ज्योतिष का इतिहास अत्यंत प्राचीन हैं। भारतीय वैदिक वाङ्गमय में इसके प्रथम द्रष्टा स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। उनसे सर्वप्रथम इसका ( ज्योतिष शास्त्र का ) ज्ञान देवर्षि नारद को बाद में अन्य भृगु, पराशर, जैमिनी आदि ऋषिगण इस शास्त्र के प्रवर्तक हुए।
कुंडली के 12 भावों का इतिहास
फलित ज्योतिष में कुंडली के 12 भाव, भचक्र के 360° अंश के बराबर ( प्रत्येक 30° अंश ) विभाजन हैं। जो जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर व्यापक दृष्टिपात करते हैं। भारतीय ज्योतिषशास्त्र के पितामह महर्षि पराशर ने कलियुग के आरंभ से पूर्व द्वापर युग में हीं ( 3102 BCE से पहले हीं ) कुंडली के 12 भावों का उनके अलग-अलग नामों से विस्तृत व्याख्या की हैं—जिसका विवरण वृहद्पराशरहोराशास्त्र में मिलता हैं।
5वी शताब्दी BCE में बेबिलोनियन खगोलशास्त्रियों ने अण्डाकार क्रान्तिवृत को 30 दिनो के 12 सुव्यवस्थित महीनों के अनुसार 12 राशियों में बांटा, जो राशिचक्र अथवा ZODIAC कहलाया।
प्राचीन भारतीय प्रणाली चूंकि नक्षत्र आधारित प्रणाली थी। भावों के संबंध में प्रथम ऐतिहासिक साक्ष्य भारतीय ज्योतिषीय ग्रंथ “यवनजातक” में मिलता हैं, इसी कारण बहुतेरे विद्वानों का मत्त हैं कि—यवनों के साथ अत्यधिक मेल-मिलाप के कारण “भावों का सिद्धांत” भारतीय ज्योतिष में समाविष्ट हुआ। केवल ज्योतिष हीं नहीं, वरन् कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि प्रत्येक क्षेत्र में हीं हिन्द-यूनानी मिश्रित पद्धति हमें वर्तमान भारतीय परंपरा में देखने की मिल हीं जाती हैं, सो यही ज्योतिष वाङ्गमय की भी गाथा हैं।
अवधारणा
कुंडली ज्योतिष में भाव—आकाश का कल्पित विभाजन हैं। पृथ्वी से देखने पर जितना आकाश हम देख पाते हैं, वह सूर्यपथ / क्रान्तिवृत हैं। यह वृताकार पथ ( 360° अंश ) का 12 समान भागों में ( प्रत्येक 30° अंश ) विभाजन, कुण्डली के 12 भावों को जन्म देते हैं, जिससे हम जीवन के सभी आयामों का भिन्न-भिन्न अध्ययन करते हैं। चूंकि भावों की अवधारणा आकाश का अध्ययन हेतु काल्पनिक विभाजन हैं, अतः यह स्थिर हैं; किन्तु राशियां— जो कि नक्षत्रों के मेल से बनी वास्तविक विभाजन हैं, अतः पृथ्वी की गति के कारण, पृथ्वी के सापेक्ष ये गतिशील हैं; अतः भावों में उदित राशियां सदैव बदलती रहती हैं।
कुण्डली ज्योतिष में द्वादश भाव साधन का गणित करते समय असल में किसी भाव का गणित नहीं; वरन् उस अभीष्ट भाव में कौन सी राशि का कौन सा अंश उदित हैं— इसी का गणित किया जाता हैं।

उदाहरणार्थ पहला भाव पूर्वी क्षितिज से प्रारम्भ होता है तथा क्षितिज के ऊपर 30° अंश तक के विस्तार तक होता है। इस प्रथम भाव का हीं लग्न या जन्म भाव संज्ञा है। यदि हम सूर्य का पृथ्वी के सापेक्ष भ्रमण पथ का अनुसरण करते हुए भाव विवेचन करें तो— दक्षिणावर्त ( Clockwise )घूमते हुए 30° अंश से 60° अंश तक का दूसरा भाग / भाव—12वा भाव / ‘व्यय स्थान’ , अगले 60° अंश से 90° अंश तक का तीसरा हिस्सा 11वा भाव / ‘लाभ भाव’ कहलाता है। 90° अंश पूरे होते ही वह बिन्दु आकाश में सबसे ऊंचा बिन्दु है, जो ठीक अपने सिर पर दिखाई पड़ता है; यही दशम भाव का प्रारम्भिक बिन्दु है। यही से 30° अंश पश्चिम की ओर बढ़ने पर दशम भाव के है। यह पितृ या कर्म स्थान कहलाता है। इसके बाद आगे 30° अंश नवम भाव या धर्म स्थान इसके बाद सूर्य के अस्त होने के स्थान और सूर्यास्त पश्चिम क्षितिज के 30° अंशो का जो विभाग है वह अष्टम भाव मृत्यु स्थान कहा गया है।
इस प्रकार पूर्व क्षितिज से पश्चिम क्षितिज तक आकाश के अर्द्धगोल के छः हिस्से 180° अंश के पूर्ण होते है। जैसे पूर्व क्षितिज से ऊपर बढ़ते हुए ये छह भाव बताये है वैसे हीं पूर्व क्षितिज अर्थात प्रथम भाव वा लग्न भाव के नीचे की ओर अर्थात वामावर्त ( Anti clockwise ) गणना करने पर द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ और सप्तम से प्रत्येक 30° अंश के यह भाव होते है। इस प्रकार ये कुल मिलाकर के 12 भाव 360° अंश के होते है। कुंडली के भावों को व्यवहार में ‘घर’ भी कहने की परंपरा हैं; यथा पहला घर, दूसरा घर आदि।
भावों के विस्तार व निर्धारण के कुछ मुख्य पद्धतियां व इनके गुण-दोष
राशिचक्र का विभाजन 12 भावों में किया गया है। क्रान्तिवृत 360° अंश का होने से, प्रत्येक राशियाँ एक समान 30° अंश की होती हैं, किन्तु पृथ्वी के अपनी धुरी पर झुके होने के कारण, सूर्य के मार्ग (Ecliptic) के चारों ओर सभी राशियाँ समान कोण नहीं बनाती हैं, जिससे कुछ भाव 30° से छोटे और कुछ भाव 30° से बड़े हो जाते हैं। इसी कारण कभी-कभी भाव चलित में, एक हीं भाव में एक से अधिक राशियाँ या एक ही राशि दो भावों में आ जाती है। अब सवाल है कि किस बिन्दु से भाव अथवा घर प्रारम्भ होगा और किस बिन्दु पर अन्त होगा।
Western Astrological System के अनुसार भाव देशान्तर अंशादि से आरम्भ होकर दूसरे भाव के आरम्भ अंशादि तक होता है। जैसे प्रथम भाव लग्न के देशान्तर अंशादि से आरम्भ होकर दूसरे भाव के आरम्भ देशान्तर के अंशादि तक होगा, जहां से दूसरा भाव आरम्भ होगा। इस पद्धति के अनुसार M.C.( Medium Coeli )— दशम भाव के प्रारम्भ बिन्दु से एकादश भाव के प्रारम्भ बिन्दु तक होगा। जब ग्रह भाव के उपरोक्त क्षेत्र में होगा तब यह माना जायगा कि वह उस भाव में स्थित होकर अपना प्रभाव डाल रहा है। इस प्रकार विभिन्न भावो के देशान्तर— भाव के संगम बिन्दु है, जो युरोपियन प्रणाली मे भाव के cusp “कस्प” (सन्धि) कहलाते है।
Western European Astrology में भाव स्पष्ट की अनेकानेक पद्धतियां प्रचलित हैं— यथा टॉलेमिक पद्धति, पोरफेरेर पद्धति, प्लेसिडस या सेमी आर्क पद्धति, रेगियोमोंटानस पद्धति, केम्पेनस पद्धति इत्यादि है। इन पद्धतियों में भाव स्पष्ट का अंश आदि उक्त भाव का आरम्भ है और पूर्ण भाव दूसरे भाव के अंश आदि तक होता है। इस तरह अन्य भाव के स्पष्ट अंश आदि उसके पहले भाव का मिलन बिन्दु है जिसे कस्प CUSP कहते है। पश्चिमी ज्योतिष की इन सभी पद्धतियों से पहले ( लग्न ), दूसरे, तीसरे तथा 10वें, 11वे और 12वे भाव स्पष्ट होते हैं, अर्थात संपूर्ण गोले (पृथ्वी) का, उदित (दक्षिणी) गोलार्ध से 1/4 भाग तथा अनुदित (उत्तरी)गोलार्ध का 1/4 भाग, यह त्रुटिपूर्ण है। ग्रहों को दूसरे भाग में रख देने से फलित संदेहास्पद हो जाता हैं।
भारतीय हिन्दू ज्योतिष में उपरोक्त वर्णित Cusp या भाव के देशान्तर भाव के आरम्भ बिंदु न होकर, भाव के मध्य बिंदु हैं। इसमें भाव— उपरोक्त वर्णित भाव का अंश आदि, उक्त बिंदु के 15° अंश आगे और 15° अंश पीछे तक विस्तार लिए होता है। भाव विस्तार—पूर्व भाव-सन्धि से आगे के भाव-सन्धि तक होता हैं। भावों के देशान्तर जैसे लग्न, Midheaven /M.C आदि उन भावों के मध्य बिंदु हैं और इस तरह ये कुण्डली के सबसे अधिक संवेदनशील बिंदु हो जाते है।
इस प्रकार भारतीय ज्योतिष मनीषियों ने प्रत्येक भाव को 30° अंश का हीं माना हैं। भाव स्पष्ट अथवा लग्न स्पष्ट उक्त भाव वा लग्न का मध्य बिंदु हैं, इससे 15° पीछे भाव आरंभ बिंदु (सन्धि) और 15° आगे भाव विराम बिंदु (सन्धि) कहा गया हैं। प्राचीन भारतीय आचार्यों ने 22वे द्रेष्काण व 64वे नवांश को मारक कहा हैं, कारण कि लग्न से अष्टम के मध्य 21 द्रेष्काण व 63 नवांश होते हैं, अतः 22वा द्रेष्काण या 64वा नवांश अष्टम भाव का मध्य सूक्ष्म बिंदु हैं। उन दैवज्ञ फलितज्ञों के कथन की सार्थकता तभी सिद्ध होती हैं, जब अष्टम भाव का मध्य बिंदु भी लग्न अंशादि के पूर्णतया तुल्य हो।
भाव स्पष्ट की उपरोक्त वर्णित Western Astrological System का उपयोग करके भाव स्पष्ट करने पर, महर्षि जैमिनी विरचित चर (राशि) दशा भी त्रुटिपूर्ण होगी, ऐसी स्थिति में कभी-कभी किसी-किसी राशि की दशा दो बार हो जाएगी, और किसी-किसी राशि की दशा आएगी हीं नहीं। इस प्रकार आधुनिक Western European भाव स्पष्ट की रीति, प्राचीन फलितज्ञों का अभिमत नहीं हैं। अतएव लग्न स्पष्ट शुद्ध करके उसमें एक-एक राशि जोड़ने पर हीं द्वादश भाव शुद्ध-शुद्ध स्पष्ट हो जाता हैं। भाव स्पष्ट की यह पद्धति खण्ड वा भाग पद्धति (Compartmental System) कहलाता हैं। यह पद्धति फलित ज्योतिष में ज्यादा युक्तिसंगत व प्रमाणिक होने से इसी का अनुसरण करना विवेकपूर्ण हैं।
इसके अतिरिक्त भारतीय ज्योतिष में यवन मतेन् भाव स्पष्ट की अन्य पद्धतियां भी प्रचलित है— यथा याम्योत्तर वृत्तीय लग्न जिसको मध्य लग्न या दशम लग्न पद्धति भी कहते हैं। वर्तमान में भारत में यह पद्धति भाव स्पष्ट साधन में प्रचलित हैं। श्रीपति पद्धति, केशव पद्धति, नीलकंठ पद्धति आदि सभी यवन मतों पर आधारित पद्धतियां हैं। इन पद्धतियों को षष्ठांश पद्धति कहते हैं।
विभिन्न भारतीय आर्ष ज्योतिष ग्रंथों में भावों के फलित में महत्व व उपयोगिता से संबंधित कुछ प्रमुख वक्तव्य:
कुण्डली के भावों व उनसे संबद्ध ग्रहों से फलित के मूल सूत्र उद्धृत हैं। वृहत्पराषर होरा शास्त्र का कथन हैं कि—
यो यो भावपतिर्नष्टस्त्रिकेशाद्यैश्च संयुतः ।
भावं न वीक्षते सम्यग्ग्रहो वापि मृतो यदा ।।
स्थविरो वा भवेत्खेटः सुप्तो वापि प्रपीडितः।
तदा तद्भावजं सौख्यं नष्टं ब्रूयाद्विशङ्कितः।।
(वृहत्पराषर होरा शास्त्र)
अर्थात:- जिन-जिन भावों के स्वामी अस्त हों, त्रिकेश (६।८।१२ के स्वामी) से युत हों, भाव को-न देखते हों, मृत अवस्था में हों, वृद्ध अथवा सुप्त हों वा पीड़ित हों तो उन भावों के फल नष्ट हो जाते हैं।
इस श्लोक से फलित में भावों व उनसे संबंधित भावेशों के फलकथन के निर्णायक सिद्धांतों की उपयोगिता सिद्ध होती है।
ऐसे हीं मन्त्रेश्वर रचित ‘फलदीपिका’ में 12 भावों के संज्ञा और उनके कार्यक्षेत्र को संक्षेप में समझाने के क्रम में कहा है कि—
“देहकोशविक्रमबन्धुपुत्रशत्रुयोषितो मरणानि।
धर्मकर्मलाभव्यया इति भावाः क्रमात् कथिताः॥” (फलदीपिका)
अर्थात:- 12 भावों को क्रमशः देह (तन), कोश (धन), विक्रम (सहज), बन्धु (सुख), पुत्र (संतान), शत्रु (अरि), योषित (कलत्र), मरण (आयु), धर्म (भाग्य), कर्म (राज्य), लाभ (आय) और व्यय के नाम से जाना जाता है।
कल्याण वर्मा ने ‘सारावली’ में स्पष्ट किया है कि— यदि भाव का स्वामी बलवान हो, तभी वह भाव शुभ फल देता है;
“ये ये भावाः स्वामिदृष्टा युता वा सौम्यैर्वा स्युस्ते च पुष्टाः प्रदिष्टाः।
पापैरेवं तद् विघाताय चिन्त्याः क्रूराः सौम्याः पुष्टिमन्तो विमिश्राः॥” (सारावली)
अर्थात जो-जो भाव अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट हों, अथवा शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों, वे भाव पुष्ट (बलवान) होते हैं। इसके विपरीत पाप ग्रहों का प्रभाव भाव के फलों का नाश करता है।
सारावली का एक और कथन हैं कि—
भवनाधिपैः समस्तं जातकविहितं विचिन्तयेन्मतिमान् । एभिर्भावना न शक्यं पदमपि गन्तुं महाशास्त्रे ।।
अर्थात बुद्धिमान् ज्योतिषी को होराशास्त्र में वर्णित फलादेश का भावाधिपति के आधार पर ही विचार करना चाहिये। क्योंकि भावेशों के बिना इस जातक शास्त्र में १ पद भी चलना अशक्य / असंभव है।
जातक अलंकार का कथन है कि—
देहं द्रव्यपराक्रमौ सुखसुतौ शत्रुः कलत्रमृति-र्भाग्यं राज्यपदं क्रमेण गदिता लाभव्ययौ लग्नतः ।
भावा द्वादश तत्र सौख्य शरणं देहं मतं देहिनां तस्मादेव शुभाशुभाख्य फलजः कार्यो बुधैर्निर्णयः।।
(जातक अलंकार)
अर्थात लग्न (प्रथम भाव) से लेकर व्यय (द्वादश भाव) तक देह (शरीर), द्रव्य (धन), पराक्रम, सुख, सुत, शत्रु, कलत्र (संङ्गी/साथी/जीवनसाथी/ पति वा पत्नी), मृति, भाग्य, राज्यपद (प्रतिष्ठा), लाभ और व्यय का विचार कुण्डली के १२ भावों से होता हैं। इसमें समस्त सौख्य (सुख-दुःख, धन, यश, भाग्य आदि) का संबंध शरीर से हीं हैं; अतः सुधीजन को समस्त फलों का विचार करते समय शरीर अर्थात आयुष्य आदि का विचार अवश्य कर लेना चाहिए।
जातक अलंकार का यह कथन किसी कुण्डली में भावों के महत्व को दर्शाता हैं।
अतः फलित ज्योतिष में भावों की महत्ता— फलित का मुख्य आधार हैं। भावों के सूक्ष्म विभाजन, नक्षत्र ज्योतिष को सुगम व फलित के लिए विविध विषयों का पृथक-पृथक प्रयोग “वर्ग कुण्डली” के रूप में महर्षि पराशर व अन्य पूर्वाचार्यों की अनमोल विरासत हमे प्राप्त हैं। विभिन्न भावों के परस्पर संयोग व संबंधों से जीवन के जटिल विषयों की जानकारी, व मानव जीवन के समस्त भूत, वर्तमान और भविष्य मूलक कर्मों व उनसे प्रेरित फलों के ज्ञान व जीवन के सही मार्गदर्शन का स्रोत जो सुगम फलित ज्योतिष के माध्यम से कुण्डली विश्लेषण द्वारा करने की जो सुगम तकनीक हमें प्राप्त हैं, उसमे भाव निर्धारण का योगदान अमूल्य हैं।