नक्षत्र ( Nakshatra ) क्या हैं? || What is Nakshatra? || Complete Nakshatra List || Ruling Planet || Intro of Nakshatra for Kundali Matching
रात्रि के समय स्वच्छ आकाश में देखने पर असंख्य प्रकाशित पिण्ड दिखाई देते हैं। इनमें दो प्रकार के पिण्ड हैं— इनमें से कुछ पिण्ड अस्थिर हैं जो अन्य पिण्डों के सापेक्ष अपना स्थान बदलते रहते हैं, इनका प्रकाश स्थिर होता हैं, ये पिण्ड ‘ग्रह’ (Planet) कहलाते हैं। प्राचीन खगोलशास्त्र के अनुसार इन्हें ‘अस्थिर तारा’ कहा गया हैं। इनमें स्वयं का कोई प्रकाश नहीं होता, ये तारों वा सूर्य के प्रकाश के परावर्तन के कारण चमकते हैं।
दुसरे प्रकार के पिण्डों में जुगजुग करते टिमटिमाते पिण्ड हैं, जो अन्य पिण्डों के सापेक्ष अपना स्थान नहीं बदलते, प्राचीन खगोलशास्त्र के अनुसार उन्हें ‘स्थिर तारा’ कहा गया हैं। हालांकि ब्रह्माण्ड में कोई भी पिण्ड स्थिर नहीं हैं, और समस्त पिण्ड निरंतर चलायमान हैं, किन्तु पृथ्वी के सापेक्ष देखने पर वे इतने दूर हैं कि, वे स्थिर दिखाई देते हैं। बहुत अधिक समय में इनके स्थान में मामूली सा अंतर आता हैं; अतः दैनिक प्रयोग में इन्हें ‘स्थिर तारा’ कहा गया। ये स्थिर तारे (Stars) वा तारा पूंज (Clusters) ‘नक्षत्र’ (Constellation) कहलाते हैं। इनमें स्वयं का प्रकाश होता हैं, और ये स्वयं के प्रकाश से चमकते हैं।
यों तो अनन्त ब्रह्माण्ड में असंख्य तारे वा नक्षत्र भिन्न-भिन्न आकार, गुण व विस्तृत क्षेत्र विस्तार लिये हुए फैले हुए हैं। दूसरी शताब्दी ईस्वी तक ग्रीक खगोलशास्त्री सर क्लॉडियस टॉलेमी ने 48 तारामंडलों को खोजा था; जिसका वर्णन उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अल्मागेस्ट (Almagest)’ में किया हैं। इन तारामंडलों में राशिचक्र के मेषादि 12 तारामंडल, उत्तरी आकाश के 21 तारामंडल और दक्षिणी आकाश के 15 तारामंडल शामिल हैं। किन्तु अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU International Astronomical Union) आकाशीय सीमा का निर्धारण करते हुए अभी तक (04 अप्रैल 2026 तक) कुल 88 नक्षत्रों / तारामंडल (Constellations) को मान्यता दी हैं। इनमें एकल तारों से लेकर तारा समूह तक शामिल हैं। इन तारों के नाम उनकी आकृति के अनुसार इस प्रकार हैं—
1• Andromeda (देवयानी) 2• Antlia (पम्प) 3• Apus (खग / स्वर्ग का पंछी) 4• Aquarius (कुंभ /शतभिषा) 5• Aquila (गरुण /श्रवण) 6• Ara (वेदी) 7• Aries (मेष / अश्विनी-भरणी) 8• Auriga (प्रजापति) 9• Boötes (भूतेश / भूतेश्वर / स्वाति) 10• Caelum (तक्षणी) 11• Camelopardalis (जिराफ़) 12• Cancer (कर्क / केकड़ा / पुष्य) 13• Canes Venatici (मृग/शुन) 14• Canis Major (वृहद् श्वान / लुब्धक) 15• Canis Minor (लघु श्वान / श्वानिका) 16• Capricornus (मकर / समुद्री अज/बकरा) 17• Carina (नौतल) 18• Cassiopeia ( बैठी हुई रानी/ शर्मिष्ठा) 19• Centaurus (किन्नर /नरतुरंग / आधा मनुष्य आधा घोड़ा) 20• Cepheus (राजा / वृषपर्वा) 21• Cetus (तिमि / समुद्री राक्षस) 22• Chamaeleon (गिरगिट) 23• Circinus (ड्रॉइंग कम्पास / परकार) 24• Columba (कबुतर /पंडूक) 25• Coma Berenices (केश / रानी बर्निश के बाल) 26• Corona Australis (उत्तरी मुकुट) 27• Corona Borealis (दक्षिणी मुकुट) 28• Corvus (कौआ / हस्त) 29• Crater (कप) 30• Crux (दक्षिणी क्रॉस / स्वास्तिक) 31• Cygnus (हंस) 32• Delphinus (डॉल्फिन / उलूपी / धनिष्ठा) 33• Dorado (स्वोर्डफिश / असिमीन / तेगा मछली) 34• Draco (ड्रैगन / कालिय अजगर) 35• Equuleus (अश्वक / छोटा घोड़ा) 36• Eridanus (वैतरणी नदी) 37• Fornax (आँवाँ / भट्ठी) 38• Gemini (जोड़ा / पुनर्वसु / मिथुन) 39• Grus (बगुला) 40• Hercules (शौर्यवान / बलिष्ठ पहलवान जैसा पुरुष) 41• Horologium (घड़ी) 42• Hydra (वासुकी नाग / आश्लेषा) 43• Hydrus (जलीय सर्प / जलिका) 44• Indus (सिंधु) 45• Lacerta (छिपकली) 46• Leo (शेर / सिंह / मघा / पू.फा. / उ. फा.) 47• Leo Minor (छोटा शेर / सिंहिका) 48• Lepus (खरगोश) 49• Libra (तुला / विशाखा) 50• Lupus (भेड़िया) 51• Lynx (बनबिलार / वनविडाल) 52• Lyra (वीणा / अभिजित) 53• Mensa (शैल / सपाट पहाड़) 54• Microscopium (सूक्ष्मदर्शी) 55• Monoceros (श्रृंग / एकश्रंगी घोड़ा) 56• Musca (मक्षिका / मक्खी) 57• Norma (L आकार का बढ़ई का गुनिया / अंकिनी) 58• Octans (अष्टांश) 59• Ophiuchus ( सर्पधर / सर्प धारण करने वाला) 60• Orion [(The hunter शिकारी/ बहेलिया) (मृग / मृगशिरा / आर्द्रा)] 61• Pavo (मोर) 62• Pegasus (हयशिर / खगाश्व / पंख अथवा उड़ने वाला घोड़ा / पूर्वाभाद्रपद / उत्तराभाद्रपद) 63• Perseus (ययाति / असुर नाशक नायक) 64• Phoenix (अमर पंछी / माया पंछी) 65• Pictor (चित्रफलक / पेंटिंग स्टैण्ड मतांतर से चित्रकार) 66• Pisces (मीन / रेवती) 67• Piscis Austrinus (दक्षिणी मीन / दक्षिणी मछली) 68• Puppis (नाव का पिछला हिस्सा / डेक) 69• Pyxis (पेटिका / छोटा बक्सा / समुद्री दिक्सूचक) 70• Reticulum (जालिका) 71• Sagitta (शर / तीर) 72• Sagittarius (धनुर्धर / पूर्वाषाढ़ / उत्तराषाढ़) 73• Scorpius (बिच्छू / वृश्चिक / अनुराधा /ज्येष्ठा / मूल) 74• Sculptor (शिल्पी /मूर्तिकार) 75• Scutum (ढाल / आड़ / रक्षक) 76• Serpens (सर्प / नाग) 77• Sextans (षष्ठांश / कोणीय दूरी मापक यंत्र) 78• Taurus (बैल / वृषभ / कृतिका / रोहिणी) 79• Telescopium (दूरबीन / दूरदर्शी यंत्र) 80• Triangulum (त्रिकोण) 81• Triangulum Australe (दक्षिणी त्रिकोण) 82• Tucana (एक रंगीन टुकान पंछी) 83• Ursa Major (वृहत् सप्तर्षि / ऋक्ष / भालू) 84• Ursa Minor (लघु सप्तर्षि / ऋक्षिका / छोटा भालू / वर्तमान ध्रुवतारा) 85• Vela (नौका-पाल) 86• Virgo (कन्या / चित्रा 87• Volans (उड़ने वाली मछली / उड़नमछली) और 88• Vulpecula (लोमड़ी)।

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ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों की भूमिका || Introduction of Nakshatras in Astrology
जब हम ज्योतिष की प्राचीनता पर जाते हैं, तो इसके काल निर्धारण के बारे में कुछ भी ठीक से कहना असमंजसपूर्ण हैं। किन्तु इस बात से पुरा विश्व सहमत हैं कि ज्योतिष शास्त्र की प्रारंभिक देन भारतीयों की हैं। प्राचीन काल में राशियों का फलित में कोई स्थान नहीं था। तब खगोलीय वा फलित का आधार नक्षत्र हीं थे। और यह नक्षत्र पद्धति (Stellar System) समस्त विश्व को भारतीयों की देन हैं। जर्मन ब्रिटिश विद्वान मैक्समूलर कहते हैं कि— “भारतीय आकाशमण्डल और नक्षत्र मण्डल आदि के विषय में अन्य देशों के ऋणी नहीं हैं। वे ही इनके आविष्कर्ता हैं।” फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर (Voltaire) कहते हैं कि— “सब कुछ हमें गंगा के किनारों से आया है—खगोल विज्ञान, ज्योतिष, पुनर्जन्म आदि। जब हम जंगली और बर्बर थे, तब भारतीय और चीनी सभ्य और विद्वान थे।” फ्रांसीसी खगोलविद् और इतिहासकार जीन-सिल्वां बैली (Jean-Sylvain Bailly) भारतीय खगोल विज्ञान की उत्पत्ति को 4300 ईसा पूर्व से प्राचीन मानते हैं; वहीं वराहमिहिर, आर्यभट, ब्रह्मगुप्त जैसे भारतीय खगोलविदों के कार्यों को आधार मानकर कई आधुनिक शोधकर्ता (जैसे Subhash Kak, Raj Vedam) आदि वैदिक खगोल को 7000-9000 वर्ष पुराना मानते हैं।
ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, तैतरीय संहिता आदि ग्रंथों में नक्षत्रों का विशद वर्णन मिलता हैं। महर्षि लगध द्वारा रचित “वेदाङ्ग ज्योतिष” को, ज्योतिष से संबद्ध वर्तमान में उपलब्ध सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता हैं। यजुर् व अथर्ववेद में भी 27-28 नक्षत्रों का वर्णन मिलता हैं।
किन्तु अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) के द्वारा मान्यता प्राप्त 88 नक्षत्र में से फलित ज्योतिष में उपयोगी 27 (अभिजित सहित 28) नक्षत्र को हीं लिया जाता हैं। अश्विनी से रेवती पर्यन्त जो 27 नक्षत्र, क्रान्तिवृत वा सूर्यपथ (Ecliptic) (जो वास्तव में पृथ्वी का परिक्रमण पथ हैं) पर पड़ते हैं व चन्द्र पथ /भवन (Lunar Mansion) का हिस्सा बनते हैं; भारतीय मनीषियों ने ज्योतिषीय उपयोग के लिए केवल उन्हीं को ग्रहण किया है। विश्व के प्रायः सभी ज्योतिषीय पद्धतियों का आधार यही हैं।
क्रान्तिवृत का मार्ग दीर्घवृत्ताकार 360° अंश का हैं। चूंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° अंश झुकी हुई हैं। यही कारण हैं कि सूर्यपथ वा क्रान्तिवृत (Ecliptic) भी पृथ्वी के साथ 23½° अंश का झुकाव बनाए रखता हैं। इसके उत्तर और दक्षिण 9°-9° अंश का एक कल्पित मार्ग माना गया हैं। सौरमंडल के ग्रह व चन्द्रमा इसी कल्पित मार्ग के अंतर्गत परिक्रमा करते रहते हैं। चन्द्र-पथ और क्रान्तिवृत का ±5° अंश का झुकाव होता हैं। इसी क्रान्तिवृत के 27 अथवा 28 भाग किये गये हैं जिसका आधार चन्द्रमा द्वारा अपनी कक्षा (Orbit) पर एक दिन में तय की गई कोणीय दूरी हैं।
चन्द्रमा 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट 11.6 सेकेण्ड में पृथ्वी की एक नक्षत्र परिक्रमण पूरी करता हैं। यह काल चन्द्रमास कहलाता हैं। इस प्रकार 360° अंश की एक परिक्रमा चन्द्रमा द्वारा उपरोक्त समय में पूरी कर ली जाती हैं। चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र में 52 घटी 30 पल से 67घटी 30 पल भोग करता हैं। इसे ‘नक्षत्र मान’ कहा जाता हैं।
फलित ज्योतिष में चन्द्रमा द्वारा एक दिन में जो दूरी तय की जाती हैं, उसे ‘भवन’ या नक्षत्र (Constellation) कहा जाता हैं। इस प्रकार प्रत्येक नक्षत्रों को ज्योतिषीय उपयोग में ‘चन्द्र भवन (Lunar Mansion)’ कहा गया हैं। नक्षत्रों को ज्योतिषीय उपयोग में ‘भचक्र’ अथवा ‘भगण’ भी कहा गया हैं। जहाँ ‘भ’ का अर्थ ‘भवन’ व ‘चक्र’ का अर्थ वृताकार पट्टी हैं। ‘गण’ का अर्थ ‘समूह’ हैं; अर्थात ‘भगण’ का शाब्दिक अर्थ हुआ— ‘भवनों का समूह’ वा ‘नक्षत्रों का समूह’।
इनके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त, अन्य सभी नक्षत्र (तारामंडल) पुरे विस्तृत आकाश में असमान आकार के क्षेत्रों में फैले हुए हैं। ये क्रान्तिवृत (Ecliptic) से काफी दूर होने से ‘चन्द्र भवन’ का हिस्सा नहीं हैं। पूर्व मे ‘अभिजित’ सहित कुल 28 नक्षत्रों की गणना होती थी। फिर बेबिलोनिया आदि क्षेत्रों व यवनाचार्यों द्वारा राशि चक्र का समावेश भारतीय नक्षत्र ज्योतिष में हुआ। चूंकि प्रत्येक राशि 30°अंश की थी एवं 28 नक्षत्रों का 30°अंश के प्रत्येक राशि का समायोजन 360° के क्रान्तिवृत में करवाने पर 12° 51′ 25.7142857″ एक नक्षत्र का भाग होगा, जो कि गणना के लिए काफी उलझा हुआ होगा। किन्तु यही यदि 27 नक्षत्र कर दिया जाए, तो एक राशि में 2½ नक्षत्र सरलता से समाविष्ट किये जा सकते थे। अतः एक नक्षत्र को हटाना था; और इसके लिए ‘अभिजित’ को चुना गया; कारण कि— इसके अतिरिक्त बाकी सारे नक्षत्र क्रान्तिवृत के नजदीक स्थित हैं, केवल यही क्रान्तिवृत से 61°43′ 59″ और विषुवत रेखा से 38° 46′ 51″ उत्तर में स्थित हैं। अभिजित को हटाने के उपरांत फलित ज्योतिष में 12 राशियों के अश्विनी से रेवती पर्यन्त 27 नक्षत्र उपविभाग हुए।
इस प्रकार 360° क्रान्तिवृत में 12 राशियाँ प्रत्येक 30° और प्रत्येक राशि में 2½ नक्षत्र अर्थात प्रत्येक नक्षत्र 13° 20′ के विस्तार क्षेत्र में माने गये हैं। प्रत्येक नक्षत्र को उनके चार चरणों में बाँटा गया हैं; जो कि 3° अंश 20′ कला का होता हैं। ये विभाजन नवमांश के अनुरूप हैं। इस तरह समस्त भचक्र 108 चरणों का हैं। प्रत्येक चरणों से संबद्ध विशिष्ट अक्षर लिए गये हैं जिसका उपयोग शिशु नामकरण, प्रश्न ज्योतिष आदि में किया जाता हैं।
वर्तमान में अभिजित का विचार केवल मुहुर्त ज्योतिष में किया जाता हैं। इसके स्वामी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को माना गया हैं। दक्षिण दिशा की यात्रा के अतिरिक्त इसमें प्रत्येक शुभकार्य सिद्ध होते हैं। मुहूर्त आदि में ये बहुत से दोषों का नाश कर देता हैं। इसकी स्थिति उत्तराषाढ़ के चतुर्थ चरण से श्रवण की चार घटी तक मानी जाती हैं।
अयन चलन और भिन्न-भिन्न काल खण्ड में भिन्न-भिन्न ‘प्रथम नक्षत्र’ || Precession of the Equinoxes and Different ‘First Nakshatras’ in Different Epochs.
बसन्त सम्पात व शरद सम्पात || Vernal Equinox & Autumnal Equinox
वैदिक काल में प्रथम नक्षत्र कृतिका से गिना जाता था। क्योंकि तब बसन्त सम्पात कृतिका के समीप था। सम्पात क्या हैं? आइए पहले इसे समझते हैं—
क्रान्तिवृत (काल्पनिक सूर्यपथ) विषुवत रेखा (Equator) को दो बिंदुओं पर प्रतिच्छेदित करता हैं। इनमें से एक बिंदु अश्विनी नक्षत्र का प्रथम बिंदु 0°अंश और दूसरा इससे ठीक 180°अंश दूर चित्रा का मध्यबिंदु हैं। मानक स्थिति में अश्विनी के प्रारम्भिक बिंदु से सूर्य को उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश माना जाता हैं और चित्रा के मध्य बिंदु से सूर्य को दक्षिणी गोलार्ध में प्रवेश माना जाता हैं। इस प्रकार अश्विनी के प्रारम्भिक बिंदु (0°अंश) को ‘बसन्त सम्पात (Vernal Equinox)’ और चित्रा के मध्य बिंदु (180° अंश) को ‘शरद सम्पात (Autumnal Equinox)’ कहा जाता हैं। इन दोनों बिंदुओं पर सूर्य कि किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत् गिरती हैं इन दोनो दिनों 21 मार्च और 23 दिसंबर को समस्त पृथ्वी पर दिन-रात समान होते हैं।
इन दो बिंदुओं से 90°-90° अंशों पर क्रमशः दो बिंदुओं अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भिक बिंदु से 90° अंश आगे, पुनर्वसु के चतुर्थ चरण (वर्तमान के आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण) में सूर्य दक्षिणायन होना शुरू कर देता हैं; व चित्रा के मध्य बिंदु से 90° उत्तराषाढ़ नक्षत्र के द्वितीय चरण (वर्तमान में मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण में) में सूर्य उत्तरायण होना शुरू कर देता हैं।
मानक स्थिति के अनुसार पुनर्वसु के चतुर्थ चरण में सूर्य कर्क रेखा पर होगा; जिसे ग्रीष्म अयनांत वा कर्क संक्रान्ति (Summer Solistice) कहा जाता हैं। उत्तरी गोलार्ध में इस दिन (21 जून) को दिन सबसे बड़ा और रात सबसे छोटी होती हैं। इसी प्रकार उत्तराषाढ़ के दूसरे नक्षत्र में सूर्य मकर रेखा पर होगा, जिसे शिशिर अयनांत वा मकर संक्रान्ति (Winter Solistice) कहा जाता हैं। उत्तरी गोलार्ध में इस दिन (23 दिसंबर) को दिन सबसे छोटा और रात सबसे बड़ी होती हैं।
उपरोक्त बातें सूर्य की मानक स्थितियों के आधार पर कही हैं, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता। उपरोक्त बताए गए तारीखों पर सूर्य वास्तव में उन नक्षत्रों में नहीं होता। वर्तमान में बसन्त सम्पात अश्विनी के प्रारम्भिक बिंदु 0° अंश पर नहीं बल्कि उत्तराभाद्रपद के प्रथम चरण 336° अंश पर, शरद सम्पात उत्तराफाल्गुनी के तृतीय चरण 156° कर्क संक्रान्ति आर्द्रा के प्रथम चरण 66° अंश पर व मकर संक्रांति मूल के द्वितीय चरण 246° अंश पर होती हैं। अर्थात उपरोक्त वर्णित सभी सम्पात व संक्रान्तियाँ अपने-अपने मूल बिंदु से 24° अंश पहले हीं हो जाती हैं।
सम्पातों के नक्षत्र परिवर्तन के चलते हींं भिन्न-भिन्न काल खण्ड में ‘प्रथम नक्षत्र’ परिवर्तित होते रहे हैं। सम्पातों के नक्षत्र परिवर्तन का कारण ‘अयन चलन’ हैं।
अयनांश व सम्पातों के नक्षत्र परिवर्तन के कारण || Causes of the Change in Nakshatras of Ayanamsa and Equinoxes.
पृथ्वी के अक्ष का झुकाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा हैं। इस झुकाव में प्रतिवर्ष 0.468″ विकला की कमी होती जा रही हैं। अक्ष के झुकाव के लगातार कमी होने के चलते, क्रान्तिवृत का विषुवत वृत के साथ झुकाव भी कम होता जा रहा हैं। जिसके चलते सूर्यपथ द्वारा विषुवत वृत पर काटे गये साम्पातिक बिंदु पीछे की ओर खिसकते जा रहे हैं, इस क्रिया को सम्पात का पिछड़ना (Precession of Equinox) कहा जाता हैं; व किसी भी समय मूल साम्पातिक बिंदु से पिछड़े हुए साम्पातिक बिंदु तक के कोण को ‘अयनांश (Angle of Precession) कहा जाता हैं। करीब 72 वर्ष में अयनांश में 1° अंश की वृद्धि होती हैं। इस हिसाब से यह 25,765 वर्षों अर्थात करीब 26,000 वर्षों में क्रान्तिवृत (सूर्यपथ) का एक परिक्रमा पूर्ण करता हैं।
माना जाता हैं कि, 21 मार्च 285 ईस्वी को सभी सम्पात अपने-अपने मानक स्थानों पर (मूल बिंदुओं) पर थे और अयनांश शुन्य 0° अंश पर था। 21 मार्च 1956 को भारतीय खगोलविद् श्री N.C Lahiri जी की अनुमोदन पर भारत सरकार ने तात्कालीन अयनांश 23° अंश 15′ कला अंगीकार किया था। वर्तमान में (अप्रैल 2026 के अनुसार) अयन चलन अथवा सम्पात के पिछड़ने की गति 50.30″ विकला / प्रतिवर्ष हैं। इस के आधार पर वर्तमान में अयनांश 24°अंश 7′ कला 50″ विकला हैं। इस अयनांश को ‘लाहिरी अयनांश’ अथवा गणना का आधार चित्रा नक्षत्र का मध्यबिंदु होने से ‘चित्रपक्षीय अयनांश’ भी कहते हैं।
नाक्षत्र या निरयन वर्ष व अयन या सायन वर्ष || Sidereal year & Tropical year
एक बसन्त सम्पात से सूर्य की परिक्रमा करते हुए जब पृथ्वी पुनः अपने उसी मूल बिंदु पर आती है जहांँ से परिक्रमण प्रारम्भ किया था, तब एक वर्ष माना जाता है। परन्तु सम्पात के पिछड़ने के कारण पृथ्वी कुछ समय पूर्व हीं पुनः बसन्त सम्पात पर पहुंँच जाती है। इस परिक्रमण काल को भी एक वर्ष मानते हैं। उपरोक्त स्थिति के कारण वर्ष के दो मान हुए। अश्विनी के प्रथम बिन्दु से पुनः पृथ्वी के उसी बिन्दु पर आने में जितना समय लगता है यह पहले प्रकार का वर्ष मान हुआ। इसमें पृथ्वी पूरे 360 अंश चलती है। अब चूंकि सम्पात 50.30″ विकला पीछे खिसक रहा है जिससे वास्तव में पृथ्वी को 360 अंश – 50.30″ विकला = 359 अंश 59 कला 9.70″ विकला ही चलना पड़ता है। इसके आधार पर पृथ्वी को जितना समय लगता है वह दूसरे प्रकार का वर्ष मान हुआ।
पहले प्रकार के वर्ष में अचल सम्पात की कल्पना की गई है जिसमें पृथ्वी पूरे 360° अंश चलती है जिसमें 365.256363 दिन अथवा 365 दिन 6 घण्टे 9 मिनट 9.8 सेकण्ड लगते हैं। इस वर्ष को ‘नाक्षत्र या निरयन वर्ष (Sidereal year)’ कहते हैं। खिसके हुए सम्पात से पुनः खिसके हुए सम्पात तक पृथ्वी को 50.30″ विकला कम चलना पड़ता है जिसमें 365.24219 दिन 365.24218681 दिन अथवा 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट 44.94 सेकण्ड लगते हैं। वास्तव में पृथ्वी एक परिक्रमण पूरी करने में इतना हीं चलती हैं। यह चल सम्पात के अनुसार हैं। इस दूसरे प्रकार के वर्ष को ‘अयन या सायन वर्ष (Tropical year)’ कहते हैं।
इस प्रकार नाक्षत्र वर्ष से सायन वर्ष में 20 मिनट 35.14 सेकण्ड कम होते हैं। अतः सूर्य चल सम्पात पर अचल सम्पात के मुकाबले पहले पहुंँचता है, अतः जब तक सूर्य अचल सम्पात पर अयनांश के बराबर दूरी पार करके पहुंँचता है तब तक सायन सूर्य के उतने ही अंश निरयन सूर्य के मुकाबले बढ़ जाते हैं। इसीलिए सायन व निरयन ग्रहों के राशि अंशों को पारस्परिक परिवर्तन करने के लिए सायन में से अयनांश का मान घटाने पर निरयन प्राप्त होता हैं। अथवा निरयन में अयनांश का मान जोड़ने पर सायन प्राप्त हो जाता हैं।
वर्तमान में अयनांश लगभग 24° अंश है, और सूर्य एक दिन में लगभग 1° अंश चलता है। अतः सूर्य की सायन संक्रान्तियाँ निरयन संक्रान्तियों की अपेक्षा 24 दिन पहले ही हो जाती हैं। इसीलिए सायन पद्धति के अनुसार 22-23 दिसम्बर को मकर संक्रान्ति के हो जाने पर भी निरयन पद्धति के अनुसार इसके 24 दिन पश्चात् 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति मानी जाती है।
इस प्रकार खिसका हुआ बसन्त साम्पातिक बिन्दु जिसे कुछ ज्योतिर्विद राश्यानुसार मेष का प्रथम बिंदु मानते हैं, वास्तव में ये अश्विनी का प्रथम बिंदु ना होकर खिसका हुआ साम्पातिक बिन्दु वास्तविक अश्विनी के प्रथम बिन्दु (0° अंश) से लगभग 24° अंश (अप्रैल 2026 के अनुसार) पीछे अर्थात् 360°- 24° = 336° अंश के निकट मीन राशि में 6° अंश पर है; जो वास्तविक नक्षत्र क्रमानुसार उत्तरा भाद्रपद के प्रथम चरण के अन्त में है और लगभग 171 वर्षों के पश्चात यह पूर्वाभाद्रपद में स्थिति बना लेगा।
इसी कारण से अचल सम्पात (भारतीय निरयन पद्धति) मे साम्पातिक बिंदुओं की नक्षत्र स्थिति बदलती रहती हैं। अतः वैदिक काल में कृतिका नक्षत्र से गणना की जाती थी, क्योंकि तात्कालिक समय में बसन्त सम्पात कृतिका नक्षत्र के पास था। कालांतर में कृतिका से भरणी, भरणी से अश्विनी और अब अश्विनी से रेवती होते हुए सम्पात उत्तराभाद्रपद में पहुँच चुका हैं। इसी कारण सिद्धांत ज्योतिष काल करीब 500BCE के आसपास जब बसन्त सम्पात अश्विनी के करीब पहुंँचा, तब से अश्विनी से गणना प्रारम्भ की गई। आधुनिक वैदिक ज्योतिष (निरयण प्रणाली) में अश्विनी को स्थायी रूप से प्रथम नक्षत्र मान लिया गया हैं, और अयनांश इसी के आधार पर समायोजित किया जाता हैं। संभव हैं कुछ शताब्दियों बाद किसी अन्य नक्षत्र को प्रथम नक्षत्र बनने का मौका मिल जाए।
एक अन्य मत से कृतिका के स्थान पर अश्विनी को प्रथम नक्षत्र इस लिए माना गया क्योंकि यह सात्विक प्रकृति और देवगण का नक्षत्र हैं।
इस प्रकार नक्षत्रों से मनुष्यों के कृत्यों, रंग रुप, भाग्य-भविष्य के अतिरिक्त उसके स्वभाव, गुणधर्म, कष्टादि, शिशु नामकरण आदि का विवेचन किया जाता है। नक्षत्रों का उपयोग मुहूर्त ज्योतिष Election astrology में विशेषतया होता है। जैसे— उत्सव, त्यौहार, धन संग्रह, प्रतिष्ठा, राज्यारोहण, विवाह, यात्रा, व्यापार-व्यवसाय आदि। इसके अतिरिक्त मेघों का आयनन, ऋतुएं, अयन, प्राकृतिक घटना, मेदिनी ज्योतिष (Mundane Astrology) वा राष्ट्र ज्योतिष, दिशा ज्ञान, कृषिकार्य आदि का नक्षत्रों से विचार किया जाता हैं। प्रश्न ज्योतिष में भी खोई हुई वस्तु, ज़मीन में गड़ा धन, सफलता-असफलता, वंशवृद्धि, बिछड़े प्रिय कुटुम्बियों से मिलवाने जैसे प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में नक्षत्रों का विशिष्ट महत्व होता हैं।
नक्षत्र से संबंधित पौराणिक कथाएं || Mythological Tales Related to Nakshatras.
पौराणिकता अनुसार “दक्ष प्रजापति” ने नक्षत्रों को प्रतिपादित किया था। नक्षत्रों के संबंध में इनको मूर्त रुप देते हुए कथानक हैं कि— इन 27 नक्षत्रों (27 Nakshatras) को जीवधारी ठहराते अपनी पुत्रियाँ मानकर दक्ष प्रजापति ने इन सबका विवाह चन्द्रमा से किया। एक अन्य कथानक के अनुसार इन्हे दक्ष के भ्राता कश्यप की पुत्रियाँ माना जाता है। रोहिणी— चन्द्रमा की सर्वाधिक प्रिय पत्नी हैं। अतः अन्य पत्नियों ने इसकी शिकायत दक्ष प्रजापति से की जिस पर दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दे दिया जिससे चंद्र क्षीण होने लगे। किन्तु महादेव शिव की कृपा से उनकी रक्षा हुई और उनकी पुनः वृद्धि होने लगी। यही कारण हैं कि एक चन्द्र मास में दो पक्ष, कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष होते है।
नक्षत्रों के नाम, स्वामी ग्रह, प्रत्येक चरणों से संबद्ध अक्षर, प्रमुख तारों की संख्या व उनकी विभिन्न राशियों में स्थिति आदि सारणी || Table of Nakshatra Names (Complete Nakshatra List), Ruling Planets, letters Associated with Each Quarter, Number of Principal Stars, and Their Positions in Different Zodiac Signs.
| क्र.सं. | नक्षत्र | स्वामी ग्रह | चारों चरणों से संबद्ध अक्षर | प्रमुख तारों की संख्या | राशियों में स्थिति | आकृति |
| 1 | अश्विनी | केतु | चु, चे, चो, ला | 3 | मेष 0° से 13° 20′ | घोड़े का सिर |
| 2 | भरणी | शुक्र | ली, लू, ले, लो | 3 | मेष 13°20′ से 26°40′ | योनि / त्रिकोण |
| 3 | कृतिका | सूर्य | अ, ई, उ, ए | 6 | मेष 26°40′ से वृष10° | चाकू / अग्नि |
| 4 | रोहिणी | चन्द्र | ओ, वा, वी, वु | 5 | वृष 10° से वृष 23°20′ | रथ / गाड़ी |
| 5 | मृगशिरा | मंगल | वे, वो, का, की | 3 | वृष 23°20′ से मिथुन 06°40′ | मृग / हिरण का सिर |
| 6 | आर्द्रा | राहु | कु, घ, ङ, छ | 1 | मिथुन 06°40′ से मिथुन 20° | आँसू / बूँद / हीरा |
| 7 | पुनर्वसु | गुरु | के, को, हा, ही | 5 अथवा 6 | मिथुन 20° से कर्क 03°20′ | धनुष / नमस्कार |
| 8 | पुष्य | शनि | हु, हे, हो, ड | 1 अथवा 3 | कर्क 03°20′ से कर्क 16°40′ | गाय का थन / वृत में बाण |
| 9 | आश्लेषा | बुध | डी, डू, डे, डो | 5 अथवा 6 | कर्क 16°40′ से कर्क 30° | सर्प / कुलावचक्र |
| 10 | मघा | केतु | मा, मी, मू, मे | 5 वा 7 | सिंह 0° से सिंह 13°20′ | सिंहासन / हल |
| 11 | पूर्वाफाल्गुनी | शुक्र | नो, टा, टी, टू | 2 | सिंह 13°20′ से सिंह 26°40′ | खट्वाकार |
| 12 | उत्तराफाल्गुनी | सूर्य | टे, टो, पा, पी | 2 | सिंह 26°40′ से कन्या 10° | शय्याकार / बिस्तर |
| 13 | हस्त | चन्द्र | पू, ष, ण, ठ | 5 | कन्या 10° से कन्या 23°20′ | हाथ का पंजा |
| 14 | चित्रा | मंगल | पे, पो, रा, री | 1 | कन्या 23°20′ से तुला 06°40′ | मुक्ता जैसा चमकदार |
| 15 | स्वाति | राहु | रु, रे, रो, ता | 1 | तुला 06°40′ तुला 20° | कुमकुम जैसा |
| 16 | विशाखा | गुरु | ती, तू, ते, तो | 5 वा 6 | तुला 20° से वृश्चिक 03°20′ | माला / तोरणद्वार |
| 17 | अनुराधा | शनि | ना, नी, नू, ने | 4 | वृश्चिक 03°20° वृश्चिक 16°40′ | सूप / जलधारा / कमल / छतरीनुमा |
| 18 | ज्येष्ठा | बुध | नो, या, यी, यू | 3 | वृश्चिक 16°40° से वृश्चिक 30° | सर्प / कुण्डल |
| 19 | मूल | केतु | ये, यो, भा, भी | 11 | धनु 0° से धनु 13°20 | शंख या सिंह की पूँछ |
| 20 | पूर्वाषाढ़ा | शुक्र | भू, धा, फा, ढा | 4 | धनु 13°20′ से धनु 26°40′ | सूप / हाथी दांँत |
| 21 | उत्तराषाढ़ा | सूर्य | भे, भो, जा, जी | 4 | धनु 26°40′ से मकर 10° | सूप |
| 22 | श्रवण | चन्द्र | खी, खू, खे, खो | 3 | मकर 10° से मकर 23°20′ | बाण / त्रिशूल / कान |
| 23 | धनिष्ठा | मंगल | गा, गी, गु, गे | 5 | मकर 23°20° से कुंभ 06°40′ | ढोल |
| 24 | शतभिषा | राहु | गो, सा, सी, सू | 100 | कुंभ 06°40′ से कुंभ 20° | मंडलाकार |
| 25 | पूर्वाभाद्रपद | गुरु | से, सो, दा, दी | 2 | कुंभ 20° से मीन 03°20′ | घंटाकार |
| 26 | उत्तराभाद्रपद | शनि | दू, थ, झ, त्र | 2 | मीन 03°20′ से मीन 16°40′ | दो मस्तक / पलंग के पिछले दो पैरों जैसे |
| 27 | रेवती | बुध | दे, दो, च, ची | 32 | मीन 16°40′ से मीन 30° | मृदंग / मछली |
नक्षत्रों के वर्गीकरण || Classification of Nakshatras.
स्वभाव के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Nature.
स्वभाव जनित संज्ञा के आधार पर नक्षत्रों को 7 (Complete Nakshatra List)श्रेणियों में बाँटा गया हैं—
1• ध्रुव (स्थिर) नक्षत्र : रोहिणी और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तराभाद्रपद) ये 4 नक्षत्र, ध्रुव संज्ञक नक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में स्थिर प्रकृति के कार्य जैसे कि, मकान, मंदिर, धर्मशाला आदि बनवाना, बाग-बगीचे लगवाना, स्थाई संपत्ति खरीदना, पदोन्नति पर पद ग्रहण करना, व्यवसाय का उद्घाटन आदि कार्य शुभ व फलप्रद होते हैं।
2• चर (चल / चंचल) नक्षत्र : पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा ये 5 नक्षत्र, चर / चल वा चंचल नक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में यात्रा, भ्रमण, तीर्थाटन, अचल संपत्ति अथवा व्यापारिक वस्तुओं का क्रय-विक्रय शुभ व लाभप्रद होता हैं।
3• लघु (क्षिप्र) नक्षत्र : अश्विनी, पुष्य, हस्त, एवं अभिजित ये 4 लघु वा क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में ज्ञान प्राप्ति, साझेदारी, स्त्री-पुरुष (विपरीत लिंगीयों) से मैत्री, आभूषण धारण करना, खेलकूद, औषधि निर्माण, चित्रकारी, शिल्पकारी आदि कार्य सिद्ध व शुभप्रद होते हैं।
4• मृदु (मैत्र) नक्षत्र : मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा एवं रेवती ये कुल 4 नक्षत्र मृदु संज्ञक हैं। इन नक्षत्रों में मित्रता करना, गीत गाना, चित्रकारी, नृत्य करना, प्रेम करना, भोग करना, नया वस्त्र आभूषण धारण करना, खेलकूद प्रदर्शन, नाट्यकला, स्वादिष्ट भोजन आदि बनाना-खाना, ललित कला आदि कार्य सिद्ध व फलप्रद होते हैं।
5• मिश्र (सामान्य) नक्षत्र : कृतिका और विशाखा ये 2 नक्षत्र मिश्र संज्ञक हैं। इनमें मिले-जुले शुभाशुभ कार्य यथा अग्नि आदि से संबंधित छोटे-मोटे काम, साधारण वाद-विवाद, तर्क-वितर्क आदि सामान्य कार्य सिद्ध व शुभप्रद होते हैं।
6• उग्र (क्रूर) नक्षत्र : भरणी, मघा, और तीनों पूर्वा (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ एवं पूर्वाभाद्रपद) ये कुल 5 नक्षत्रों की संज्ञा उग्र वा क्रूर संज्ञक नक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में क्रूर कार्य यथा षड्यंत्र करना, युद्ध करना, विष देना, शत्रु दमन, मारना पीटना, आग लगाना, अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना आदि कार्य सिद्ध व सफल होते हैं।
7• तीक्ष्ण (दारुण) नक्षत्र : आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा और मूल ये 4 नक्षत्रों की संज्ञा तीक्ष्ण या दारुण नक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में अभिचार कर्म, मारण-मोहन-स्तंभन आदि कार्य, जादू-टोना, घात, भूत-प्रेत बाधा निवारण, घोर मंत्र साधना, पशुओं का दमन आदि उग्र कार्य सिद्ध होते हैं।
प्रकृति के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Qualities.
भारतीय ज्योतिष में 9 ग्रहों को उनकी प्रकृति के अनुसार तीन श्रेणियों में बाँटा गया है— सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति को सत्तोगुणी, बुध व शुक्र को रजोगुणी एवं मंगल, शनि, राहु-केतु को तमोगुणी ग्रह, भारतीय मनीषियों ने कहा हैं। इसी को आधार मानकर जिन ग्रहों को जिन नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त हैं, उसके आधार पर उन-उन नक्षत्रों को भी इसी प्रकार तीन श्रेणियों में बाँटा गया हैं—
1• सत्तोगुणी नक्षत्र : सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के नक्षत्र अर्थात कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, रोहिणी, हस्त, श्रवण, पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र सत्तोगुणी नक्षत्र माने गये हैं। इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातक सत्तोगुणी प्रधान होता हैं; अर्थात इन नक्षत्रों में से प्रभावित व्यक्तित्व में ईश्वरीय सत्ता में विश्वास, धर्मात्मा, सद्गुणी, परोपकारी, सत्यवादी, ईमानदार, क्षमाशील, दयालु, निष्कपट, धैर्यवान, छल-कपट रहित आदि गुणों की अधिकता होती हैं।
2• रजोगुणी नक्षत्र : बुध व शुक्र के नक्षत्र अर्थात आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती, भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, एवं पूर्वाषाढ़ नक्षत्र रजोगुणी माने गए हैं। इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातकों में रजस तत्व की अधिकता से भौतिकवादी, भोग-विलास का इच्छा, दिखावा करना, मान-सम्मान की भूख, सुन्दर स्वादिष्ट भोजन आदि में रुचि रखने जैसा स्वाद लोलुपता आदि गुणों की अधिकता होती हैं।
3• तमोगुणी नक्षत्र: मंगल, शनि, व राहु-केतु के नक्षत्र अर्थात मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा, पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद, आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा, अश्विनी, मघा एवं मूल तमोगुणी माने गए हैं। इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातकों में क्रोध की अधिकता, क्रूरता, कुबुद्धि, असत्य, अहंकार, छल-कपट, ढोंग, दुष्टता, ईर्ष्या, बेईमानी, कट्टुता, निम्नस्तरीय आचरण आदि तमोगणी प्रवृत्तियों की अधिकता होती हैं।
सात्विक, राजसिक और तामसिक नक्षत्र || Sattvic, Rajasic, and Tamasic Nakshatras.
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि— जहाँ नक्षत्रों के सत्तोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी होने का निर्णय उनके स्वामियों के आधार पर किया गया हैं; वहीं इनके सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृतियों का निर्णय इनके ‘गण’ के अनुसार किया गया हैं; जिसकी तालिका नीचे दी गई हैं—
इस प्रकार सभी ‘देवगण’ नक्षत्र यथा अश्विनी, मृगशीर्ष, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण और रेवती सात्विक नक्षत्र माने गये हैं।
सभी ‘मनुष्य गण’ नक्षत्र यथा भरणी, रोहिणी, आर्दा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद राजसिक नक्षत्र माने गये हैं। और
सभी ‘राक्षस गण’ नक्षत्र यथा कृतिका, आश्लेषा, मधा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा और शतभिषा तामसिक नक्षत्र माने गये हैं।
मुख के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Facing Direction (Mukh).
नक्षत्रों के आकृति अनुसार उनके मुख के आधार पर भी नक्षत्रों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया हैं—
1• उर्ध्वमुखी नक्षत्र : रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा व उत्तराभाद्रपदा ये कुल 9 नक्षत्रों के मुख ऊपर की ओर होने से इन्हें उर्ध्वमुखी नक्षत्र कहा गया हैं। इन नक्षत्रों में उच्च स्तरीय कार्य यथा मंदिर निर्माण, धर्मशाला निर्माण, ध्वजारोहण, भवन निर्माण, छत डलवाना, बाग-बगीचे लगवाना, राज्यतिलक करवाना, पद ग्रहण करना, हवाई यात्रा करना, उद्घाटन आदि कार्य लाभप्रद रहते हैं।
2• अधोमुखी नक्षत्र : भरणी, कृतिका, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, मूल, पूर्वाषाढ़, एवं पूर्वाभाद्रपद ये कुल 9 नक्षत्रों के मुख नीचे की तरफ होने से ये अधोमुखी नक्षत्र कहे गए हैं। इन नक्षत्रों में भूमिगत कार्य यथा उत्खनन कार्य, कुआं, बावड़ी, नहर, तालाब, खाई आदि खुदवाना, अंडरग्राउंड बनवाना, भूमिगत द्रव्यादि की खुदाई करवाना, जुआ खेलना, नीच व मलीन कर्म सिद्ध होते हैं।
3• तिर्यकमुखी नक्षत्र : अश्विनी, मृगशिरा/मार्गशीर्ष, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, ज्येष्ठा एवं रेवती ये 9 नक्षत्रों के मुख तिरछा होने से इन्हें तिर्यकमुखी नक्षत्र कहा गया हैं। इन नक्षत्रों में चंचल कार्य यथा यात्रा करना, हल चलाना, क्रय-विक्रय करना आदि कार्य सिद्ध एवं फलप्रद होते हैं।
नेत्र / लोचन (आँख) के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Sight (Netra/Lochan).
खोई वस्तु आदि के ज्ञान के लिए शकुन शास्त्रानुसार नक्षत्रों को उनके नेत्र वा लोचन के आधार पर चार भागों में बाँटा गया हैं—
1• अंधलोचन वा अंधाक्ष नक्षत्र : रोहिणी, पुष्ट, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा एवं रेवती ये कुल 7 नक्षत्र अंधलोचन वा अंधाक्ष नक्षत्र कहे गये हैं। इन नक्षत्रों में खोई वस्तु का पूर्व दिशा में शीघ्र मिल जाने की संभावना होती हैं।
2• मंदलोचन वा मंदाक्ष नक्षत्र : अश्विनी, मृगशिरा, आश्लेषा, हस्त, अनुराधा, उत्तराषाढ़ एवं शतभिषा ये कुल 7 नक्षत्र मंद लोचन वा मंदाक्ष नक्षत्र कहे गये हैं। मंद लोचन नक्षत्रों में खोई वस्तु का उत्तर अथवा दक्षिण दिशा में साधारण प्रयास से मिलने की संभावना होती हैं।
3• मध्य लोचन वा मध्याक्ष नक्षत्र : भरणी, आर्द्रा, मघा, चित्रा, ज्येष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, एवं अभिजित ये कुल 7 नक्षत्र मध्य लोचन वा मध्याक्ष नक्षत्र कहे गये हैं। इन नक्षत्रों में खोई वस्तुओं का देरी से पत्ता तो चल जाता हैं किन्तु वस्तु नहीं मिलती अथवा आंशिक रुप से टूटी-फूटी अवस्था में मिलती हैं।
4• सुलोचन नक्षत्र : कृतिका, पुनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाति, मूल, श्रवण एवं उत्तराभाद्रपद ये कुल 7 नक्षत्र सुलोचन नक्षत्र कहे गए हैं। इन नक्षत्रों में खोई वस्तु का न तो कोई ख़बर मिलती हैं, ना हीं ये वस्तु मिल पाती हैं।
लिंग के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Their Gender.
समस्त 27 नक्षत्रों को लिंग के आधार पर तीन भागों में बाँटा गया हैं—
1• पुल्लिंग (Male) : अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, पूर्वाभाद्रपद एवं उत्तराभाद्रपद ये कुल 8 नक्षत्र पुरुष जाति के अर्थात पुल्लिंग नक्षत्र हैं।
2• स्त्रीलिंग (Female) : भरणी, कृतिका, रोहिणी, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, स्वाति, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा एवं रेवती ये कुल 16 नक्षत्र स्त्रीलिंगी हैं।
3• नपुंसक लिंग (Neuter) : मृगशिरा / मार्गशीर्ष, मूल एवं शतभिषा एक कुल 3 नक्षत्र नपुंसक लिंग के हैं।
जाति के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Their Caste.
जाति के आधार पर नक्षत्रों को कुल 7 श्रेणियों में बाँटा गया हैं—
1• विप्र वा ब्राह्मण नक्षत्र : कृतिका, और तीनों पूर्वा (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद) ये कुल 4 नक्षत्र विप्र / ब्राह्मण जाति के हैं।
2• क्षत्रिय नक्षत्र : पुष्य और तीनो उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्र) ये कुल 4 नक्षत्रों की जाति क्षत्रिय हैं।
3• वैश्य नक्षत्र : अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त और अभिजित ये कुल 4 नक्षत्रों की जाति वैश्य हैं।
4• शुद्र नक्षत्र : रोहिणी, मघा, अनुराधा व रेवती इन 4 नक्षत्रों की जाति शुद्र हैं।
5• शिल्पी वा कृषक : मृगशिरा, चित्रा, ज्येष्ठा व धनिष्ठा इन 4 नक्षत्रों की जाति शिल्पी वा मतांतर से कृषक हैं।
6• कसाई वा क्रूर : आर्द्रा, स्वाति, मूल व शतभिषा / शततारिका इन 4 नक्षत्रों की जाति कसाई वा क्रूर हैं।
7• चाण्डाल : भरणी, आश्लेषा, विशाखा एवं श्रवण ये कुल 4 नक्षत्रों की जाति चाण्डाल हैं।
दिशा स्वामित्व के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Directional Ownership.
दिशा स्वामित्व के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण इस प्रकार हैं—
रोहिणी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा / श्रविष्ठा व रेवती ये कुल 7 पूर्व दिशा के स्वामी हैं।
भरणी, आर्द्रा, मघा, चित्रा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी ये कुल 6 नक्षत्रों को पश्चिम दिशा का स्वामित्व प्राप्त हैं।
कृतिका, पुनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाति, मूल, श्रवण, उत्तराफाल्गुनी ये कुल 7 नक्षत्र उत्तर दिशा के स्वामी हैं।
अश्विनी, मृगशिरा, आश्लेषा, हस्त, अनुराधा, उत्तराषाढ़, शतभिषा दक्षिण दिशा के स्वामी हैं।
पृथ्वी के सापेक्ष गोलार्द्धीय आकाश में स्थिति के आधार पर नक्षत्रों का वर्गीकरण || Classification of Nakshatras Based on Their Position in the Hemispherical Sky Relative to Earth.
नक्षत्रों को भिन्न-भिन्न अक्षांशो से देखने पर उनकी स्थिति उत्तरी या दक्षिणी आकाश में भिन्न-भिन्न दिखाई देती है। नक्षत्रों की गोलार्द्धीय स्थिति सापेक्षिक होती हैं। अतः नक्षत्रों को गोलार्द्धीय आकाश के अनुसार वर्गीकृत करने के लिए दो आधार अपनाए जाते हैं—
A• क्रान्तिवृत से उत्तर या दक्षिणी आकाश में नक्षत्रों की स्थिति व
B• विषुवत रेखा से उत्तर या दक्षिण नक्षत्रों की स्थिति
इस प्रकार क्रांतिवृत और विषुवत रेखा के संयोजन से आकाश को विभाजित करने पर नक्षत्रों के चार आकाशीय खण्ड में स्थिति होगी—
- क्रान्तिवृत और विषुवत रेखा दोनों से उत्तर (उत्तरी आकाश) : अश्विनी, भरणी, कृतिका, पुनर्वसु, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, और अभिजित ये कुल 13 नक्षत्रों की स्थिति उत्तरी आकाश में हैं।
- क्रान्तिवृत से उत्तर किन्तु विषुवत रेखा से दक्षिण (उत्तरी मध्य आकाश) : रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा और रेवती ये कुल 6 नक्षत्रों की स्थिति उत्तरी मध्य आकाश में हैं।
- क्रान्तिवृत से दक्षिण किन्तु विषुवत रेखा से उत्तर (दक्षिणी मध्य आकाश) : दक्षिण मध्य आकाश में कोई नक्षत्र नहीं हैं।
- क्रान्तिवृत एवं विषुवत रेखा दोनों से दक्षिण (दक्षिणी आकाश) : हस्त, चित्रा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और शतभिषा ये कुल 9 नक्षत्रों की स्थिति दक्षिणी आकाश में हैं।
Note : विशाखा और शतभिषा ये दोनों हीं नक्षत्रों की स्थिति क्रान्तिवृत के करीब-करीब ऊपर, और विषुवत रेखा से दक्षिण हैं। इसी कारण इन्हें ‘दक्षिणी मध्य आकाश’ म न रखकर ‘दक्षिणी आकाश’ में रखा गया हैं। उपरोक्त वर्णित नक्षत्र स्थितियों के अनुसार हीं आकाश में इनकी स्थिति ज्ञात की जा सकती हैं। पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य की गोलार्द्धीय स्थिति के अनुसार नक्षत्रों को उपरोक्त वर्णित आकाश-खण्डों में देखा जा सकता हैं।
पृथ्वी पर विषुवत रेखा के सापेक्ष उपरोक्त नक्षत्रों की दिशा निर्धारण की जाए तो— 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृतिका, 4. रोहिणी, 5. मृगशीर्ष, 6. आर्द्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वा फाल्गुनी, 12. उत्तराफाल्गुनी, 15. स्वाति, 22. श्रवण, 24. धनिष्ठा, 25. पूर्वा भाद्रपद, 26. उत्तरा भाद्रपद और 27. रेवती ये कुल 18 नक्षत्र विषुवत रेखा के उत्तर अर्थात उत्तरी गोलार्ध में हैं।
13. हस्त, 14. चित्रा, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वा षाढ़ा, 21. उत्तरा षाढ़ा, 23. शतभिषा ये कुल 9 नक्षत्र विषुवत रेखा के दक्षिण अर्थात दक्षिणी गोलार्ध में है।
गण्ड नक्षत्र || Inauspicious or Junctional Nakshatras.
राशि चक्र में 27 नक्षत्रों के बराबर विभाजन के लिए भचक्र को 120° अंश के तीन तृतीयांशों (Trines) में बाँटा गया हैं। एक तृतीयांश में 4 राशियाँ, 9 नक्षत्र व 36 नक्षत्र चरण होते हैं। तीनों तृतीयांशों में 9-9 नक्षत्रों का क्रम व नक्षत्र स्वामियों के क्रम एक समान हैं। प्रत्येक तृतीयांश केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा और मूल) से प्रारंभ होकर, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती) पर समाप्त होती हैं।
अब यदि हम इन तीनो तृतीयांश में राशियों के वितरण पर ध्यान दें, तो पाते हैं कि— प्रत्येक तृतीयांश अग्नि तत्व राशि ( मेष ♈ , सिंह ♌ , धनु ♐ ) से शुरू होकर जल तत्व राशि ( कर्क ♋, वृश्चिक ♏, मीन ♓ ) पर समाप्त होती हैं। भचक्र के तीन तृतीयांश के प्रारम्भिक बिन्दु 0° अंश, 120° अंश और 240° अंश अत्यंत संवेदनशील बिंदु हैं। इन बिंदुओं पर राशि एवं नक्षत्र दोनों एक साथ प्रारम्भ और समाप्त होते हैं। तात्पर्य यह हैं कि— यह स्थान राशि एवं नक्षत्रों का संयुक्त संधि स्थान हैं।
0° अंश पर मीन राशि (रेवती नक्षत्र) समाप्त होकर मेष राशि (अश्विनी नक्षत्र) का प्रारम्भ होता हैं।
120° अंश पर कर्क राशि (आश्लेषा नक्षत्र) समाप्त होकर सिंह राशि (मघा नक्षत्र) का प्रारम्भ होता है।
240° अंश पर वृश्चिक राशि (ज्येष्ठा नक्षत्र) समाप्त होकर धनु राशि (मूल नक्षत्र) का प्रारम्भ होता हैं।
अतः इन बिंदुओं पर समाप्त होने वाली राशियांँ— मीन, कर्क और वृश्चिक जल तत्व प्रधान राशियाँ हैं; एवं इन बिंदुओं पर समाप्त होने वाले नक्षत्र (रेवती, आश्लेषा एवं ज्येष्ठा) बुध के स्वामित्व वाली रजोगुणी प्रधान नक्षत्र हैं। इसी प्रकार इन बिंदुओं पर प्रारम्भ होने वाली राशियाँ— मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व प्रधान राशियाँ हैं; एवं इन बिंदुओं पर प्रारम्भ होने वाले नक्षत्र (अश्विनी, मघा एवं मूल) केतु के स्वामित्व वाली तमोगुणी नक्षत्र हैं। अर्थात यह प्रत्येक बिंदु अग्नि तत्व और जल तत्व प्रधान राशियों के मिलन बिंदु एवं इसके साथ ही साथ रजोगुणी व तमोगुणी नक्षत्रों के संगम स्थल भी हैं।
चूंकि हम हमेशा अपने दैनिक दिनचर्या में देखते हैं कि— किसी भी चीज़ का संधि स्थल अपेक्षाकृत कमजोर और चुनौतीपूर्ण होती हैं। उदाहरण के लिए— ऋतुओं के संधि काल में रोगों की वृद्धि होती हैं। दिन व रात्रि का संधि काल अत्यंत संवेदनशील होने से इस समय पूजा,पाठ जप-तप किये जाते हैं। कमरे व बरामदे का संधि स्थान ‘चौखट / दहलीज’ पर शुभ कार्य वर्जित हैं। शासन-प्रशासन के संधि काल में जनता को कष्टों व अराजकता का सामना करना पड़ता हैं। वृक्षों के तनों के संधि स्थल अपेक्षाकृत कमजोर और आसानी से टूटने वाला होता हैं। दो या दो से अधिक मार्गों के संधि स्थल पर सावधानी सूचक चेतावनी पट्ट लगे रहते हैं और धीरे व सावधानीपूर्वक चलने की सलाह दी जाती हैं। इसी सिद्धांत से दो राशियों वा दो नक्षत्रों के मिलन बिंदु वा संधि स्थल चुनौतीपूर्ण, कष्टकारी, अशान्त, विनाशकारी वा विस्फोटक होता हैं। ज्योतिष में ये संधि करने वाले नक्षत्र गण्ड मूल नक्षत्र कहलाते हैं। अर्थात नक्षत्रों के तीन जोड़े रेवती + अश्विनी, आश्लेषा + मघा व ज्येष्ठा + मूल, गण्ड-मूल नक्षत्र कहलाते हैं।
बड़े गण्ड-मूल और छोटे गण्ड-मूल || Major Ganda-Moola and Minor Ganda-Moola.
मूल, ज्येष्ठा और आश्लेषा बड़े मूल / गण्ड-मूल कहलाते हैं; एवं अश्विनी, मघा एवं रेवती छोटे मूल / गण्ड-मूल कहलाते हैं। छोटे मूल के अपेक्षा बड़े मूल में ज्यादा घातक प्रभाव उत्पन्न होते हैं। बड़े मूलों में जन्मे जातक के लिए जन्म के 27 दिन बाद चन्द्रमा जब उसी नक्षत्र में आता है जिस नक्षत्र में जातक का जन्म हुआ हैं, तब मूल शान्ति कराई जाती है। तब तक पिता द्वारा बालक का मुंँह देखना अत्यंत हानिप्रद व कष्टकारी होता हैं। छोटे मूलों की शान्ति 10वें दिन अथवा 19वें दिन जब उसी नक्षत्र स्वामी का दूसरा या तीसरा नक्षत्र (अनुजन्म या त्रिजन्म नक्षत्र) आता है तब कराई जा सकती है।
अभुक्त मूल नक्षत्र || Abhukta moola Nakshatra.
ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम एक घटी (24 मिनट) और मूल नक्षत्र के शुरुआती एक घटी (24 मिनट) ‘अभुक्त मूल’ कहलाता हैं। गण्ड-मूल नक्षत्रों में ये भाग अत्यंत घातक और स्वयं जातक, जातक के माता-पिता वा कुटुम्बियों को मृत्यु तुल्य कष्ट वा मृत्यु देने वाला हैं।
गण्डान्त मूल || Gandanta moola.
गण्ड-मूल नक्षत्र सन्धि के अधिकाधिक निकट गण्ड मूलों की अशुभता अत्यधिक होता हैं। 0°अंश, 120° अंश व 240° अंश तो अत्यन्त ही संवेदनशील बिन्दु हैं, क्योंकि यही वो बिंदु हैं जहांँ जल और अग्नि का एवं रजोगुण व तमोगुण का वास्तविक मिलन होता है। ऐसे समय में उत्पन्न जातक, स्वयं के लिए, माता-पिता, कुटुम्ब व जान-माल के लिए अत्यंत हानिकारक, दुर्घटना, कष्ट वा नष्ट लेकर आता हैं। या तो ऐसा बालक जीता ही नहीं, यदि जी जाए तो फिर विशेष रूप से विख्यात होता है परन्तु माता-पिता के लिए अत्यन्त कष्टकारी होता है।
अतः सन्धि के अत्यन्त निकट वाले भाग को गण्डान्त मूल की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार स्पष्ट हैं कि— मनीषियों ने गण्ड-मूल के समस्त नक्षत्र भाग को अशुभ नहीं माना, वरन् युगल नक्षत्रों (रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा व ज्येष्ठा-मूल) के संधि स्थान को हीं विशेष अशुभ माना हैं। तात्पर्य यह हैं कि— समाप्त होने वाले नक्षत्रों (रेवती, आश्लेषा व ज्येष्ठा) के अंतिम चरण हीं ज्यादा अशुभ हैं। अर्थात इन नक्षत्रों के समाप्ति बिंदु से जैसे-जैसे हम पीछे की ओर बढ़ते जाते हैं, इन नक्षत्रों की अशुभता कम होती जाती हैं।
ठीक इसी प्रकार प्रारम्भ होने वाले नक्षत्रों (अश्विनी, मघा व मूल) के संधि स्थान अर्थात प्रारंभिक बिंदु हीं ज्यादा अशुभता वाले होते हैं। जैसे-जैसे इन नक्षत्रों में हम आगे की ओर बढ़ते जाते हैं उनकी अशुभता कम होती चली जाती हैं।
आर्ष दैवज्ञों के अनुसार— नक्षत्र युग्म में पिछले नक्षत्र की अन्तिम 2 घटियांँ तथा अगले नक्षत्र की शुरुआत की दो घटियांँ कुल 4 घटियाँ ज्यादा विनाशकारी हैं व यही 4 घटियाँ ‘गण्डान्त मूल’ की श्रेणी में आती हैं। गण्ड-मूल नक्षत्रों के चारों चरणों में उत्पन्न शिशु/ जातक के फल शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताए हैं—
गण्ड-मूल नक्षत्रों में उत्पन्न जातक के, नक्षत्रों के चारों चरणों में भिन्न-भिन्न फल || Different Effects for Natives Born in the Four Quarters of Ganda-Moola Nakshatras.
| नक्षत्र चरण→ नक्षत्र ↓ | प्रथम चरण | द्वितीय चरण | तृतीय चरण | चतुर्थ चरण |
| अश्विनी | पिता को कष्ट | ऐश्वर्य | उच्च पद /प्रतिष्ठा | राज्य सम्मान |
| आश्लेषा | राज्यसुख | धन हानि | मातृ हानि | पितृ हानि |
| मघा | मातृपक्ष हानि | पितृ नाश | सुख संपत्ति | धन संबंधी लाभ |
| ज्येष्ठा | बड़े भाई को कष्ट | छोटे भाई को कष्ट | माता को कष्ट | स्वयं की हानि |
| मूल | पिता की हानि | माता को हानि | धन की हानि | द्रव्य लाभ |
| रेवती | राज्य सम्मान | राज्यसुख | सुखदाई | अनेक कष्ट |
गण्ड-मूल नक्षत्रों में उत्पन्न जातक के समयानुसार फल || Time-Based Effects for Natives Born in Ganda-Moola Nakshatras.
प्रत्येक गण्ड-मूल युगल नक्षत्रों के समयानुसार भी भिन्न-भिन्न फल शास्त्रकारों ने बताए हैं—
ज्येष्ठा-मूल के संधि पर यदि दिन का जन्म हों, तो ये पितृ नाश कारक हैं।
आश्लेषा-मघा के संधि पर यदि रात का जन्म हो, तो ये माता को कष्ट व हानिकारक हैं।
रेवती-अश्विनी के संधि पर यदि संध्या बेला का जन्म हों, तो यह जातक के स्वयं के शरीर के लिए हानिकर और कष्टकारी हैं।
जन्म लग्न और जन्म मास अनुसार गण्ड-मूल के निवास स्थान व उनके फल || Abode and Effects of Ganda-Moola According to Birth Ascendant and Birth Month.
मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार —
स्वर्गेशुचि प्रौष्ठपदेशमाघे भूमौ नभः कार्तिकचैत्रपौषे।
मूलं हि अधस्तास्तु तपस्यमार्गवैशाख शुक्रेष्वशुभं च तत्र।।
अर्थात वैसाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष और फाल्गुन के महीने में गण्ड-मूल का निवास स्थान पाताल लोक में होता हैं। चैत्र, श्रावण, कार्तिक और पौष के महीने में गण्ड-मूल का निवास स्थान मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी पर होता हैं। आषाढ़, भाद्रपद, अश्विन, माघ के महीने में गण्ड-मूल का निवास स्थान स्वर्ग में होता हैं।
इसके अतिरिक्त वृष ♉, सिंह ♌, वृश्चिक ♏, कुंभ ♒ लग्न में गण्ड-मूल का निवास स्थान पाताल में, मिथुन ♊, कन्या ♍, धनु ♐, मीन ♓ लग्न में गण्ड-मूल का निवास स्थान मृत्युलोक/ पृथ्वी लोक में व मेष ♈, कर्क ♋, तुला ♎, मकर ♑ लग्न में गण्ड-मूल का निवास स्थान स्वर्गलोक में होता हैं।
शास्त्रकारों का मत हैं कि— गण्ड-मूल का जहाँ निवास स्थान होता हैं, वहीं क्षति होती हैं। अतः गण्ड-मूल का निवास जब मृत्युलोक / पृथ्वी पर हो, तभी जातक के लिए कष्टप्रद हैं; अन्य लोकों में गण्ड-मूल का निवास होने पर इसे शुभ ही माना गया हैं।
यहाँ ध्यातव्य हैं कि— मास और लग्न दोनो से गण्ड-मुल का निवास यदि मृत्युलोक / पृथ्वी पर आये, तो यह महाकष्टप्रद हैं, यदि एक से पृथ्वी पर और दूसरे से पाताल अथवा स्वर्ग में आये तो मध्यम भयप्रद होता हैं।
गण्डोत्पन्न जातक विलक्षण प्रतिभा के धनी, पुरुषार्थी, धन कमाने को आतुर, बलिष्ठ होते हैं। तथापि इसके अशुभता को कम करने हेतु इसकी शांति उक्त नक्षत्र वा अनुजन्म या त्रिजन्म नक्षत्रों में करवा लेनी चाहिए।
विवाह हेतु वर-वधू मिलापक (कुंडली मिलान)में उपयोगी नक्षत्र परिचय तालिका || Table of Introduction to Nakshatras Useful in Groom-Bride Compatibility (Kundli Matching) for Marriage.
| क्र.सं. | नक्षत्र | नक्षत्र देवता | शुभाशुभ कारक | योनि | योनिवैर | गण | नाड़ी |
| 1 | अश्विनी | अश्विनी कुमार | शुभ | अश्व | महिष | देव | आदि |
| 2 | भरणी | यम | नाशक | गज / हाथी | सिंह | मनुष्य | मध्य |
| 3 | कृतिका | अग्नि | कार्य | छाग / बकरा | वानर | राक्षस | अंत |
| 4 | रोहिणी | ब्रह्मा | सिद्ध | सर्प | नकुल | मनुष्य | मध्य |
| 5 | मृगशिरा | चन्द्रमा | शुभ | सर्प | नकुल | देव | आदि |
| 6 | आर्द्रा | शिव | शुभ | श्वान / कुत्ता | मृग | मनुष्य | मध्य |
| 7 | पुनर्वसु | अदिति | भय | मार्जार / बिलार | मूषक | देव | आदि |
| 8 | पुष्य | गुरु | शुभ | छाग | वानर | देव | आदि |
| 9 | आश्लेषा | सर्प | शोक | मार्जार | मूषक | राक्षस | अंत |
| 10 | मघा | पितर | नाश | मूषक / चूहा | मार्जार | राक्षस | अंत |
| 11 | पूर्वाफाल्गुनी | भग | अशुभ | मूषक | मार्जार | मनुष्य | मध्य |
| 12 | उत्तराफाल्गुनी | अर्यमा | विद्या | गौ / गाय | व्याघ्र | मनुष्य | मध्य |
| 13 | हस्त | सविता | लक्ष्मी | महिष / भैंसा | अश्व | देव | आदि |
| 14 | चित्रा | विश्वकर्मा | शुभ | व्याघ्र / बाघ | गौ | राक्षस | अंत |
| 15 | स्वाति | वायु | अशुभ | महिष | अश्व | देव | आदि |
| 16 | विशाखा | इन्द्र | अशुभ | व्याघ्र | गौ | राक्षस | अंत |
| 17 | अनुराधा | मित्र | शुभ | मृग | श्वान | देव | आदि |
| 18 | ज्येष्ठा | इन्द्र | क्षय | मृग | श्वान | राक्षस | अंत |
| 19 | मूल | निऋति | हानि | श्वान | मृग | राक्षस | अंत |
| 20 | पूर्वाषाढ़ा | अपः / वारि | हानि | वानर | छाग | मनुष्य | मध्य |
| 21 | उत्तराषाढ़ा | विश्वेदेवा | वृद्धि | नकुल / नेवला | सर्प | मनुष्य | मध्य |
| 22 | श्रवण | विष्णु | वृद्धि | वानर | छाग | देव | आदि |
| 23 | धनिष्ठा | वसु | शुभ | सिंह | गज | राक्षस | अंत |
| 24 | शतभिषा | वरुण | शुभ | अश्व | महिष | राक्षस | अंत |
| 25 | पूर्वाभाद्रपद | अजैकपाद | अशुभ | सिंह | गज | मनुष्य | मध्य |
| 26 | उत्तराभाद्रपद | अहिर्बुधन्य | शुभ | गौ | व्याघ्र | मनुष्य | मध्य |
| 27 | रेवती | पूषा | काम | गज | सिंह | देव | आदि |
इन पहलुओं के अतिरिक्त नक्षत्रों की पीड़ा, क्रांतिसाम्य, शुभ मुहूर्त, तारा बल, वर-वधू के दशा-अन्तर्दशा समायोजन आदि का व्यापक विचार करने के बाद परिणय-सूत्र में बंँधने का निर्णय लेना चाहिए। विवाह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील संस्कार हैं; जो जीवन में व्यापक मोड़ लाने की क्षमता रखता हैं। सुखी व समृद्ध वैवाहिक जीवन के लिए कुंडली का विस्तृत मिलान करने के पश्चात हीं एक-दूसरे के साथ आजीवन चलने का निर्णय लेना श्रेयस्कर हैं।
मुहूर्त ज्योतिष में नक्षत्रों के कुछ उपयोग || Some Uses of Nakshatras in Muhurta Astrology.
मुहूर्त निर्णय के 5 अंग हैं— तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग। में पाँचों मिलकर ‘पाञ्चाङ्ग’ कहलाते हैं। विवाह, संस्कार, भूमि पूजन, भवन निर्माण, अस्त्र-शस्त्र पूजन आदि समस्त कर्म शुभ मुहूर्त में सहज ही सिद्ध होते हैं। अतः प्रत्येक शुभ सात्विक अथवा उग्र कर्मों के लिए भी भारतीय परंपरा में शुभ मुहूर्त का वरण करना अनिवार्य किया गया हैं। इन समस्त कार्यों हेतु निश्चित मुहूर्त, योग आदि के निर्णय में नक्षत्रों का विशिष्ट महत्व हैं। यहाँ विशेष नक्षत्रों के विशेष काल (दिन, वार, मास आदि) के संयोजन से बनने वाले कुछ उपयोगी योगादि को समझते हैं—
आनन्दादि 28 योगों के निर्माण में नक्षत्रों की भूमिका || The Role of Nakshatras in the Formation of the 28 Anandadi Yogas.
आनन्दाख्यः कालदण्डश्च धूम्रो धातासौम्यौ ध्वाङ्ङ्क्षकेतू क्रमेण । श्रीवत्साख्यो वज्रकं मुद्गरश्च छत्रं मित्रं मानसं पद्मलुम्बौ ।।
उत्पात मृत्यू किल काणसिद्धी शुभोऽमृताख्यो मुसलं गद्श्च । मातङ्गरक्षश्चरसुस्थिराख्यप्रवर्द्धमानाः फलदाः स्वनाम्ना ।।
अर्थात आनन्द, कालदण्ड, धूम्र, घाता, सौम्य, ध्वांक्ष, केतु, श्रीवत्स, वज्र, मुद्गर, छत्र, मित्र, मानस, पद्म, लुम्ब, उत्पात, मृत्यु, काण, सिद्धि, शुभ, अमृत, मुसल, गद, मातंग, रक्ष, चर, सुस्थिर और प्रवर्द्धमान, ये 28 योग अपने नाम के सदृश फल देनेवाले हैं।
इन योगों को निकालने की रीति ऐसा हैं— रविवार को अश्विनी से, सोमवार को मृगशिरा से, मंगल को आश्लेषा से, बुध को हस्त से, बृहस्पति को अनुराधा से, शुक्र को उत्तराषाढ़ से, शनिवार को शतभिष से, अभिजित् सहित, जिस दिन के लिए उपरोक्त वर्णित योगों की गणना करनी हो, उस दिन के नक्षत्र तक गणना करने से जितनी संख्या आये, उपरोक्त वर्णित आनन्दादि गणना से उतनी ही संख्यावाला योग उस दिन के लिए होगा। उदाहरण के लिए— किसी रविवार के दिन यदि आपको आनन्दादि योगों की गणना करनी हो, और उस रविवार को धनिष्ठा नक्षत्र हो तो, अब चूंकि जैसा कि ऊपर बताया हैं कि, रविवार को अश्विनी से अभिजित सहित इष्ट दिन के नक्षत्र तक गिनना हैं। सो अश्विनी से अभिजित सहित धनिष्ठा नक्षत्र तक गिनने पर धनिष्ठा नक्षत्र 24वांँ नक्षत्र हुआ, और आनन्दादि योगों कों क्रम से गणना करने पर मातंग योग 24वाँ हुआ। अतः यही योग उस रविवार को होगा। इसी विधि से अन्य दिनों के योगों की गणना करनी चाहिए।।
नक्षत्र और वारों के संयोग से निष्पन्न ‘सर्वार्थसिद्धि योग’ || Sarvartha Siddhi Yoga Resulting from the Conjunction of Nakshatras and Weekdays.
सूर्येऽर्कमूलोत्तरपुष्यदात्रं चन्द्रे श्रुतिब्राह्मशशीज्यमैत्रम् । भौमेऽश्व्यहिर्बुध्न्य कृशानुसार्पं ज्ञे ब्राह्ममैत्रार्ककृशानुचान्द्रम् ॥ जीवेऽन्त्यमैत्राश्व्यदितीज्यधिष्ण्यं शुक्रेऽन्त्यमैत्राश्व्यदितिश्रवोभम् । शनौ श्रुतिब्राह्मसमीरभानि सर्वार्थसिद्धियै कवितानि पूर्वैः ॥
अर्थात रविवार को हस्त, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, पुष्य, अश्विनी; सोमवार को श्रवण, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा; मंगल को अश्विनी, उत्तराभाद्रपद, कृत्तिका, आश्लेषा बुधवार को रोहिणी, अनुराधा, हस्त, कृत्तिका, मृगशिरा, बृहस्पति को रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, शुक्रवार को रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, श्रवण; शनिवार को श्रवण, रोहिणी और स्वाती हो तो सर्वार्थसिद्धि योग होता हैं। इस योग में समस्त कार्य सिद्ध होता हैं।
मास शुन्य नक्षत्र व वार शुन्य नक्षत्र क्या हैं? || What are Maas Sunya Nakshatras and Waar Sunya Nakshatras?
मास शुन्य नक्षत्र : चैत्र में अश्विनी व रोहिणी, वैशाख में स्वाति व चित्रा, ज्येष्ठ में पुष्य व उत्तराषाढ़, आषाढ़ में पूर्वाफाल्गुनी व धनिष्ठा, सावन /श्रावण में श्रवण व उत्तराषाढ़, भाद्रपद में शतभिषा व रेवती, आश्विन में पूर्वाभाद्रपद, कार्तिक में कृत्तिका व मघा, अगहन / मार्गशीर्ष में चित्रा व विशाखा, पौष में अश्विनी व आर्द्रा, माघ में हस्त और फाल्गुन में भरणी, श्रवण, मूल, व ज्येष्ठा मास शुन्य नक्षत्र माने गये हैं। इन नक्षत्रों में माह अनुसार कोई भी शुभ कार्य वर्जित हैं।
वार शुन्य नक्षत्र : रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़, बुधवार को धनिष्ठा, बृहस्पतिवार को उत्तरा फल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा शनिवार को रेवती वार शुन्य नक्षत्र माने गये है। इन्हें दग्ध नक्षत्र भी कहते हैं। वारानुसार इन नक्षत्रों में शुभ कार्य करना वर्जित हैं।
पंचक क्या हैं? || What is Panchak?
धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, रेवती ये अन्तिम पांँच नक्षत्र पंचक कहलाते है। इनमे प्रायः शुभकार्य, काष्टकर्म, पुतलादाह, यात्रा, विशेषतया दक्षिण दिशा यात्रा, व्यापार-व्यवसाय, कार्य प्रारम्भ या नवीन कार्य वर्जित है।
भीष्म पंचक क्या हैं? || What is Bhishma Panchak?
भीष्म पंचक कार्तिक अमावस्या (दिपावली) के बाद देवउठनी एकादशी से शुरू होते हैं। इनमें भी उपरोक्त वर्णित पाँच नक्षत्र हीं होते हैं। ये व्रत-उपवास आदि में महत्वपूर्ण हैं।
समस्त शुभ कर्मों में त्याज्य तिथि, नक्षत्र, योग आदि || Inauspicious Tithis, Nakshatras, and Yogas etc to be Avoided in All Auspicious Deeds.
जन्मनक्षत्र, जन्ममास, जन्मतिथि, व्यतीपातयोग, भद्रा, वैधृतियोग, अमावास्या, माता-पिता के मरने की तिथि, क्षयतिथि, वृद्धितिथि, क्षयमास, अधिकमास, कुलिक, अर्द्धयाम और महापात योग सम्पूर्ण शुभ कार्यों में त्याज्य हैं। विष्कुम्भ और वज्र के तीन-तीन दण्ड, परिघयोग का पूर्वार्द्ध, शूलयोग के प्रथम पाँच दण्ड, गण्ड और अतिगण्ड के 6-6 दण्ड और व्याघात योग के 9 दण्ड सम्पूर्ण शुभ कार्यों में वर्जनीय हैं
इस प्रकार सिद्धांत, संहिता, होरा, प्रश्न, शकुन, वर्षा, कृषि, उत्पात, राष्ट्र आदि सभी ज्योतिषीय कर्मों में ‘नक्षत्र’ हीं ज्योतिष के आत्मस्वरुप हैं। जन्मांग विश्लेषण, शोधन, भाग्योदय, अरिष्ट विचार आदि में नक्षत्र हीं महत्वपूर्ण भूमिका में होते हैं।
~ Krishna Pandit Ojha
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