तिम नेत्रों वाला, परिजनों व रिश्तेदारों का सहायक, मतलबी, होशियार, धनवान्, विभिन्न वाहन सुख से परिपूर्ण, मित्रों में आदरणीय, भूमि-भवन का लाभी, लोभ की पराकाष्ठा पार करने वाला अति लोभी, अप्राकृतिक मैथुन प्रिय, मादक पेय पदार्थों के सेवन में रुचिवान् होता हैं। दुर्घटनावश अपनी पत्नी को खोने वाला अथवा स्वार्थ सिद्धि के लिए उसका सौदा करने वाला, पुनः दुबारा उसी को प्राप्त करके मतभेद, व वाद-विवाद के साथ जीवन में आगे बढ़ता रहता हैं। हृदय व रक्त वाहिकाओं (Cardiovascular System) से संबंधित बीमारियों से पीड़ित होने की संभावना होती हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित चन्द्रमा पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Moon located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित चन्द्रमा पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक गोल चेहरा, तेज आँखें, उज्ज्वल वर्ण, आत्मसम्मानी, अहंकारी, नेतृत्वकर्ता, साहसी, राजसी, त्वरित निर्णय लेने में दक्ष, पिता से प्रेम करने वाला किन्तु भावनात्मक दूरी वाला, प्रशासन, राजनीति, सरकारी सेवा, प्रबंधन कार्य से सम्मानित, अस्थिर धनी अर्थात आर्थिक उतार-चढ़ाव वाला, नेत्र रोग, हृदय समस्या, सिरदर्द, पित्त प्रकृति की बीमारी से पीड़ित होता है।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक तीखे नाक-नक्श, लालिमा, बलिष्ठ शारीरीक सौष्ठव वाला, उग्र, साहसी, चिड़चिड़ा, जोशीला, ऊर्जावान, बहादुर, त्वरित निर्णय लेने में कभी युद्ध व विवादास्पद स्थिति उत्पन्न करने वाला, भूमि-भवन का लाभी, शासन-प्रशासन में उच्चस्तरीय पहुंच वाला, विज्ञान के क्षेत्र में अन्वेषक होता है। जीवनसाथी से अहंकारवश बार-बार संबंध विच्छेद की नौबत आते रहती हैं। किसी-किसी जातक का तलाक भी होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक चिकना चेहरा, तेज छोटी आँखें, बुद्धिमान, संवादकुशल, कलात्मक तरीके से अभिव्यक्ति में निपुण, चंचल, नई चीजें सीखने को उत्सुक, लेखन, संचार, मीडिया, व्यापार, शिक्षा, कम्प्यूटर आदि क्षेत्रों से धनार्जन करने वाला, प्रेम संबंधों में अत्यधिक लगाव रखने वाला, रसिक मिज़ाज, तनाव से पीड़ित होता है।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक लम्बे कद-काठी का, आकर्षक, तेजस्वी, धर्म-कर्म में अनुरक्त, परिवार के प्रति जिम्मेदार, प्रेमपूर्ण व जीवों से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने वाला, ज्योतिष, कानून, वित्तीय क्षेत्रों में सफल, जीवन के उत्तरार्ध में यकृत, मोटापा, जोड़ों का दर्द से संबंधित समस्याओं से पीड़ित होता है।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक कोमल अंगों वाला, सौम्य, नयनाभिरामी, नरम हृदयी, रसिक, भोगी, कलाप्रेमी, भोग केंद्रित प्रेम करने वाला, कला, फैशन, मनोरंजन, सौंदर्य प्रसाधन, उच्च लग्जरी संसाधनों के क्षेत्र में रुचिवान्, जननांग से संबंधित रोगों, मधुमेह, गला व गुर्दे की समस्या से पीड़ित होने की संभावना होती हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक कृशकाय, लम्बा चेहरे वाला, गंभीर मुखाकृति वाला, धैर्यवान, एकांतप्रिय, कठोर निर्णयी, अस्थिर व अनियमित आय वाला, परिजनों से त्यक्त, सामाजिक उपद्रव का शिकार होता है।
राहु की दृष्टि हो तो जातक चिंतित, दिवास्वप्न देखने से उन्मादी, माता व माता तुल्य परिजनों के लिए अनिष्टकारी, आधुनिक वैकल्पिक चिकित्सा यथा रेडियोलॉजिस्ट, कीमोथेरेपी विशेषज्ञ, स्टेम-सेल रिसर्चर, नशामुक्ति केन्द्र संचालक, क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट, विमानन व अंतरिक्ष तकनीक, कूटनीतिक व विदेशी मामलों के प्रबंधन, डिजिटल कंटेंट व संचार क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाला होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक भावनात्मक रुप से अस्थिर, एकांकी, पुनरुद्धार की ओर उन्मुख, अनाथालय, शवगृह कर्मचारी, नशामुक्ति अभियान, जल संरक्षण, गूढ़ विद्याओं का संशोधक, जैविक खेती व पर्यावरण संरक्षण आदि क्षेत्रों में रुचिवान् व प्रसिद्ध होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित मंगल ग्रह का फल || Result of Mars in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra): पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में मंगल हो तो जातक बलिष्ठ, पर्याप्त पैतृक विरासत वाला, अचल संपत्तियों से युक्त, निडर, युद्ध कला में निपुण, दगाबाज, मलीन चरित्र वाला, दूसरों की स्त्री व संपत्ति हड़पने का इच्छुक, रक्त विकारी, घाव फोड़े-फुंसी से पीड़ित, कमज़ोरों व लाचारों का उत्पीड़क होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में मंगल हो तो जातक सुन्दर, क्रूर, आवेगी, ईर्ष्यालु, मृदुभाषी, तीक्ष्ण बुद्धि वाला, परिजनों का प्रिय, कामक्रीड़ा में निपुण, बलात् रति करने का इच्छुक, तंत्र-मंत्र में रुचिवान्, दलाली, धातुकर्म व किराये के व्यवसाय से धनी, लड़ाई-झगड़े व लूट-खसोट से भी धन संग्रह करता हैं। जीवन के पूर्वार्द्ध में दुर्घटना और उतरार्द्ध में ऑटोइम्यून बिमारियों से पीड़ित होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में मंगल हो तो जातक पराक्रमी, कुशाग्र बुद्धि, सफल व्यवसायी, वाद-विवाद में निपुण, सरकार व न्यायिक विभाग से लाभी, शेयर, निवेश आदि से विपुल धनवान्, परम भाग्यशाली, विलासितापूर्ण जीवनशैली वाला, स्त्रियों की संगति चाहने वाला, अति कामुक, तर्क-वितर्क, शास्त्रार्थ, वकील आदि पेशा में सम्मानित होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में मंगल हो तो जातक जातक सुन्दर, ऊपर से सौम्य अंदर से हिंसक, कलात्मक अभिरुचि वाला, साहित्य, लेखन, काव्य आदि क्षेत्रों में प्रसिद्धि प्राप्त, यदा-कदा दुर्घटनाओं से ग्रस्त, संतुष्ट, अनेक स्त्रियों से संसर्ग करने वाला, यौनरोगी होता हैं। संतानोत्पत्ति में समस्या वा विलंब होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित मंगल पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Mars located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित मंगल पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक तेजस्वी चेहरा, तीक्ष्ण आँखें, आकर्षक कद-काठी, आत्मविश्वासी, उग्र-राजसिक प्रवृत्तियों वाला, प्रभुत्वशाली, अहंकारयुक्त भाषण करने वाला, तीव्र गति से धनार्जन करने वाला, किन्तु गलत निवेश या व्यापार में नुकसान उठाने वाला होता है।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक गोल रक्तिम वर्ण वाला, नरम किन्तु आवेशपूर्ण अभिव्यक्ति करने वाला, कल्पनाशील, निडर, मातृत्व स्नेह से युक्त क्रोध करने वाला, निकट संबंधों में पूर्ण लगाव किन्तु तुनकमिज़ाज, निवेश से लाभी किन्तु आर्थिक उतार-चढ़ाव से अस्थिर, परदेस से लाभान्वित होता है।
बुध की दृष्टि हो तो जातक पतला चुस्त शरीर वाला, तेज पैनी नज़र वाला, चालाक, त्वरित निर्णय लेने वाला, साहसिक बातें करने वाला किन्तु अंदर से डरपोक, गणित, खगोल, विज्ञान, अर्थशास्त्र, लेखाशास्त्र, ज्योतिष की समझ रखने वाला, संगीत में रुचिवान्, मतलबी, बहानेबाज होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक लम्बी बड़ी मुखाकृति वाला, उदारवादी, शास्त्रों पर उग्र टीकाकार, शीलवान, न्यायप्रिय, योग्य को ज्ञान देने वाला, शिक्षा, ज्योतिष, उच्च प्रबंधन व न्यायिक क्षेत्र में प्रसिद्ध होता है।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक सुन्दर, जोशीला, अति कामुक, ईर्ष्यालु, अनेक स्त्रियों से संसर्ग करने वाला, संतानोत्पत्ति में विलंब या समस्या आती हैं। महिला जातक विवाह से पूर्व बाल्यकाल में कौमार्य भंग करती हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक श्यामवर्णी, धँसी हुई आँखो वाला, कठोर अंगों वाला, कृषि कार्य से लाभान्वित, विवाह में विलंब, वा रोगी होने से विवाह नहीं होता हैं। जीर्ण रोगों से पीड़ित होता है।
राहु की दृष्टि हो तो जातक क्रूर, आक्रामक, मिथ्याचारी, विशेष बल व खुफिया एजेंसी, प्रवर्तन एजेंसी (ED, CBI, STF आदि), निजी सुरक्षा व सैन्य ठेकेदार, कॉरपोरेट रेडर्स, खनन व भूमि माफिया, संगठित अपराध का हिस्सा हो सकता हैं। पारिवारिक जीवन अस्थिर, विविध शारीरिक व मानसिक रोगों व व्यसनों से पीड़ित होता है।
केतु की दृष्टि हो तो जातक साहसी, कल्याणकारी, जीवन के नश्वरता का मर्मज्ञ, आधुनिक युद्ध क्षेत्र शल्य चिकित्सा (Combat & Trauma Surgery), प्रायोगिक मनोरोग चिकित्सा, श्मशान साधना व अघोर पंथ, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण बहाली व सिंथेटिक बायोलॉजी आदि क्षेत्रों पर आश्रित होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित बुध फल || Result of Mercury in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में बुध हो तो जातक गणित, खगोल, रसायन आदि विषयों का ज्ञाता, नृत्य-संगीत, अभिनय आदि ललित कलाओं में निपुण, विपुल संपत्तिवान, शासन-प्रशासन में उच्चस्तरीय पदों पर आसीन, राजनीतिक जीवन में सफल होता हैं। एक से अधिक विवाह व विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में बुध हो तो जातक वाक्पटु, कुशल संगीतज्ञ, सौम्य, सहज, दयालु, मानवता का पोषक, आय के अनेक स्रोत वाला, पर्याप्त खर्चीला, काउंसिलिंग, एडवोकेट, सलाहकार के रुप में ख्यातिप्राप्त होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में बुध हो तो जातक परिश्रमी, कर्मठ, कुशल बुद्धिमत्ता वाला, अच्छी स्मरण शक्ति वाला, विज्ञान, तकनीकी, खगोल व व्यवसायिक विद्याओं में निपुण, सामाजिक व सांस्कृतिक उपक्रमों का पोषक, कुशल निवेशक, सफल ज्योतिषी होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चतुर्थ में बुध हो तो जातक सुन्दर शारीरिक सौष्ठव वाला, जिद्दी, अपने लक्ष्य के प्रति उन्मुख, शिक्षा व शिक्षण संस्थानों से लाभी, अच्छी संपत्ति वाला, अपने कार्यक्षेत्र में उन्नतिशील, शासन-प्रशासन में अच्छी पकड़ वाला, स्वादिष्ट पेयपदार्थों में रुचिवान्, समाज का नेता या मुखिया होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित बुध पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Mercury located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित बुध पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक थुलथुले बदन का, घने काले घुंघराले बालों वाला, बौद्धिकता से युक्त किन्तु भावुक, चंचल, कल्पनाशील, प्राचीन कलाकृतियों का संरक्षक, रिमेक संगीतज्ञ, आलोचक होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक चंचल छोटी आँखों वाला, त्वरित प्रतिक्रिया देने वाला, तकनीकी बुद्धि, बातुनी, शहरों व गांँवों का पुनरुद्धार करने वाला, नीति नियामक, तथ्यान्वेषी होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक प्रभावशाली गंभीर मुखाकृति, विद्वान, सज्जन, कुलीन वर्गों का परामर्शदाता, ज्ञानवर्धक, कुशल वक्ता, ज्योतिष, वित्त, निवेश, कानून व प्रतिभूतियों का ज्ञाता, जनसंपर्क अधिकारी होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक शांत, शिथिल, लक्ष्य पर नज़र बनाए रखने वाला, गणितीय वा तकनीकी गहराई वाला, अनुशासित सोच, आईटी, अनुसंधान क्षेत्रों में रुचिवान् तकनीशियन होता हैं। समलैंगिकता की ओर झुकाव के योग बनते हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक सट्टा, क्रिप्टो करेंसी व ऑप्शन ट्रेडिंग, कुशल गणितज्ञ व ज्योतिषी, लायजनिंग एजेंट वा एजेंसी, रियल स्टेट ‘फ्लिपिंग’ व विवादित संपत्ति व्यापार, मल्टी-लेवल मार्केटिंग (MLM Business), राजनीति, ठेकेदारी, वसूली व प्रवर्तन (Recovery and Enforcement Roles – Unofficial) आदि क्षेत्रों में रुचिवान्, नशीले पदार्थों का सेवन करने वाला, पत्नी पर संदेह करने वाला, स्वयं भी वैश्यागामी होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक अल्गोरिदमिक ट्रेडिंग, साइबर सुरक्षा अन्वेषण, एथिकल हैकिंग, विश्लेषणात्मक पत्रकारिता, रणनीतिक सलाहकार, शोध व विकास आदि क्षेत्रों से संबंधित कार्यों में निपुण, गंभीर हास्य-व्यंग्य करने वाला, सहोदरों व भाई-बहनों से द्वेष करने वाला होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित गुरु फल || Result of Jupiter in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में गुरु हो तो जातक विद्वान, पुराणों व इतिहास का जानकार, व्यसनी, निकट संबंधियों व सगोत्रियों की संपत्तियों का लाभी, धन-धान्य से सुखी, अहंकारयुक्त भाषण करने वाला, समाज में प्रभावशाली, समाजसेवी, पर्यटन-प्रेमी होता हैं। पत्नी व संतान से अल्प-सुखी होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में गुरु हो तो जातक महापंडित, ज्ञानी, धन-धान्य से परिपूर्ण, विलासी, धर्म-कर्म में अनुरक्त, परोपकारी, पत्नी से प्रचूर दैहिक सुख भोगने वाला किन्तु मतभेद होने से असंतुष्ट, मंत्रसिद्ध करने वाला, तत्वमीमांसक होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में गुरु हो तो जातक विद्या अध्ययनी, वाक्-चातुर्य से युक्त, परिश्रमी, वस्त्राभूषणों व सुन्दर वाहनों का शौकीन, कुशल नेतृत्व क्षमता वाला, उद्यमी, अनेक जनों का पालक, शैक्षणिक संस्थानों, अध्यापन कार्य, वित्तीय विभाग, तकनीकी क्षेत्र व धार्मिक क्षेत्र से धनवान् होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में गुरु हो तो जातक हृष्ट-पुष्ट, दीर्घशरीरी, विपुल वैभवशाली, भूमि-भवन से सुखी, उद्यमशील, निकट संबंधियों से मतभेद वाला, समाज में आदरणीय, अनेक स्त्रियों का प्रिय, धर्मानुरागी, यायावर होता हैं। उदर संबंधी रोग व आत्ममुग्धता विशेष दोष उत्पन्न करते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Jupiter located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित गुरु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक तेजस्वी, प्रभावशाली चेहरा, उज्ज्वल वर्ण, मछली के जैसी आँखें, स्वाभिमानी, समाज का नायक, प्रखर ज्ञान, अधिकारपूर्ण नैतिकता, नवीन विचारों का पोषक, प्रशासन, राजनीति, उच्च शिक्षा, धार्मिक नेतृत्व जैसे उच्च पदों से धन-प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला किन्तु अहंकार से जीवन में उतार-चढ़ाव देखने वाला होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक हृष्ट-पुष्ट, कोमल अंगों वाला, नरम तेजस्वी आँखें, उदार, मातृस्नेह युक्त, कल्पनाशील, आशावादी, अनेक जनों का पालन करने वाला, सरकारी अधिकारी, काउंसलिंग, कला-शिक्षा, यात्रा, जल-पर्यटन आदि क्षेत्रों से जनकल्याणकारी होता है।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक मजबूत, नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने वाला, सेना, पुलिस आदि रक्षा विभाग में रुचिवान्, समाज का नायक, कुशल राजनीतिज्ञ, लोक कल्याण में रत, समाज सुधारक होता है।
बुध की दृष्टि हो तो जातक मिलनसार, संवाद कुशल, गणितज्ञ, कलात्मक व रचनात्मक अभिरुचि वाला, लेखन कार्य में तेजी से सफल होने वाला, ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाला होता हैं। यदा-कदा विवादास्पद बयानों से चर्चा में बना रहता है।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक विद्वान किन्तु अपनी विद्वत्ता का उपयोग न करने वाला, निन्दित कार्यों में संलग्न, असत्यवादी, स्त्री लोलुप, अल्प आमदनी में संतुष्ट, व्यर्थ समय गंवाने वाला होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक परम ज्ञानवान्, वाक्-चातुर्य से युक्त, स्व-परिश्रम से धनवान्, शासन-प्रशासन में उच्चस्तरीय अधिकारियों से मैत्रीपूर्ण संबंधों वाला, पारिवारिक जीवन में नीरस किन्तु जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाला होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक मेडिकल टूरिज्म, मल्टीस्पेशलिटी क्लिनिक, कोचिंग सेंटर, धार्मिक व आध्यात्मिक टूरिज्म, आत्मजागृति केंद्र, ज्योतिष कर्म व संस्थान, योग सेन्टर, नेटवर्क मार्केटिंग, इको-फ्रेंडली सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री व्यवसाय, माइक्रोफाइनेंस आदि क्षेत्रों में रुचिवान्, परिवार के प्रति समर्पित, पत्नी से मतभेद वाला होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक सांख्यिकीविद्, बीमा गणितज्ञ, जल विज्ञान व मृदा परीक्षण, फोरेंसिक विष विज्ञान, विकृति विज्ञान, साइबर सुरक्षा, क्रिप्टोग्राफ़ी, अनुपालन व नियामक अंकेक्षण आदि क्षेत्रों में सेवा देने वाला नेपथ्य का नायक होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शुक्र फल || Result of Venus in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में शुक्र स्थित हों तो जातक कृषि कार्य वा बागवानी से लाभी, सजने-संवरने का शौकीन, अपने जनों का नेता, अति मैथुनप्रिय, समाज में बदनाम, पत्नी से क्लेश करने वाला, अस्थिर मति वाला होता है। आग व धारदार हथियार से खतरा होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में शुक्र हो तो जातक रम्य सुन्दर, बड़े केशों वाला, स्वाद लोलुप, साज-सज्जा पर अधिक खर्चीला, अवैध संबंधों में लिप्त, सौन्दर्य प्रसाधन, गहने, वस्त्र आदि के कारोबार में रुचिवान्, सरकारी वा निजी क्षेत्र में भी जासूस होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में शुक्र हो तो जातक प्रचुर शिक्षित, कलात्मक अभिरुचि वाला, चित्रकारी, शिल्पकारी आदि में गुणी, व्यवसाय व संस्थानों का देखरेख करने वाला, नीति-निर्माता, व्यवस्थाओं का पोषक व संरक्षक होता हैं। प्रेम विवाह होंने की संभावना बनती है।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शुक्र हो तो जातक गोल अंडाकार चेहरे वाला, शर्मीला, धनवान्, नौकरी पेशा में रुचिवान्, जोखिम लेने से डरने वाला, प्रेम करने में निपुण, कामक्रीड़ा में प्रवीण होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Venus located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शुक्र पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक गौरवर्णी, भावनाप्रधान, सौंदर्यबोध से युक्त, स्वप्नदर्शी, बार-बार प्रेम में पड़ने वाला, महिलाओं, जनसमूह, भावनात्मक काम से अनियमित लेकिन अच्छा धन कमाने वाला, तीव्र आकर्षण से युक्त होता है।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक तीखा आकर्षक चेहरा, पैनी आँखें, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, जुनूनी कामुक, आक्रामक रोमांटिक, तीव्र इच्छाओं वाला, प्रतिस्पर्धी कलात्मकता के गुणों वाला, शारीरिक आकर्षण से शुरू करके अनेक स्त्रियों से संसर्ग करने वाला, फोटोग्राफी, स्पोर्ट्स वियर, एक्शन आर्ट, व भूमि-भवन का व्यवसायी होता है।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक उच्च स्तर का कलात्मक ज्ञान, शिक्षण व सौंदर्य का मिश्रण होता हैं। साहित्य, आर्ट स्कूल, लग्जरी ब्रांड, सांस्कृतिक सलाहकार आदि क्षेत्रों में प्रसिद्ध होता हैं। उच्च दर्शन के कारण कम मित्रों वाला व पत्नी से अनबन वाला होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक अनुशासित विलास, दीर्घकालिक आकर्षण से प्रेम करने वाला, कर्त्तव्यपरायण, पुरातन कला, शिल्पकार, इंटिरियर डिजाइनर आदि क्षेत्रों में रुचिवान्, धोखा खाकर जीवन में संभलने वाला होता है।
राहु की दृष्टि हो तो जातक आकर्षक व्यक्तित्व वाला, दाँतों और मुस्कुराहट पर विशेष आकर्षण वाला, विलासिता व कलात्मक क्षेत्रों में रुचिवान्, असामान्य प्रेम संबंधों में संलिप्त, छलावा करने वाला होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक सौन्दर्य, डर्मेटोलॉजी, कॉस्मेटिक उद्योग, प्लास्टिक सर्जरी स्पेशलिस्ट, नर्स आदि क्षेत्रों में सेवा देने वाला, दिखावा पसंद, बाहरी चमक-दमक वाला, अंदर से उदासीन होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शनि फल || Result of Saturn in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में शनि हो तो जातक चिड़चिड़ा, खिन्न, आचरणहीन, काम, क्रोध, मद मोह में लिप्त, झूठ-फरेब करने वाला, मलीन आत्मा, अपराधिक मानसिकता वाला होता है। दुर्घटनाओं में अंगभंग या जन्मजात विकलांगता के योग बनते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में शनि हो तो जातक साधारण वेशभूषा वाला, मेहनत-मजदूरी करने वाला, चतुर्थवर्गीय नौकरी करने वाला, अभद्र व्यवहार करने वाला, अखाद्य को खाने-पीने वाला होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में शनि हो तो जातक कृशकाय, लम्बा कद-काठी वाला, कम बोलने वाला, तरल पदार्थों तेल, फलों के रस आदि का व्यवसायी, नौकरी करे तो खनन, पत्रकारिता, सुचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में सफल होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शनि हो तो जातक चिंतित, स्वजनों से दूर परदेस में रहने वाला, नाना प्रकार के व्याधियों से पीड़ित, जलीय यात्रा करने वाला, आजीवन स्वय के मकान के लिए तनावग्रस्त रहते हुए संघर्षशील होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Saturn located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित शनि पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक कठोर क्रूर मुखाकृति, पित वर्ण की आँखो वाला, बाल्यकाल से दुर्भिक्ष सहने वाला, नशेड़ी व नीच कर्म करने वालों का मित्र, मातृस्नेह से वंचित, कठिन परिश्रम करने को विवश होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक खिन्न, दुःखी, मनोविज्ञान, गृहविज्ञान, बार-बार असफलताओं से विचलित, कृषि, दुकानदारी, रंग उद्योग, पारंपरिक वस्तुओं का व्यवसायी, सरकारी सहायता प्राप्त, पर्यटक होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक चंचल, बातचीत करने में निपुण, मोलभाव करने वाला, धातुकर्म, औषधि शोधन, आयुर्वेद, मंत्र ज्ञान, स्वर विज्ञान, लोक परंपराओं का जानकार, रुढ़िवादी, इन्जिनियरिंग, कारीगरी, निर्माण व पुनरुद्धार से संबंधित कार्यों में रुचि रखने वाला होता है।
बुध की दृष्टि हो तो जातक दार्शनिक अभिरुचि वाला, साहित्य-संगीत में रुचिवान्, कुशल व्यवसायी, धन-धान्य से युक्त, वाक्-चातुर्य से युक्त, सबका प्रिय, कठिन समस्याओं का सटीक समाधान निकालने में माहिर, हाजिर जवाब होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक बाल्यकाल से परिपक्व, गंभीर, शास्त्रोक्त व संदर्भ सहित अपनी बात रखने वाला, उपमाओं व उदाहरणों से अपनी बातों की पुष्टि करने वाला, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक प्रतिष्ठानों, सांस्कृतिक उपक्रमों का प्रमुख, समाज में आदरणीय, लोककल्याण हेतु सरकार से मान्यता प्राप्त पदों पर आसीन होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक इंटिरियर डिजाइनर, फर्नीचर व्यवसाय, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, नेचुरोपैथी, आयुर्वेद, दंतरोग विशेषज्ञ होता हैं। अनेक प्रेम प्रसंगों में स्त्रियों द्वारा धन लाभ प्राप्त करने वाला, वैवाहिक जीवन असंतोषपूर्ण, क्लेश से भरा होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक परिश्रमी, लम्बे संघर्ष के बाद देरी से सफल, स्वदेश से विस्थापित, कर्ज से पीड़ित, अवैधानिक कार्यों में रुचि वाला, आर्थिक उतार-चढ़ाव वाला, कुटुम्बियों का सहायक, रोगी होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक एकांकी, परिजनों से मतभेद वाला, गूढ़ रहस्योंद्घाटन करने में रुचि वाला, तकनीकी शिक्षा, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, अनुसंधान में रुचिवान् होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित राहु फल || Result of Rahu in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में राहु हो तो जातक अतीन्द्रिय ज्ञान से पूर्वाभास करने में निपुण, शिक्षित, उच्चस्तरीय राजनयिकों से मैत्री संबंध वाला, हड्डियों के जोड़-तोड़ का विशेषज्ञ, क्रूर, हिंसक, रक्तपात करने में आनंदित होने वाला होता हैं। संधिवात, रूमेटॉयड आर्थराइटिस, लकवा, कब्ज, सायटिका, कंपन रोग (पार्किंसंस), अनिद्रा, सूजन आदि व्याधियों से कष्ट पाता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में राहु हो तो जातक चतुर, व्यवहार कुशल, वस्त्राभूषणों का शौकीन, अनुसंधान व अन्वेषण में रुचि रखने वाला, धातुकर्म, गहने, सौन्दर्य प्रसाधन, इंटिरियर आदि के कार्यों से धनवान् होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में राहु हो तो जातक अत्यंत बुद्धिमान, नवाचारी, वित्त व लेखाशास्त्र का मर्मज्ञ, सरकारी वा निजी क्षेत्र में प्रबंधक, सलाहकार, काउंसलर, उच्च कोटि का गणितज्ञ वा ज्योतिषी होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में राहु हो तो जातक ललित कला प्रेमी, कथावाचक, साहित्यिक अभिरुचि वाला, खगोल व आधुनिक विज्ञान में मेधावी, समुद्री व्यापार से लाभान्वित, उच्च कोटि का भविष्यवक्ता होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित राहु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Rahu located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित राहु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक जातक संचार कुशल, लेखन व प्रकाशन में सफल, विदेशी संपर्क से धनवान्, सरकारी व निजी क्षेत्र में नीति-निर्माता, प्रसिद्ध होता हैं, किन्तु विवादास्पद भी होता हैं। आँख, हृदय, सिर व पित्त संबंधी विकारों से पीड़ित होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक अपने प्रयासों में बार-बार असफल, अनिश्चित जीवनशैली वाला, निर्णय लेने में असमर्थ, चिंतित, अपनी भावुकता के कारण बार-बार ठगा जाता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक आक्रामक, तानाशाही प्रवृत्ति का, दूसरों की संपत्ति व अधिकार हड़पने वाला, अचानक समृद्धशाली होने वाला, धनवान्, वाद-विवाद में विजयी, कोर्ट-कचहरी मुकदमेबाजी से पीड़ित, परिजनों का उत्पीड़क, समाज में प्रभावशाली, व्याभिचारी होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक सरकारी पदों पर आसीन, लेखा, वित्त, प्रबंधन, सलाहकार, कुटनीति, साहित्य, कविता, मोटिवेशनल स्पीकर, ज्योतिषी, कथाकार, फ़िल्म उद्योग में नाम कमाता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक तीक्ष्ण बुद्धि, मजबूत निर्णय शक्ति वाला, शिक्षा, लेखन, प्रकाशन, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, ज्योतिषी आदि उच्च ज्ञान व विश्लेषणात्मक क्षेत्रों में सफल, दार्शनिक विचारों वाला, विदेशी आय से लाभान्वित होता है।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक आकर्षक व्यक्तित्व वाला, प्रेम संबंधों, कला, सौंदर्य, विलासिता व भौतिक सुखों के प्रति आसक्त, कलात्मक क्षेत्रों यथा– अभिनय, संगीत, फैशन, लग्जरी प्रोडक्ट्स, ऑटोमोबाइल आदि क्षेत्रों से लाभ अर्जित करने वाला, अवैध संबंधों में लिप्त, यौनरोगी, मिश्रित वैवाहिक सुख वाला होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक कठिनाई युक्त जीवन वाला, निर्धन या धन के लिए प्रायः कठिन संघर्षों में रत, कार्य को अधूरे छोड़ने वाला, प्रौढ़ावस्था तक दर-दर भटकने वाला, भारी व शारीरिक मेहनत वाले तकनीकी क्षेत्र में सफल होता हैं। वायु दोष से संबंधित व्याधियों से पीड़ित होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित केतु फल || Result of Ketu in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in First Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में केतु हो तो जातक उग्र, कर्मठ, ऊपर से कठोर भीतर से दयालु, सहोदरों के लिए अनिष्टकारी, दीर्घायुष्य से पुष्ट, भाग्यशाली, आध्यात्मिक, क्रूर देवी-देवताओं की अराधना करने वाला, शत्रुओं पर विजयी होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Second Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में केतु हो तो जातक भीरु, अनेक रोगों से ग्रस्त, माता-पिता द्वारा त्यक्त अथवा परिजनों के सुख से वंचित, निर्धन, बिना किसी मित्र या सहयोगी वाला, निर्जन में भटकने वाला होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Third Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में केतु हो तो जातक चिड़चिड़ा, अंतर्द्वंद्व से ग्रसित, पत्नी व संततियों से द्वेष करने वाला, गाली-गलौच करने वाला, पाखंड पूर्वक मंत्र आदि जपने का दिखावा करने वाला, घर से भागने वाला या आत्महत्या करने को उद्यत होता रहता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Fourth Charan/ Padas in Punarvasu Nakshatra) : पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में केतु हो तो जातक बाल्यकाल से संघर्षशील, बार-बार सफल होकर भी कार्यक्षेत्र बदलने से अस्त-व्यस्त, अनिश्चित जीवनशैली वाला, भावनात्मक प्रबलता वाला, परिजनों से अतिशय लगाव वाला होता हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित केतु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Ketu located in Punarvasu Nakshatra
पुनर्वसु नक्षत्र स्थित केतु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक धर्मनिष्ठ, दानशील, मजबूत सेवा भावना वाला, दूसरों को पुनर्स्थापित करने में रुचिवान्, प्राचीन धरोहरों का संरक्षक, वातदोष से पीड़ित होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक जुझारू, कर्मठ, गहरी आध्यात्मिक झुकाव वाला, मातृसुख से वंचित, चिड़चिड़ा, ज्योतिष आदि विषयों में रुचिवान्, दयालु होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक वाचाल, झगड़ालू, हिंसक, नास्तिक, परिजनों से वैर करने वाला, रक्त विकारी, मांसपेशियों में पीड़ा वाला, आक्रामक व आवेगी निर्णयों के कारण बार-बार कार्यक्षेत्र बदलने से आर्थिक तंगी का शिकार होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक स्वाध्ययन से शास्त्रों का ज्ञान अर्जित करने वाला, पूजा-पाठ, धार्मिक क्रियाकलाप में लिप्त, कठोरभाषी, उच्च पदासीन लोगों का सेवक, नौकरीपेशा वाला होता है।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक आध्यात्मिक उन्नति वाला, नगर व समाज के विकास को समर्पित, नीतिज्ञ, मजिस्ट्रेट, कलक्टर क्षेत्रिय राजनीति में प्रसिद्ध होता है।
शुक्र की दृष्टि हो तो सौन्दर्य के प्रति उदासीन, अल्प शिक्षित, रुढ़िवादी, विचित्र वेशभूषा वाला, एकांतवासी, ललित कलाओं में रुचिवान्, प्रचुर यौनाचारी, रिश्तों में असमंजसपूर्ण स्थिति में होता है।
शनि की दृष्टि हो तो जातक बाल्यकाल से दुःखी, अग्नि व चोरों से भयभीत, अपने लक्ष्य के लिए निरंतर प्रयास रत, बात-बात पर भड़कीला, परिजनों से मतभेद, पित्त विकारी, विवाह में विलम्ब अथवा विवाह नहीं होता हैं।
उपसंहार || Important Considerations
किसी भी नक्षत्र में एक से अधिक ग्रह यदि युति /दृष्टि आदि संबंधों में होते हैं तो उनमें से सभी ग्रहों के बलाबल अनुसार जातक में गुण-दोषों का मिश्रण होता हैं। अर्थात यदि किसी नक्षत्र में दो या दो से अधिक ग्रह युति करे, तो जातक में उक्त ग्रहों के बलाबल के अनुपात में गुण-दोष की वृद्धि करेंगे। दृष्टि के संबंध में भी ऐसा हीं समझना चाहिए।
यदि कोई नक्षत्र भिन्न-भिन्न जातकों की कुंडलियों में भिन्न-भिन्न भावों में स्थित हो, तो उस भाव से संबंधित फलों के साथ अपने कारकत्वों को मिश्रित करके, जातक को संस्कारित फल प्रदान प्रदान करता हैं।
सूर्य के अत्यधिक सन्निकट होने से— बुध, सूर्य से 28° अंश और शुक्र, सूर्य से 48° अंश से ज्यादा दूर नहीं जा सकता, अतः सूर्य, बुध एवं शुक्र का आपस में दृष्टि संबंध नहीं होता।
राहु-केतु परस्पर सदैव 180° अंशों की दूरी पर होते हैं, अतः ये एक-दूसरे को सदैव पूर्ण दृष्टि से देख रहे होते हैं। इनमें से प्रत्येक के फलित में दूसरे का प्रभाव बिना कहे, सम्मिलित समझना चाहिए।
जन्मपत्रिका में विभिन्न ग्रहों का विभिन्न भावों, नक्षत्रों व परस्पर युति-दृष्टि आदि संबंधों से भिन्न-भिन्न प्रकार के गुण निष्पन्न होते हैं। यही कारण हैं कि, कोई भी जातक भिन्न-भिन्न गुणों का सम्मिश्रण होता हैं। अतः कुंडली जनित जातक फलकथन के लिए सम्पूर्ण ग्रहों व नक्षत्रों के फलों का समावेशी फल विचारणीय हैं।
पुनर्वसु नक्षत्रोत्पन्न महान व्यक्तित्व || Famous Personalities born in Punarvasu Nakshatra
श्रीहरि विष्णु के अवतार प्रभु श्रीराम (वाल्मीकि रामायण व अन्य संबंधित काव्यों के अनुसार) – का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में था।
श्री रमण महर्षि (प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता) – का चन्द्रमा, पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में था।
नेल्सन मंडेला (द अफ्रीकन गांधी) – का सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में था।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (महान हिन्दी कवि) – का चन्द्र, पुनर्वसु नक्षत्र के द्वितीय चरण में था।
मेल गिब्सन [ Mel Gibson अभिनेता व निर्देशक] – का लग्न पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में था।
शकीरा (विश्व प्रसिद्ध गायिका) – का चन्द्र पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में था।
[ उपरोक्त महान व्यक्तित्वों के जन्म नक्षत्र वा लग्न नक्षत्र का पुनर्वसु में होने की पुष्टि उनकी पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जन्मकुंडली विवरण से की गई हैं। ]
~ Krishna Pandit Ojha..
WhatsApp:9135754051
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नक्षत्र (Nakshatra) क्या हैं.? विस्तृत व्याख्या
1• अश्विनी
2• भरणी
3• कृतिका
4• रोहिणी
5• मृगशिरा
6• आर्द्रा
7• पुनर्वसु
8• पुष्य
9• आश्लेषा
10• मघा
11• पूर्वा फाल्गुनी
12• उत्तरा फाल्गुनी
13• हस्त
14• चित्रा
15• स्वाति
16• विशाखा
17• अनुराधा
18• ज्येष्ठा
19• मूल
20• पूर्वाषाढ़ा
21• उत्तराषाढ़ा
22• श्रवण
23• धनिष्ठा
24• शतभिषा
25• पूर्वा भाद्रपद
26• उत्तरा भाद्रपद
27• रेवती