कृतिका नक्षत्र परिचय || Kritika Nakshatra Introduction
वर्तमान भारतीय ज्योतिष में ‘कृतिका नक्षत्र’ क्रम से तीसरा नक्षत्र हैं। भचक्र में 26° अंश 40′ से लेकर 40° अंश तक का विस्तार क्षेत्र ‘कृतिका नक्षत्र’ कहलाता हैं। पाश्चात्य ज्योतिष में इसे ‘प्लीएड्स (Pleiades)’, अरेबिक नक्षत्र प्रणाली (manāzil al-qamar) में इसे ‘अल-थुरय्या (al-Thurayyā) या थुरैया (Thuraya)’ , चाईनीज सियु में इसे ‘माओ (Mǎo)’ अथवा ‘माओ श्यू सिंग तुआन (Mǎo xiù xīng tuán)’ कहा जाता हैं; जो श्वेत बाघ (White Tiger of the West) के अंतर्गत आता है। ‘कृतिका’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘कृत् धातु’ से निष्पन्न हुआ हैं। जिसका अर्थ हैं – काटना , छेदना या भेदन करना। इस प्रकार ‘कृतिका’ शब्द का शाब्दिक अर्थ हुआ— ‘काटने वाली / छेदने वाली वा भेदन करने वाली स्त्रियांँ। ‘कृतिका नक्षत्र’ मुख्यतया 6 या 7 तारों का समुह हैं, जिससे खुरपा, फरसा (axe/hatchet) या क्षुर (छुरा/काटने का औजार) जैसी आकृति बनता हैं। कुछ ग्रंथों में इसे अग्निशिखा (अग्नि की लौ) के आकार से भी जोड़ा गया हैं।
वैदिक काल में गणना, कृतिका नक्षत्र से प्रारम्भ होती थी। तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार “कृत्तिकास्वग्निमादधीत। मुखं वा एतन्नक्षत्राणाम् यत् कृत्तिकाः।” अर्थात कृतिका नक्षत्र में अग्नि की स्थापना (यज्ञ-अग्नि प्रज्वलन) करनी चाहिए, क्योंकि कृतिका नक्षत्रों का मुख (शुरुआत) है।
उस काल में वसंत विषुव का प्रारम्भ कृतिका नक्षत्र से होता था; अतः इसको प्रथम नक्षत्र मानने का संकेत मिलता है। एक अन्य कथन हैं कि— “नक्षत्राणि वै देवानाम् आवसथानि… देवानां नक्षत्राणि कृत्तिकाः प्रभवन्ति…” अर्थात नक्षत्र देवताओं के घर हैं। देवनक्षत्र कृतिका से शुरू होकर विशाखा तक जाते हैं, जबकि यम के नक्षत्र अनुराधा से अपभरणी तक। इससे भी यह स्पष्ट होता हैं कि, कृतिका को देवताओं का प्रारंभिक और अग्नि से जुड़ा नक्षत्र बताया गया है।
[ Note:- वर्तमान भारतीय ज्योतिष में कृतिका के मुख्यतः 6 तारें हीं माने गए हैं, जिन्हें नंगी आँखों से देखा जा सकता हैं एक जो 7वां तारा हैं, वह थोड़ा धुंधला दिखता हैं। ये 7 मुख्य तारे (Seven Sisters) हैं—
1• Alcyone (सबसे चमकीला, केंद्र के पास)
2• Atlas
3• Maia
4• Electra
5• Merope
6• Taygeta और
7• Celaeno या Asterope.]
भरणी नक्षत्र से पूर्व की ओर मेष राशि अंतर्गत 26° अंश 40′ कला से लेकर वृषभ राशि अंतर्गत 10° अंश तक ‘कृतिका नक्षत्र’ का विस्तार हैं। इसका नक्षत्र स्वामी – सूर्य, देवता – कार्तिकेय वा अग्नि, जाति – विप्र / ब्राह्मण, योनि – छाग / बकरा, योनिवैर – वानर, राक्षस गण, अंत नाड़ी, सत्तोगुणी, कार्यकारी, शुभ, तामसिक, स्त्री संज्ञक नक्षत्र हैं। यह उत्तर दिशा का स्वामी हैं। यह मिश्र (सामान्य), अधोमुखी, सुलोचन नक्षत्र हैं।
अग्नि संबंधी कार्य, काटने-छांटने या हटाने से संबंधित कार्य, पाक-कला और रूपांतरण से संबंधित कार्य, शस्त्र या नुकीली वस्तुओं से संबंधित कार्य, चिकित्सा या शल्य चिकित्सा संबंधी कार्य, विवाद या साहसिक कार्य यथा अग्निहोत्र, यज्ञ, हवन, अग्नि पूजा या ज्वाला से जुड़े अनुष्ठान, धातुकर्म, बाल कटवाना (shaving/haircut), पुरानी वस्तुओं को काटना, खर-पतवार हटाना, संक्रमित पेड़ काटना, पुरानी इमारत तोड़ना, या किसी बाधा को हटाना, खाना बनाना (cooking), मक्खन से घी बनाना, सिलाई (sewing), कढ़ाई (embroidery), या सूक्ष्म काम जो काटने-जोड़ने से संबंधित हों, किसी वस्तु को गर्मी/अग्नि से परिवर्तित करना, शस्त्र धारण करना, हथियार बनाना या सुसज्जित करना, तलवार/चाकू जैसी वस्तुओं का निर्माण, ट्यूमर या संक्रमित भाग हटाना, या सटीक कटाई वाली मेडिकल प्रक्रियाएंँ, बहस (debates), शत्रु पर विजय, सैन्य रणनीति, या साहसिक/तीक्ष्ण कार्य, आग से जुड़े विस्फोटक/रसायन संबंधित कार्य कृतिका नक्षत्र में सिद्ध और शुभप्रद परिणाम देने वाला हैं। यह शुद्धिकरण (purification), विनाश और वध के लिए बहुत अनुकूल है।
यह युद्ध, विजय, नेतृत्व, दहन शक्ति, शुद्धिकरण (Purification), रूपांतरण (Transformation), यज्ञ की ऊर्जा, प्रकाश और साहस का प्रतीक हैं।

Table of Contents
ज्योतिषीय संकेतात्मक विवरण || Kritika Nakshatra Symbolic Description
कृतिका नक्षत्र के देवता कार्तिकेय हैं। मतांतर से इसके अधिष्ठाता देवता – अग्नि भी हैं। पौराणिक आख्यानों के आधार पर संक्षिप्त कथा ये हैं कि— तारकासुर के वध के लिए, शिव के तेज से अग्निमय अंश उत्पन्न हुआ, जिसे अग्निदेव ने धारण किया, पश्चात इसे गंगा को सौंप दिया, गंगा भी इस तेज को सहन न कर पाईं और उन्होंने इसे शरवन वन (सरकंडे के जंगल) या एक सरोवर में छोड़ दिया। वहाँ इस दिव्य तेज से 6 बालक (या एक बालक के 6 रूप) प्रकट हुए। उसी समय छह कृत्तिका देवियांँ वहाँ आईं। उन्होंने इन 6 बालकों को अपना स्तनपान कराया और मातृत्व से पाला-पोसा। बाद में माता पार्वती ने इन छः बालकों को एकीकृत कर षडानन (6 मुख वाले) कार्तिकेय का रूप दिया।
कृतिकाओं द्वारा पालन-पोषण किये जाने के कारण हीं उनका नाम ‘कार्तिकेय’ पड़ा। तेज से छिटके होने के कारण इनका एक नाम ‘स्कन्द’ भी हैं। महाभारत के अनुसार ये अग्नि और स्वाहा के पुत्र हैं, अतः ये अग्निभू /आग्नेय भी हैं। दक्षिण भारत में कार्तिकेय को ‘सुब्रमण्यम स्वामी’ वा ‘मरुगन स्वामी’ के नाम से पूजा जाता हैं। सुब्रमण्यम का अर्थ हैं– ‘ब्रह्म विद्या का ज्ञाता’। मरुगन का शाब्दिक अर्थ हैं– सुन्दर, यौवन से युक्त, तरुण।
इस प्रकार भी कृतिकाओं पर अग्नि का प्रभाव पुष्ट होता हैं। वेदों में इन्द्र के बाद अग्नि हीं सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता हैं। ये हविष्यों को देवताओं तक न्यायपूर्ण तरीके से पहुंचाने वाले, विनाश व शुद्धिकरण के प्रतीक हैं। ये 10 दिक्पालों में से एक, आग्नेय दिशा (दक्षिण-पूर्व) के स्वामी हैं। पुराणों में इन्हें सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का पुत्र माना गया हैं।
तैतरीय ब्राह्मण में 7 कृत्तिकाओं के नाम, “अम्बा, दुला, नितत्नी, अभ्रयन्ती वा अञ्जयन्ती, मेघयन्ती, वर्षयन्ती और चुपुणिका” हैं। बाद के पौराणिक ग्रंथों यथा स्कन्द, मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड आदि पुराणों में ‘शीवा, संभूति, प्रीति, सन्नति, अनसूया और क्षमा’ — इन 6 कृत्तिकाओं के नामों का आख्यान प्राप्त होता हैं, जहाँ इन्हें हीं अग्निस्वरूप ‘कार्तिकेय’ को अपना दूध पिलाकर, पालन-पोषण करने वाली माताओं के रुप में चिन्हित किया गया हैं।
विष्णु पुराण, शिव पुराण, पद्म पुराण आदि में एक कथानक अनुसार— संभूति, स्मृति, अनसूया, प्रीति, क्षमा, सन्नति और अरुंधती ये 7 सप्तर्षियों की पत्नियांँ हैं। कथा में 6 पत्नियाँ (अरुंधती को छोड़कर) को अग्नि से संबंधित बताकर अलग कर दिया गया, और वे आकाश में कृतिका नक्षत्र बन गईं।
- संभूति — मरीचि की पत्नी
- स्मृति — अंगिरा की पत्नी
- अनसूया — अत्रि की पत्नी
- प्रीति — पुलस्त्य की पत्नी
- क्षमा — पुलह की पत्नी
- सन्नति — क्रतु की पत्नी
- अरुंधती — वसिष्ठ की पत्नी (यह सातवीं है)
अतः उपरोक्त पौराणिक कथानकों से स्पष्ट होता हैं कि, ‘कृतिकाएँ’ अग्नि तत्व, युद्ध व शस्त्र से युक्त, वीर पुरुष की जननी, अत्यंत तेजोमयी, ब्रह्म विद्या की ज्ञातृ, सुन्दर यौवन से युक्त अमोघ प्रचण्ड देवियाँ हैं। अतः कृतिका नक्षत्र भी इन सब गुणों का प्रतिनिधित्व करता हैं।
कृतिका नक्षत्र की मूल विशेषताएँ || Basic Characteristics of Kritika Nakshatra
तेज, नेतृत्व, आत्म-सम्मान, ऊर्जा, शुद्धिकरण, यज्ञ, प्रकाश, परिवर्तन, क्रियाशीलता, महत्वाकांक्षा, तीव्रता, साहस, काटने, छांटने, शुद्ध करने, नई शुरुआत की शक्ति, दहन शक्ति, अशुद्धि को जलाने और सत्य को उजागर करने की क्षमता, दृढ़ इच्छाशक्ति, सफल नेता, सेनापति या प्रशासक, ईमानदार, उदार, सामाजिक, अतिथि सत्कार में कुशल, विशेष व प्रबल मैत्री संबंध वाले, बुद्धिमत्ता, तीक्ष्ण बुद्धि, स्पष्टवादिता, आलोचनात्मक दृष्टिकोण, प्रभावशाली व्यक्तित्व, ऊर्जावान, सक्रिय, नई चीजें सीखने को इच्छुक, रचनात्मक, कलात्मक रुचि (अभिनय, कला, पाककला आदि), शत्रु दलन, रोमांटिक स्वभाव, आत्मविश्वासी, स्वतंत्र, निर्भीक, लक्ष्य-उन्मुख, उग्र स्वभाव, क्रोधी, कटु वाणी वाला स्वभाव (तीक्ष्ण जीभ), अधीर, जिद्दी, अस्थिर मन, कभी-कभी आवेगी, आकर्षक व्यक्तित्व, सुंदर/मनमोहक छवि, मजबूत शरीर, चौड़े कंधे, तेज चाल, तेजस्वी चेहरा, नेतृत्व, प्रशासन, रक्षा, शिक्षा, कला, व्यवसाय, राजनीति, अग्नि वा ऊर्जा से जुड़े क्षेत्र जैसे खाना बनाना, धातु कार्य, परमाणु उर्जा, विद्युत ऊर्जा, जठराग्नि वा पाचन संबंधी समस्या, आंँखें, दांँत, त्वचा या अग्नि-तत्व से जुड़ी बीमारियांँ (ज्वर, भूख आदि), मुंहासे, चोट, फोड़े-फुंसी, चक्कर आना, ट्यूमर, युद्ध, क्रांतिकारी, आंदोलन, बाहुबल, प्रबल ऊष्मा, द्वंद, एकरुपता, नुकीले हथियार, आग्नेयास्त्र (बंदूक आदि), विनाश, कब्जा/हड़पना, विदेशी संपर्क वा विदेशी व्यापार है, मानचित्र कला, मूर्तिकारी, रेशम, फोटोग्राफी, रेशम, अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय, चिकित्सा विभाग, उद्योग, इंजीनियरिंग, कर विभाग (Tax department)आदि कृतिका नक्षत्र की विशेषताएंँ हैं। कामाग्नि की अधिकता से अवैध यौनाचारी होना, इस नक्षत्र के प्रमुख गुणों में से एक हैं।
वराह मिहिर कहते हैं कि— श्वेत पुष्प, अग्निहोत्र, मंत्रज्ञ, यज्ञ शास्त्र को जानने वाले, वैयाकरण, खान, आकारिक अर्थात कारीगर जो वस्तुओं को निश्चित आकार देते हैं; हजाम / नाई, ब्राह्मण, कुम्भार, पुरोहित, ज्योतिषी; इन सबका प्रतिनिधि कृतिका नक्षत्र हैं। कृतिका नक्षत्रोत्पन्न जातक अधिक भोजन करने वाला, बलिष्ठ, तेजस्वी, किसी की नहीं सहने वाला, सर्वत्र प्रसिद्ध, पराई स्त्रियों में आसक्त होता हैं।
श्रीराम दैवज्ञ का कथन हैं कि— कृत्तिका नक्षत्र ६ ताराओं के योग से छुरा के समान स्वरूपधारी, अग्नि देवता बाला, अग्निवेश्य गोत्र बाला, सौम्य दारुण, अग्न्याधानादि कार्य, पाक, यज्ञ, यज्ञक्रिया, बगीचा, जहर, घात, चूल्हा बनाना, इष्टि, पशुओं का बन्धन, चौल, यज्ञोपवीत, उम्र कार्य, पशु पूजा, तेजस्वी कार्य, आयुध शस्त्र सम्बन्धी कार्य करना कृतिका नक्षत्र में सिद्धप्रद हैं । कृतिका नक्षत्र में विवाह, गृहप्रवेश, वधुप्रवेश, कर्ज का लेन-देन आदि नहीं चाहिए।
लग्न में कृतिका नक्षत्र के फल || Kritika Nakshatra Result in Ascendant
यदि लग्न में कृतिका नक्षत्र हो तो जातक सुन्दर, अग्नि सा तेजस्वी, तानेबाज, दूसरों की कमियांँ खोजने वाला, आलोचक, युद्ध करने को उद्यत, अस्त्र-शस्त्र, आतिशबाज़ी, आग्नेयास्त्र आदि का शौकीन, बलिष्ठ, यौवन से युक्त, अपेक्षाकृत कम बालों वाला अथवा सफेद /भूरे बालों वाला, अधिक भोजन करने वाला, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह, क्रोधी, अधीर, दूसरों का अधिकार छीनने वाला, अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में सफल, विदेशी मुद्रा व व्यापार में विशेष उन्मुख, स्वाभिमानी, सीमित वस्तुओं व संबंधों का प्रेमी, धनवान्, सम्मानित, महत्वाकांक्षी, घुमक्कड़, दण्ड देने, बन्धन करने व शत्रुओं का दलन करने में समर्थ, आक्रामक, विशेष परिस्थितियों में घात, धोखा, जहर देने से ना हिचकने वाला, तुनकमिजाज, रतिक्रिया का अति प्रेमी, अवैध संबंधों वाला, तीव्र, गतिशील होता हैं।
कृतिका नक्षत्रोत्पन्न पुरुष जातक के गुण-दोष (Qualities of Male Chart/ Horoscope born in Kritika Nakshatra) : राशि विभाग के अनुसार कृतिका दो राशियों में विभक्त होती हैं। इसका प्रथम चरण मंगल के स्वामित्व वाली मेष राशि के अंतर्गत व अन्य तीन चरण शुक्र के स्वामित्व वाली वृषभ राशि के अंतर्गत आता हैं। अतः कृतिका के प्रथम चरणोंत्पन्न जातक अन्य तीन चरणोंत्पन्न जातकों की तुलना में आक्रामक, फुर्तीला, उग्र, हिंसात्मक, प्रतिस्पर्धा के गुणों वाला होता हैं। अन्य तीन चरणों में अपेक्षाकृत कोमलता, कल्पनाशीलता, सौन्दर्यदर्शिता, प्रेम, कलात्मक दृष्टिकोण की अधिकता होती हैं। कृतिका पुरुष जातक के उभयनिष्ठ गुणों में यह हैं कि– जातक मध्यम कद-काठी का, चंचल, झगड़ालू, अच्छी सामान्य सेहत वाला, मांसल गर्दन, लम्बी नाक, उग्र उर्ध्व दृष्टि, सुन्दर, चेहरे पर तिल वाला, हाथों में मत्स्य का चिह्न वाला, समझदार, स्वाभिमानी, एकांतप्रिय, स्थिरमति, स्वतंत्र बुद्धि, निडर, घुमन्तू, मजबूत, महात्वाकांक्षी, कलात्मक, रक्षात्मक, प्रशासनिक वृत्ति, कुशल नेतृत्वकर्ता, पिता से सहयोगी, परिवार से दूर रहने वाला, कम मित्रों वाला, व्यंग्यात्मक शैली में बोलने वाला, दूसरों के धन व स्त्री को हड़पने की इच्छा करने वाला, अद्वितीय वाहनों का शौकीन, खाने-पीने का शौकीन, रतिप्रिय, दूसरों के लिए अनुशासनप्रिय, तानाशाही प्रवृत्ति का होता हैं।
कृतिका नक्षत्रोत्पन्न स्त्री जातिका के गुण-दोष (Qualities of Female Chart/ Horoscope born in Kritika Nakshatra)
कृतिका नक्षत्रोत्पन्न जातिका के भी उपरोक्त वर्णित गुण-दोष होते हीं हैं; पुरुष जातक से अन्तर ये हैं कि— ये अतिसुंदर, रुपवती, बलवती, विशेष आकर्षण युक्त होती हैं। आजीवन संघर्षरत, कठोर व्रत-उपवास करने वाली, प्रबल स्त्रीत्व वाली, क्रूर, कटु अप्रिय बोलने वाली, चिंतित, रूखी, वियोगी होती हैं। यदि नक्षत्र पाप पीड़ित हुआ तो पति से दूर, वियोग वा संबंध विच्छेद की संभावना होती हैं। घर और बाहर (कार्यालय आदि में) दोनों जगह प्रभाव जमाने की आदत की वज़ह से, वैवाहिक जीवन असंतोषपूर्ण रहता हैं। गर्भधारण करने में प्रायः समस्याओं का सामना करनी पड़ती हैं।
प्रत्येक चरणों / पदों के फलों में सूक्ष्म विविधता || Kritika Nakshatra Subtel Result Variations in all 4 Charan (Padas)
कृतिका नक्षत्र प्रथम चरण (Kritika Nakshatra First Charan/ Padas): मेष राशि अंतर्गत 26° अंश 40° कला से 30° अंश तक का विस्तार क्षेत्र कृतिका नक्षत्र का प्रथम चरण हैं। नवमांश धनु होने से इस चरण का स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। अतः कृतिका के प्रथम चरण पर मंगल-सूर्य-गुरु का संयुक्त प्रभाव हैं। उग्रता, आक्रामकता, दानशीलता, प्रशासनिक व्यवहार, परोपकार, विद्वत्ता, महानता, समरसता, उदारता, सैन्य संचालन, संगठनात्मक शक्ति, महात्वाकांक्षा, प्रबल इच्छाशक्ति, अनावश्यक विचरण करना आदि कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण का मूल गुण हैं।
कृतिका के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक लम्बा हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला, चौड़ा कंधा, विशाल छाती, उच्च ललाट, लम्बे झूले हुए कान वाला, लम्बा मुखाकृति, घूमने-फिरने का शौकीन, ज्ञान-विज्ञान में रुचि रखने वाला, निडर, कर्मठ, दीर्घायु, शिक्षित, विभिन्न राजकीय व अंतराष्ट्रीय सम्मानों से सुसज्जित, अनुशासनप्रिय, साधारण रोगी, धनवान्, मूल्यवान वस्तुओं का भोग करने वाला, विशेष पुरुषोचित गुणों वाला, निर्दयी, शोषणकारी, कठोर हृदय होता हैं।
कृतिका नक्षत्र द्वितीय चरण (Kritika Nakshatra Second Charan/ Padas) : वृषभ राशि अंतर्गत 00° अंश से 03° अंश 20′ कला तक का विस्तार क्षेत्र कृतिका नक्षत्र का द्वितीय चरण हैं। नवमांश मकर होने से इस चरण पर शुक्र-सूर्य-शनि का संयुक्त प्रभाव हैं। अनुशासन, न्यायप्रियता, नीति-नियम, चारित्रिक पुष्टता, रचनात्मक दक्षता, आदि से संबंधित सौन्दर्य बोध, कृत्तिका नक्षत्र के द्वितीय चरण के मूल गुण हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में उत्पन्न जातक सांवले रंग का, क्रूर प्रकृति, नीच कर्म करने वाला, परंपरा विरोधी, कलहप्रिय, देवता, गुरु, ब्राह्मणों का विरोधी, धर्म युक्त मतों का विरोधी, दूसरों को अधर्म करने को प्रेरित करने वाला, धनी, मेहनती, नीतिज्ञ, प्रसिद्ध, यशस्वी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र तृतीय चरण (Kritika Nakshatra Third Charan/ Padas) : वृषभ राशि अंतर्गत 03° अंश 20′ कला से लेकर 06° अंश 40′ कला तक के विस्तार क्षेत्र में कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण का वास हैं। नवमांश कुंभ होने से कृतिका के तृतीय चरण पर शुक्र-सूर्य-शनि का संयुक्त प्रभाव हैं। परिपक्वता, ज्ञान, सेवा, मनुष्यता, भविष्य दर्शन, कर्तव्य बोध, अनावश्यक विचरण करने, कुरुपता, बहादुरी, कीर्ति आदि कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण के मूल गुण हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में उत्पन्न जातक बड़ा सिर, गंभीर दृष्टि, अल्प बुद्धिमत्ता, बड़ा मुख, बहादुर, घमण्डी, क्रोधी, झूठा, परस्त्रीगामी, भौतिकता में प्रायः सफल, धन के प्रति भाग्यशाली, यशस्वी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र चतुर्थ चरण(Kritika Nakshatra Fourth Charan/ Padas) : वृषभ राशि अंतर्गत 06° अंश 40′ कला से लेकर 10° अंश तक का विस्तार क्षेत्र, कृतिका नक्षत्र का चतुर्थ चरण हैं। नवमांश मीन होने से, इस चरण का स्वामी भी गुरु हैं। अतः कृतिका के चतुर्थ चरण पर शुक्र-सूर्य-गुरु का संयुक्त प्रभाव हैं। शालिनता, आध्यात्मिक वृत्ति, परम सौन्दर्य, सूक्ष्म ज्ञान, समग्र प्रभाव, अप्रतिम रचनात्मकता, जीव कल्याण, परोपकारी वृत्ति, दानशीलता आदि कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण के गुण हैं।
कृतिका के चतुर्थ चरण में जन्मा व्यक्ति सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ, कोमल अंगों वाला, बड़े नयन नक्श वाला, यज्ञादि धर्म-कर्म में रुचिवान, परोपकारी, स्थिर-मति वाला, विनम्र, दानशील, कुटनीतिज्ञ, घमण्डी, धन-धान्य से पूर्ण, उद्विग्न, शास्त्रों में रुचि वाला, मानसिक अशांति व संक्रमण से पीड़ित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के विभिन्न चरणों / पदों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फल || Result of various Planets situated in different Charan/ Padas of Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित सूर्य फल || Result of Sun in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में सूर्य हो हो तो जातक हिंसक, दूसरों की संपत्ति हड़पने वाला, लड़ाई-झगड़ा करने को उद्धत, अस्त्र-शस्त्र व अग्नि से दुर्घटना ग्रस्त, धन कमाने में विपत्तियों का सामना करने वाला, ज्योतिष, तंत्र, पारलौकिक विद्याओं में रुचि वाला, पित व जठराग्नि से संबंधित रोगों वाला, घाव फोड़े-फुंसी, रुसी आदि चर्म रोग, बालों, आँखों से संबंधित समस्याओं से पीड़ित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में सूर्य हो तो जातक दीर्घायु, बल-आयुष्य से पुष्ट, सिद्ध तीव्र बुद्धिमत्ता वाला, सुन्दर, अनुशासनप्रिय, धर्म-कर्म में निष्ठावान, कला, नाटक, अभिनय आदि में रुचिवान्, जीवन के उत्तरार्ध तक शनै-शनै अतुलित धनवान् होने वाला, परिपक्व, प्रचुर भौतिक सुख भोगने वाला, धन-धान्य संतत्तियों से युक्त होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में सूर्य हो तो जातक को बालारिष्ट (बाल्यकाल में हीं मृत्यु वा मृत्यु से बाल-बाल बचने जैसी गंभीर दुर्घटना) होता हैं। यदि जीवित बच जाए तो कठिनाई से साधारण जीवन जीने वाला, कारीगर, मिस्त्री, हलवाई, नाई, हजाम, ठठेरा, बढ़ई जैसे कार्यों से जीविकोपार्जन करने वाला, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, श्वसन रोग, मानसिक रोग, हिस्टीरिया, एड्स आदि रोगों से पीड़ित होता हैं। जातक की जीवनशैली अच्छी नहीं होती। कोई-कोई जातक भिक्षाटन करके जीवन जीने को विवश होता हैं। शुभ ग्रहों का प्रभाव इस नक्षत्र पर हो तो जोखिम थोड़ा कम हो जाता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में सूर्य फल (Result of Sun Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में सूर्य हो तो जातक विद्वान, शास्त्रज्ञ, चंचल, आवेगी, घमण्डी, क्रूर, अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त, परिजनों से मतभेद वाला, खर्चीला, भटकने वाला, शत्रुओं से घिरा, हैजा, टाइफाइड, पेचिस, डायरिया, जियार्डियासिस, पोलियो आदि जल जनित संक्रमण से पीड़ित होता रहता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित सूर्य पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Sun located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित सूर्य पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक सुन्दर, दीर्घायु, कुटनीतिज्ञ, प्रसन्नचित्त, विद्वान, सरल स्वभावी, गुणी, सबको प्रसन्न करने की इच्छा वाला, रतिप्रिय, अधिक मित्रों वाला होता हैं। यदि महिला जातक हो तो अत्यधिक पुरुषों से संसर्ग करने के कारण यौनरोगों से पीड़ित, दूषित चरित्र वाली होती हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक उग्र, प्रभावशाली, न्यायप्रिय, स्पष्टता से बोलने वाला होता हैं। यह समाज का मार्गदर्शक, मुखिया, सरपंच, विवादों का निपटारा करने वाला, प्रसिद्ध, सम्मानित होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक शिक्षित, उच्च पदासीन, कुलभूषण, धन-धान्य से युक्त, नेताओं और मंत्रियों का मार्गदर्शक, विपुल संपत्तियों का स्वामी होता हैं।
शनि से दृष्ट हो तो पिता के सुख से वंचित, अस्वस्थ, दीन-हीन, कलुषित विचार वाला, दुर्जनों की संगति वाला, नीच लोगों का नौकर / दास होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो बाल्यावस्था से रोगी, मलीन आत्मा, स्वजनों से वैर रखने वाला, मनोरंजन प्रिय, कौटुंबिक व्याभिचार करने वाला होता हैं।
केतु से दृष्ट हो तो विशाल मुख वाला, उद्विग्न, कुल का नासक, कलहप्रिय, माता व पारिवारिक स्त्रियों को क्षति पहुंचाने वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित चन्द्रमा का फल || Result of Moon in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में चन्द्रमा हो तो जातक समाज द्वारा भयभीत, अभिचार कर्मों (मारण, सम्मोहन आदि) में रुचिवान्, उग्र, हिंसक, पशु आदि की हत्या से जीविकोपार्जन वाला, रक्तिम नेत्र, क्रूर, दिखावा करने में माहिर, अत्यधिक अवैध संबंधों में लिप्त, बात-बात पर रोने वाला, निर्दयी, कलुषित विचार का होति हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में चन्द्रमा 3° अंश पर परम उच्च अंश को प्राप्त होता हैं। अतः कृतिका के प्रथम चरण में चन्द्रमा विशेष बल से युक्त जातक को गौरवर्णी, सुन्दर, जीवंत, ऊर्जा शक्ति व उत्साह से भरपूर, आकर्षक, विद्वानों द्वारा पूजित, गणितज्ञ, विज्ञान, खगोल, आधुनिक अनुसंधानों में रुचिवान्, समृद्ध, प्रसन्नचित्त, सबका हितैषी, प्रेम-माधुर्य से युक्त, संवेदनशील, यदा-कदा भावुकता वश दुःखी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में चन्द्रमा हो तो जातक श्यामवर्णी, लम्बे कद-काठी का, भारी वज़नी, कठोर श्रम करने वाला, अधिक खाने वाला, भुक्कड़, आलसी, धन संग्रह में विलंब, जीवनसाथी से वियोगी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में चन्द्रमा का फल (Result of Moon Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में यदि चन्द्रमा हो तो चंचल, उद्यमी, मध्यम कद-काठी का किन्तु बलवान, आध्यात्मिक ज्ञान की ओर उन्मुख, धनवान्, दानशील, धर्मज्ञ, व्यापार व्यवसाय में उत्कृष्ट, सांसारिक, उदर व पाचन शक्ति से संबंधित रोगी, नेत्र रोगी, ससुराल पक्ष से नाराज़, उदात्त, प्रतिस्पर्धी, कफ रोगी, समय का पूर्वानुमान करने की दक्षता वाला, पीड़ित, शोषित, समाज से स्वयं की प्रसंशा सुनने की इच्छा वाला, अपनी छवि के प्रति विशेष ध्यान देने वाला, स्वास्थ्य के प्रति सचेत होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित चन्द्रमा पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Moon located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित चन्द्रमा पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक विपुल विरासत वाला, अचल संपत्तियों से युक्त, समृद्धशाली, सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से युक्त, स्त्री मित्रों के सहयोग से प्रतिष्ठित होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक परिजनों का प्रिय, पुरुषार्थी, स्त्री लोलुप, फूट डालने वाला, जीवनसाथी को कष्ट पहुंचाने वाला, संपत्तिवान, अवैध वा विवाहेत्तर संबंधों में रहने वाला, भरी जवानी में जीवनसाथी का अरिष्ट होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो परोपकारी, व्यवहार कुशल, मित्रों से युक्त, जिद्दी, 38 वर्ष की आयु तक कार्य क्षेत्र में व्यापक बदलाव झेलने को विवश, दानशील, बुद्धिमान, दयावान होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो धन-धान्य से युक्त, विद्वान, शास्त्रों का ज्ञाता, उच्च शिक्षित, परामर्शदाता, समाज में ख्यातिप्राप्त चिकित्सा संबंधी व्यवसाय में प्रतिष्ठा प्राप्त करता हैं।
शुक्र से दृष्ट हो तो अति कोमल, सौम्य, विपरीत लिंगीयों का प्रिय, विशाल निवास स्थान वाला, उत्तम वाहनों से युक्त, लाव-लश्कर लेकर चलने वाला, अनेक स्त्रियों (स्त्री हैं तो पुरुषों को) को भोगने वाला होता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक आलोचक, कम मित्रों वाला, कल-पुर्जे बनाने वाला या मशीनों का व्यवसाय करने वाला, मातृस्नेह से वंचित, धीर-गंभीर, अपने विचारों का पक्का होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो उग्र कर्म करने वाला, हीन भावना से युक्त, धोखेबाज, विवाहेत्तर संबंधों में संलिप्त, क़त्ल करने की क्षमता वाला, धनिक, नेता-मंत्री आदि से सरलता से संपर्क साधने वाला, प्रौढ़ावस्था में जीवनसाथी को मृत्यु तुल्य कष्ट होते हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक आध्यात्मिक, परमज्ञान का इच्छुक, चर्म रोग व नस रोग से पीड़ित, अत्यंत गुस्सैल, आत्महत्या की और बार-बार उन्मुख होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित मंगल ग्रह का फल || Result of Mars in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में मंगल हो तो जातक उग्र, प्रभावशाली, शासक, दण्डनायक, सेना, संगठन, पुलिस आदि का उच्च अधिकारी, न्यायाधीश, सदन का अध्यक्ष, वित्तीय अधिकारी, मंत्रालय का सदस्य वा अधिकारी, किसी गुट का सरदार / मुखिया, प्रसिद्ध नायक होता हैं। सत्ता व शक्ति के मद में दूसरों की पत्नियों से संबंध रखने वाला, उत्पीड़क भी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में मंगल हो तो जातक बाल्यकाल में रोग व दुर्घटना से क्षतिग्रस्त, परिपक्व, शांत स्वभावी किन्तु हिंसक, शत्रुंजय, सरकारी वा सहकारी क्षेत्रों से लाभान्वित, इंजीनियरिंग, अस्त्र-शस्त्र, कल-पुर्जे, मशीन आदि के क्षेत्रों से लाभान्वित, कुशल धन संग्रह करने के लक्षणों से युक्त होता हैं। स्त्री जातक, पुरुषों जैसे कठोर अंगों वाली होने से, उनके लिए गर्भ धारण करना चुनौतीपूर्ण होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में मंगल हो तो जातक भारी-भरकम शरीर वाला, कुशल व्यवसायी, परिपक्व ज्ञानी, निश्चय पूर्वक जीवन में अनुशासन से आगे बढ़ने वाला, बातचीत करने में विशेष चतुर, मध्यम चाल से सब पर अंकुश लगाने वाला, धार्मिक, अचल संपत्ति और निवेश में विशेष रुचि रखने वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में मंगल फल (Result of Mars Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में मंगल हो तो जातक मध्यम आकार का, भरे हुए मुखाकृति, सुखी, समृद्ध, चंचल, जलीय यात्राओं का शौकीन, कुशल व्यवस्थापक, सौन्दर्य प्रसाधन, रसायन, औषधि, पाक कला आदि से धनवान होता है। जीवन के उत्तरार्ध में विशेष सफल और समृद्धशाली होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित मंगल पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Mars located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित मंगल पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक क्रूर, आक्रामक, स्वजनों का द्रोही, वाहन वा अग्नि दुर्घटना से पीड़ित, लकवा रोगी, भड़कीला, पत्नी से वैर करने वाला होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो धन कमाने वाला, जोखिम लेने से लाभान्वित, मातृ द्रोह करने वाला, निर्माण कार्यों में लाभी, एक से अधिक विवाह के योग बनते हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक उग्र व भड़काऊ कहानी-कविता साहित्य लिखने वाला, कमज़ोरों पर दयालु, शासक वर्गों की आलोचना करने वाला, मिष्ठान प्रेमी, कलात्मक रुचि वाला, मध्यम मार्ग पर चलने वाला होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो खेलकूद व युद्ध कला की शिक्षा देने वाला, खिलाड़ी, कोच, मार्शल आर्ट्स में रुचि रखने वाला, Gym Trainer, सेना का मार्गदर्शक, उच्चस्तरीय अधिकारी होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो नृत्य-संगीत में निपुण, पाक कला का जानकार, जौहरी, आभूषण बनाने वाला कारीगर, रक्षा व सैन्य विभाग में कर्मचारी, मैनेजमेंट में निपुण होता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो बाल्यावस्था में दुर्घटना ग्रस्त, तंत्रिका व नस रोग से पीड़ित, प्रौढ़ावस्था, आते-आते शनै शनै धनी, नौकरी पेशा में सफल, समाज में सम्मानित होता हैं। वैवाहिक जीवन क्लेशपूर्ण होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक जुमलेबाज, हिंसक, धोखेबाज, घात लगाकर स्वजनों को छलने वाला, कठोरभाषी, सामान्य धनी, सबको अपमानित करके प्रसन्न होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो पराक्रमी, ओजस्वी, बलवान, परिश्रम व कठिन संघर्ष से शिक्षित, ईश्वर भक्त, क्रूर, विचलित, ज्यादा सोच-विचार किये बगैर कार्य करने वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित बुध फल || Result of Mercury in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में बुध हो तो जातक चंचल, उत्साही, वाद-विवाद में निपुण, अभिनय, लेखन, कलात्मक रचना, संगीत, व्यापार-व्यवसाय, वित्तीय अधिकारी, राज कर्मचारी, तंत्रिका तंत्र व नस रोग विशेषज्ञ, मस्तिष्क पर अनुसंधान करने वाला, समाज में आदरणीय, विशेष लोकप्रिय, प्रचुर यौनसुखी, प्रख्यात डॉक्टर वा अनुसंधानकर्ता होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में बुध हो तो जातक सुन्दर, अच्छी-खासी शारीरिक गठन वाला, प्रसन्नचित्त, दीर्घायुष्य से पुष्ट, व्यापार प्रेम संबंधों वाला, व्यापार-व्यवसाय में कुशल, नीतिज्ञ, गणना, ज्योतिष, मंत्र साधना का ज्ञाता, सिद्ध पुरुष होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में बुध हो तो जातक दर्शन शास्त्र का ज्ञाता, पर्यटक, धीमा बोलने वाला, विशेष आकर्षण से युक्त, परिपक्व, कम मित्रों वाला, पौरुष शक्ति से ओजस्वी, सबका प्रिय होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में बुध फल (Result of Mercury Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में बुध हो तो जातक व्यापार-व्यवसाय का नियम बनाने वाला, ईमानदार, परिश्रमी, विशेष बुद्धिजीवी, विद्वानों द्वारा पूज्य, मोटापा से संबंधित रोग से पीड़ित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित बुध पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Mercury located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र में स्थित बुध पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक सौम्य, ललित कला प्रेमी, कविता व साहित्य में रुचिवान, गोल मुखाकृति वाला, अति मित्रों वाला, यशस्वी, धनी, मानी, प्रेयसियों का प्रिय, प्रचुर यौनाचारी होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक बाल्यकाल से वा जन्मजात रोगी, परिवार वियोगी, अस्थिर कार्य व्यवसाय वाला, विवाह में देरी अथवा विवाह नहीं होने के योग बनते हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक अस्त्र-शस्त्र का निर्माता, आयुध सामग्रियों का विक्रेता, राजनीतिक पदों पर आसीन, प्रबंधक, साहित्य रचना वा विद्वतापूर्ण कृत्यों से प्रसिद्धि प्राप्त करता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक कठिन परिश्रम में आजीविका प्राप्त करने वाला, नौकरी पेशा वाला, यदा-कदा कर्ज के चपेट में आने से धीरे-धीरे प्रगतिशील, पत्नी व संतान द्वारा अपमानित होता रहता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक व्यापार व्यवसाय कुशल, स्टेशनरी, नकली आभूषण, सिलाई-कढ़ाई, सस्ते नशे वा तम्बाकू आदि के कारोबार से धनी होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो प्राचीन ग्रंथों का अध्ययनकर्ता, पुरातत्व में रुचि रखने वाला, गुढ़ दर्शन का व्याख्याता, भेद जानने को इच्छुक, गुप्तचर एजेंसियों द्वारा उपयोग में लाया जाता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित गुरु फल || Result of Jupiter in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में गुरु हो तो जातक उदात्त, श्रेष्ठ वृत्तियों वाला, गंभीर, सुन्दर, सद्गुणी, हृष्ट-पुष्ट, वीरोचित ताना-बाना वाला, शास्त्रार्थ में पारंगत, ज्योतिष, गणित, तर्क शास्त्र, वेदाङ्गो को जानने वाला, अपने अधिकार को छीन कर लेने वाला, पैतृक संपत्ति का उपभोगी, विलासितापूर्ण जीवनशैली वाला, संतत्तिवान, बहुत से कुलीन स्त्रियों का स्वामी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में गुरु हो तो जातक प्रभावशाली, उच्च वर्गीय लोगों में आदरणीय, परिपक्व बुद्धि वाला, स्वेच्छाचारी, परिजनों में धनाढ्य, विद्या का दुरुपयोग करने वाला, क्षूद्र साधनाओं में लिप्त, यदा-कदा धन के लिए नीच कर्म करने वाला, वृद्धा स्त्रियों में आसक्त होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में गुरु हो तो जातक लम्बा कद-काठी का, बड़ा पेट वाला, शैक्षणिक वा प्रशासनिक विभाग में कार्यरत, मतलबी, सहकर्मियों का प्रिय किन्तु अपने से ऊपर के अधिकारियों को खटकने वाला, विद्रोही, कलमकार होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में गुरु फल (Result of Jupiter Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में गुरु हो तो जातक धर्मात्मा, परम ज्ञानी, सत्यवादी, बाल्यकाल में उद्दंड, किशोरावस्था से धन व प्रतिष्ठा कमाने वाला, परिजनों का सहायक, मोक्ष के लिए उन्मुख, तीर्थाटन करने वाला, जीवनसाथी के प्रति उदार व जीवनसाथी उसके लिए भाग्यशाली सिद्ध होते हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Jupiter located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित गुरु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक कुशल प्रबंधन, शासन-प्रशासन से प्रतिष्ठित, मंत्री आदि पदों पर आसीन, धन-वैभव से युक्त, दानी, यज्ञादि धर्म-कर्म करने वाला, पारिवारिक जीवन में सुखी, साधारण चोट-चपेट की संभावना होती हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक परिजनों का हितैषी, सुन्दर, सौम्य, सत्यव्रती, परोपकारी, माता-पिता का दुलारा, स्थिर धनवान् होता हैं। प्रेम विवाह होंने की संभावना बनती हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक नेता, मंत्री पदों पर आसीन, समाज का नायक, जमींदार, अधिकारियों द्वारा सम्मानित, विलक्षण, दानशील, धन का लेन-देन का व्यापारी, धन देकर परस्त्रीगमन करने वाला होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक प्रभावशाली वक्ता, वकील, न्यायिक विभागों में रुचिवान्, नीति मर्मज्ञ, तंत्र-मंत्र का साधक, चंचल, चतुर, सबका हितैषी, गुढ़ कार्यों में रुचिवान् होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर, कोमल अंगों से युक्त, वेदविद्या में प्रवीण, ब्रह्मज्ञानी, धनी, मानी, विश्वविख्यात, प्रकाण्ड पंडित, स्त्री व संतान से सुखी होता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक परिपक्व राजनीतिज्ञ, नीति मर्मज्ञ, इतिहास का जानकार, कुटनीति में प्रवीण, अपने क्षेत्र में विशेष ज्ञानी, कार्यकुशल, कोचिंग आदि शैक्षणिक संस्थानों का प्रमुख, प्रशिक्षक, कुशल नेतृत्वकर्ता, परिश्रमी, जुझारू होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक एडिटर, संपादक, ब्रोकर, विवाह शादी आदि समारोहों का आयोजन करने वाला, अकाउंट्स, मैनेजमेंट आदि विषयों का विद्वान, कथावाचक, मठाधीश होता हैं। अपने शिष्यों वा अनुयायियों का लैंगिक शोषण करने वाला होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक अभिचार कर्म यथा मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण प्रयोग करने वाला, भूत-प्रेत आदि क्षूद्र शक्तियों का साधक, तीक्ष्ण हवन-होमादि करने वाला, मसाला, गंध, फूल-मालाओं का विक्रेता होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित शुक्र फल || Result of Venus in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में शुक्र हो तो जातक बल-वीर्य से पुष्ट, कोमल अंगों वाला, विद्या अध्ययनी, नेत्र व चर्मरोग वाला, अति कामुक, विशेष रंग-बिरंगे वस्त्राभूषणों का शौकीन, अल्प वय में विवाह होता हैं अथवा अनैतिकता में अल्प वय में हीं कौमार्य भंग होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में शुक्र हो तो जातक भावुक, प्रभावशाली, सुन्दर, स्वस्थ, जलीय यात्राओं का शौकीन, प्राचीन पारंपरिक वस्तुओं के व्यवसाय से धनी, न्यायिक वा प्रशासनिक विभाग से लाभान्वित, प्रतिष्ठित, प्रभावशाली लोगों के साथ अंतरंग संबंधों से स्वार्थ सिद्ध करने वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में शुक्र हो तो जातक सौय्य, शालिनता वाला, कर्तव्यनिष्ठ, विपरीत लिंगीयों के प्रति अत्यधिक आसक्त, धार्मिक उपदेशक, शिक्षक, प्रसाधन सामग्री, वस्त्र उद्योग, रत्नादि आभूषणों का व्यवसाय करने वाला, बीमा, ब्याज, निवेश से लाभान्वित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शुक्र फल (Result of Venus Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शुक्र हो तो जातक अत्यधिक कल्पनाशील, कवि, संगीत-नृत्य में रुचिवान्, स्वाध्ययन से विद्वान, दानशील, सजने-संवरने में रुचि रखने वाला, कलात्मक व रचनात्मक क्षेत्रों में सफल होता हैं। कोई-कोई जातक संन्यास धारण कर लेता हैं। तथापि ये प्रायः चरित्रवान् नहीं होते और आजीवन अवैध वा विवाहेत्तर संबंधों में संलिप्त पाए जाते हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Venus located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित शुक्र पर यदि—
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक सुकोमल, बड़े नेत्र, उच्च ललाट, उभरे हुए नितम्ब, यौवन से युक्त अति सुन्दर, कामकला मे निपुण, भावुक, प्रेम में धोखा खाने वाला, अनेक व्यक्तियों के साथ सहवास करने वाला / वाली होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो उत्तेजनापूर्ण क्रियाओं वाला, रक्तिम वर्ण वाला, विचलित, प्रेम व विवाह का बाल्यकाल से इच्छुक, उद्विग्न, जीवनसाथी के चुनाव करने में असमंजसपूर्ण, अति कामुक, हिंसात्मक रति करने वाला होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो जातक प्रचुर धन-संपदा से युक्त, एक से अधिक आय के स्रोत वाला, सरकार व असमाजिक तत्व दोनों से पूजित, स्वर्ण आदि बहुमूल्य धातुओं व रत्नों का संग्रहकर्ता, परिवार का मुखिया, पत्नी और संतान से सुखी होता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो जातक कृशकाय किन्तु सामान्य सुन्दर, बलवान, परिश्रमी, जिद्दी, अल्हड़, अपमानित, रिश्तों में कम लगाव रखने वाला, निर्मोही होता हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक आकर्षक, छलिया, उत्तम वस्त्राभूषणों का शौकीन, कामक्रीड़ा में प्रवीण, मलीन व्यक्तित्व के लोगों वा नीच स्त्रियों के साथ रतिक्रिया करने वाला, घृणित कार्यों में संलग्न होता हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक सुन्दर कद-काठी का, दीर्ध लिंगी, मैथुन प्रिय, भावनात्मक संबंधों में अधिक रुचि नहीं रखने वाला, मंत्रज्ञ, धातुकर्म व रासायन शास्त्र का जानकार, पारलौकिक विद्याओं में निपुण होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित शनि फल || Result of Saturn in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में शनि हो तो जातक कृशकाय, श्यामवर्णी, आलस्य युक्त, निर्धन, द्वेषपूर्ण व्यवहार वाला, कुटुम्बियों से वैर विरोध रखने वाला, अपशब्द युक्त भाषा का प्रयोग करने वाला, नीच, लम्पट, मुर्ख होता हैं। छोटे-मोटे व्यवसाय, नीच कर्म अथवा दास वृत्ति से आजीविका कमाता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में शनि हो तो जातक कृशकाय, चीमर शरीरी, पिंगल नेत्र, पिचके गालों वाला होता हैं। व्यवहार में कठोर किन्तु ईमानदार, स्पष्ट वक्ता, न्यायप्रिय, सूक्ष्म कारीगरी वाले कार्यों, व्यवस्था नियंत्रण आदि कार्यों में दक्ष होता हैं। प्रेम करने में उम्र की बाधा / सीमा नहीं मानता, अतः हर उम्र के विपरीत लिंगी मित्रों के साथ अनेक प्रेम संबंधों में संलिप्त होते हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में शनि हो तो जातक कठिन परिश्रम करने वाला, लम्बा किन्तु दुबला-पतला, कृषि, खनन, वन्य उत्पादों का व्यवसाय करने वाला, अति परिश्रम से धनवान, विवाह होंने में समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं; यदि विवाह हो भी जाए तो क्लेशपूर्ण वैवाहिक जीवन होता हैं। परिवार में कलह के कारण विरक्त होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शनि फल (Result of Saturn Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शनि हो तो जातक प्रायः सुन्दर, जिज्ञासु, समय का पाबंद, विद्या अध्ययनी, स्वच्छंद विचारों वाला होता हैं। परंपराओं के विरुद्ध, अनेक प्रेम संबंधों वाला, पत्नी/पति से पीड़ित, अप्राकृतिक मैथुन करने वाला, कमजोर, यौनरोगी, सौन्दर्य प्रसाधन वा अंतर्वस्त्र का व्यवसायी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Saturn located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित शनि पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक ओजस्वी, न्यायिक विभागों में रुचिवान्, स्पष्ट वक्ता, न्यायप्रिय, सामान्यतः शांतचित्त व प्रकृति प्रेमी, छेड़ने पर काल की तरह विकराल, प्रौढ़ावस्था तक धन व कार्यक्षेत्र में सफलता के लिए संघर्षशील, पिता व परिवार से मतभेद वाला, जीवन के उत्तरार्ध में सफल होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक उच्च विचारशील, चिंतित, आत्ममंथन करने वाला, राज्य व प्रशासनिक क्षेत्र से लाभान्वित, संपत्तिवान, मेहनती, दान-धर्म करने वाला, पैरों व कानों के रोग से पीड़ित होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक उग्र कर्म करने वाला, तीव्र, आक्रोशित, न्याय करने वाला, समाज का नायक, भड़कीला, कमज़ोरों व पीड़ित वर्ग का सहायक, स्वतंत्र, विजयी होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक पथभ्रष्ट, नीच जनों की संगति में समय व्यर्थ करने वाला, स्त्रियों का सेवक, कार्यस्थल पर सबका मनोरंजन करने वाला, सामान्य धनी, कर्ज़ से परेशान होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो शिक्षा वा शैक्षणिक संस्थानों का प्रमुख, सफल, परोपकारी, अहंकार से युक्त, खाद्य सुरक्षा व खाद्य पदार्थों से संबंधित कार्य करने वाला, अनुशासनप्रिय, जनता के प्रति उत्तरदायित्व का कठोरता से निर्वहन करने वाला होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक स्वार्थी, अहंकार से युक्त, यात्राप्रिय, पर्यटक, ठेकेदारी, जनसमर्थन, कागज़ी दस्तावेज संबंधित कार्यों से लाभान्वित होता हैं। कार्य के बदले लैंगिक शोषण करते हुए बदनाम होने के योग बनते हैं।
राहु की दृष्टि हो तो जातक निर्धन, परिवार से त्यक्त, दुःखी, आत्मकेंद्रित, कारीगर, हलवाई, सफाईकर्मी, नशेड़ी, हृदय, श्वसन व स्नायु तंत्र के दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित होता हैं। संक्रमण वा दुर्घटना के कारण अंग कटना, ऑपरेशन वा अंग प्रत्यारोपण की संभावना बनती हैं।
केतु की दृष्टि हो तो जातक शस्त्रधारी संन्यासी, भिक्षाटन करके खाने वाला, गाली व अपशब्द बकने वाला, हिंसक, प्रकृति प्रेमी, लम्बे जटा-जूट रखने वाला, बकवादी, दिव्यद्रष्टा, पथभ्रमित, लोभी, क्षोभित, कष्टकारी, स्वजनों का वैरी होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित राहु फल || Result of Rahu in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में राहु हो तो जातक चतुर, चालबाज, उग्र, क्रूर आचरण से संपत्तिवान, स्वस्थ, बलवान, कामुक, भ्रमणशील, लड़ाई करने के बहाने ढूंढने वाला, शत्रुओं का दलन करने में समर्थ, कपटी, दुर्घटना व रोग से पीड़ित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में राहु हो तो जातक सुन्दर, आकर्षक, सामान्यतया अच्छी आमदनी वाला, दिखावा करने वाला, सजने-संवरने का शौकिन, विदेशी मित्रों व विदेशी आय से संबद्ध, कामातुर, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के विपरीत लिंगीयों से संभोग करने वाला, संतत्तिहीन अथवा संतान से सुख की कमी वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में राहु हो तो जातक भौतिकता की दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ, धन कमाने वाला, उत्तम भवन-वाहन से सुखी, संभ्रांत जनों से मैत्री वाला, जुआ, सट्टा, लॉटरी से भी लाभान्वित, सुरा-सुंदरी का शौकीन होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में राहु फल (Result of Rahu Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में राहु हो तो जातक साधारण पूजा-पाठ करने वाला, यात्राप्रेमी, आवेगी, संगति के अनुसार शीघ्रता से प्रभाव अर्थात अच्छी संगति में अच्छा, बुरी संगति में बुरे कर्म करने वाला, आधा भौतिकतावादी आधा आध्यात्मिक, व्यग्र, विचलित, Personality crisis वा identity crisis का शिकार होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित राहु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Rahu located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित राहु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक बलशाली, राजकर्मचारी, नफ़रत व द्वेष की राजनीति करने वाला, झूठा, आत्म-कुंठित, परिजनों में क्लेश करने वाला, भूत-प्रेत व असाध्य बिमारियों से पीड़ित होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक षड्यंत्रकारी, झूठ बोलने वाला, मंत्र द्वारा सिद्धियों को पाने की इच्छा रखने वाला, गुरु से हीन, मनोरोगी, नीच वृत्तियों में लीन, लोहे के औजारों को बनाने वाला या साधारण छुरा-कैंची जैसे औजारों वाले कार्यों को करने वाला होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो जातक लम्बा चौड़ा कद-काठी का, फुर्तीला, असमाजिक तत्वों का मित्र, लड़ाई-झगड़ा करने वाला, धोखेबाज, भीषण रक्तपात से उत्साहित होता हैं।
बुध की दृष्टि हो तो जातक बीमा पॉलिसी, मार्केटिंग, लोन वितरण आदि क्षेत्रों में दक्षता से प्रदर्शन करने वाला, घोटाला, ठगी, जुआ-लॉटरी आदि के व्यवसाय में रुचिवान, नाच पार्टी, बैंड पार्टी से धन कमाने वाला, नीच स्त्रियों के साथ मुख मैथुन करता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो दिखावे के लिए धार्मिक वस्त्र धारण करने वाला, नास्तिक, वेदों व शास्त्रों का आलोचक, अपने मत का प्रचारक, स्वघोषित गुरु वा धर्माचार्य होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो अत्यंत मनमोहक, आकर्षक, क़ीमती मादक द्रव्यों का सेवन करने वाला, रत्नाभूषणों का शौक़ीन, अस्थाई प्रेम प्रसंगों में संलिप्त, अभक्ष्य का भक्षण करने वाला, अंग-प्रत्यंग का तस्कर हो सकता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो निर्धन, कुरुप, अंग में विकृती वाला, नीच, मलीन व्यक्तित्व वाला, कठोर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने वाला, दैनिक ज़रुरतों की पूर्ति करने जितना कमाने वाला होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित केतु फल || Result of Ketu in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in First Charan/ Padas in Kritika Nakshatra) : कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण में केतु हो तो जातक जातक उग्र, धातु व अग्नि से संबंधित कार्यों में निपुण, भविष्यदृष्टा, परमाणु, रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग आदि जैसे तकनीकी कार्यों से लाभान्वित, नेत्र, उदर व यौनांग से संबंधित रोग होते हैं।
कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Second Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के द्वितीय चरण में केतु हो तो जातक बाल्यकाल से हीं संघर्षशील, शिक्षा में व्यवधान का सामना करने वाला, कुलीन वर्गों द्वारा शोषण का शिकार, दूसरों का दास होता हैं। सस्ता नशीले पदार्थों में रुचिवान्, क्षूद्र स्त्रियों में रत होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Third Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में केतु हो तो जातक दीर्ध शरीर वाला किन्तु कुरुप, जीवन में आर्थिक स्थिति में भयंकर उतार-चढ़ाव वाला, भूत-प्रेत से पीड़ित, नीच व चरित्रहीन जीवनसाथी का वरण होता हैं।
कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में केतु का फल (Result of Ketu Situated in Fourth Charan/ Padas in Kritika Nakshatra): कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में केतु हो तो जातक आध्यात्मिक, ध्यान योग आदि करने वाला, निर्धनता और व्याधियों से पीड़ित, अनिश्चित कार्यक्षेत्र वाला, असफल प्रेम प्रसंगों वाला होता हैं। जीवनसाथी से घोर क्लेश व मारपीट जैसे हिंसा से पीड़ित होता हैं।
कृतिका नक्षत्र स्थित केतु पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि फल || Aspect Result of Various Planets on the Ketu located in Kritika Nakshatra
कृतिका नक्षत्र स्थित केतु पर यदि—
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक चंचल, अप्रत्याशित घटनाओं से दुःखी, परिवार में अस्थिरता, माता-पिता के कठोर व्यवहार से पीड़ित, घर से दूर रहने वाला, विपत्तियों में स्वजनों के सहयोग से वंचित होता हैं।
चन्द्रमा की दृष्टि हो तो अंदर से क्रोधी, ऊपर से शांत जैसे तुफान आने से पहले की ख़ामोशी हो, विरक्त, माता द्वारा शत्रुवत् व्यवहार से दुःखी, ईश्वर भक्त, कभी-कभी किंकर्तव्यविमूढ़ होता हैं।
मंगल की दृष्टि हो तो आक्रामक, युद्धकला में निपुण, शत्रुओं पर विजयी, सेनापति वा सेना में उच्चस्तरीय अधिकारी, राजा द्वारा सम्मानित, पृथ्वी को भोगने वाला, परस्त्रीगामी, दुर्घटनाओं से ग्रस्त होता हैं।
बुध से दृष्ट हो तो अटक-अटक कर या तुतला कर बोलने वाला, व्यापार-व्यवसाय में अरुचि वाला, व्यंग्यात्मक शैली में बोलने वाला, अगाध शत्रुओं से पीड़ित, चोरी वा छीना-झपटी करने वाला होता हैं।
गुरु की दृष्टि हो तो दर्शनशास्त्र का ज्ञाता, ब्रह्मविद्या का जानकार, ध्यानमग्न, उपदेशक, गृहत्यागी, जंगलो व पहाड़ों में विचरण करने वाला, कंदमूल का व्यापारी होता हैं।
शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर शारीरिक गठन वाला, मोटे होठ व चौड़ी नाक वाला, हिंसक, साधारण दुकानदारी से गृहस्थ संभालने वाला, कम बोलने वाला, अवैध संबंधों में हिंसक रति करने वाला होता हैं।
शनि की दृष्टि हो तो महाक्रूर, एकांतवासी, स्वादहीन भोजन करने वाला, कटे-फटे वस्त्र पहनने वाला, जीवन से विरक्त होता हैं।
उपसंहार || Important Considerations
किसी भी नक्षत्र में एक से अधिक ग्रह यदि युति /दृष्टि आदि संबंधों में होते हैं तो उनमें से सभी ग्रहों के बलाबल अनुसार जातक में गुण-दोषों का मिश्रण होता हैं। अर्थात यदि किसी नक्षत्र में दो या दो से अधिक ग्रह युति करे, तो जातक में उक्त ग्रहों के बलाबल के अनुपात में गुण-दोष की वृद्धि करेंगे। दृष्टि के संबंध में भी ऐसा हीं समझना चाहिए।
यदि कोई नक्षत्र भिन्न-भिन्न जातकों की कुंडलियों में भिन्न-भिन्न भावों में स्थित हो, तो उस भाव से संबंधित फलों के साथ अपने कारकत्वों को मिश्रित करके, जातक को संस्कारित फल प्रदान प्रदान करता हैं।
सूर्य के अत्यधिक सन्निकट होने से— बुध, सूर्य से 28° अंश और शुक्र, सूर्य से 48° अंश से ज्यादा दूर नहीं जा सकता, अतः सूर्य, बुध एवं शुक्र का आपस में दृष्टि संबंध नहीं होता।
राहु-केतु परस्पर सदैव 180° अंशों की दूरी पर होते हैं, अतः ये एक-दूसरे को सदैव पूर्ण दृष्टि से देख रहे होते हैं। इनमें से प्रत्येक के फलित में दूसरे का प्रभाव बिना कहे, सम्मिलित समझना चाहिए।
कृतिका नक्षत्रोत्पन्न महान व्यक्तित्व || Famous Personalities Born In Kritika Nakshatra
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस – का लग्न कृतिका नक्षत्र प्रथम चरण में था।
संजय दत्त (मशहूर भारतीय अभिनेता) – का चन्द्र कृतिका नक्षत्र द्वितीय चरण में था।
मार्क जुकरबर्ग (फेसबुक के संस्थापक) – का सूर्य कृतिका नक्षत्र प्रथम चरण में था।
फ्रीडा काहलो (विश्व प्रसिद्ध मैक्सिकन चित्रकार) – का चन्द्र कृतिका नक्षत्र चतुर्थ चरण में था।
बॉब डिलोन (नोबेल पुरस्कार विजेता, अमरीकी गीतकार) – का चन्द्र कृतिका प्रथम चरण में था।
[ उपरोक्त महान व्यक्तित्वों के जन्म नक्षत्र वा लग्न नक्षत्र का कृतिका में होने की पुष्टि उनकी पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जन्मकुंडली विवरण से की गई हैं। ]
~ Krishna Pandit Ojha..
WhatsApp:9135754051
संबंधित पोस्ट पर जाने के लिए दिए गये Link पर Click करें!
नक्षत्र (Nakshatra) क्या हैं.? विस्तृत व्याख्या
4• रोहिणी
5• मृगशिरा
6• आर्द्रा
7• पुनर्वसु
8• पुष्य
9• आश्लेषा
10• मघा
11• पूर्वाफाल्गुनी
12• उत्तराफाल्गुनी
13• हस्त
14• चित्रा
15• स्वाति
16• विशाखा
17• अनुराधा
18• ज्येष्ठा
19• मूल
20• पूर्वाषाढ़ा
21• उत्तराषाढ़ा
22• श्रवण
23• धनिष्ठा
24• शतभिषा
25• पूर्वा भाद्रपद
26• उत्तरा भाद्रपद
27• रेवती