Krishna Pandit Ojha

कुंडली का द्वितीय भाव वा धन भाव वा कुटुम्ब भाव : 2nd House Astrology in Hindi || The House of Wealth||The House of Family

The significance of the second house in the astrology (Kundali) which relates to wealth and family.

कुंडली का द्वितीय भाव अथवा धन भाव अथवा कुटुम्ब भाव क्या हैं? What is 2nd house Astrology in Hindi?

भारतीय फलित ज्योतिष में जैसे लग्न की दिशा पूर्व दिशा हैं, वैसे हीं द्वितीय भाव की दिशा ईशान कोण हैं। यह सूर्योदय से ठीक पूर्व (पहले) का क्षितिज हैं। जातक ज्योतिष में इसे धन भाव / स्थान वा कुटुम्ब भाव / स्थान कहते हैं; और इसके स्वामी को द्वितीयेश वा धनेश कहते हैं। यह अल्प मारक भाव भी हैं; अतः इसके स्वामी को सहायक मार्केश भी कहते हैं। यह पणफर, धन स्थान, कुटुम्ब स्थान, नेत्र स्थान, वाणी स्थान, सहायक अथवा अल्प मारक स्थान, स्त्री भाव, पीड़ा / कष्ट स्थान, स्त्री भाव, स्थिर भाव हैं। इसका रंग हरा हैं। इसका नैसर्गिक कारक देवगुरु बृहस्पति अर्थात गुरु (Jupiter) ग्रह हैं। 

अरबी ज्योतिष, इस्लामिक ज्योतिष या Perso-Arabic astrology में इसे الثاني (al-bayt al-thānī) अथवा دور الثاني (dawr al-thānī)

कहा जाता है, जिसका अर्थ है “दूसरा घर”।

पुराने अरबी ग्रंथों (जैसे अल-बिरूनी या अन्य Classical Perso-Arabic astrological scriptures) में इसे “بيت المال” (bayt al-māl) या “بيت الغنى” (bayt al-ghinā) कहा गया जैसा संदर्भ मिलता है, जिसका तात्पर्य हैं— “धन का घर” या “संपत्ति का घर”।

पाश्चात्य ज्योतिष (Western Astrology) में इसे “House of Possessions” या “House of Value” कहते हैं, यहाँ भी इसका तात्पर्य हैं— मूल्यों का भाव। 

अर्थात विश्व के प्रत्येक हिस्से में जहाँ-जहाँ ज्योतिष शास्त्र पल्लवित हैं, वहाँ-वहाँ सभी इस बारे में एक मत्त हैं कि— कुण्डली के द्वितीय भाव का संबंध जातक के “कोष” अथवा “संचित धन” से हैं।

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जातक ज्योतिष में द्वितीय भाव || The 2nd house in Natal Astrology

जातक ज्योतिष में द्वितीय भाव (2nd House astrology) से कुटुम्ब, धन, स्थाई संपत्ति, खाने-पीने की चीज़ें, नौकर-चाकर से सुख-दुःख, रत्न, धातुएं अर्थात सोना-चांँदी आदि क़ीमती धातुएं, धन-धान्य, बन्धन अर्थात संबंधों में विवशतापूर्ण कर्तव्य, आस्तिक्य, बुद्धि, वाणी की कोमलता अथवा कट्टुता, वाणी अथवा गले का रोग, वाणी के गुण-दोष, गायन-वादन में रुची-अरुचि, व्याभिचार, घमंड, अर्थ नीति, विरासत, इक्विटी शेयर, Long term investment, भण्डार कक्ष, व्यवसायिक यात्रा, लेन-देन, सहयोग, पशु-धन, बचपन के मित्र, क्रय-विक्रय, दलाली (Brokrage), सुन्दरता, आकर्षण क्षमता, आँख, नासिका, गर्दन, आदतें, प्रेम, जुड़ाव, स्वार्थ, निजत्व, प्रारम्भिक शिक्षा, नैसर्गिक गुण, भोजन वृत्ति अर्थात खाद्य-अखाद्य में रुचि-अरुचि, जोखिम, दुर्घटना, मृत्यु अथवा मृत्यु तुल्य कष्टों का कारण आदि का विचार किया जाता हैं।

उत्तरकालामृत का कथन है कि—

वैराग्यप्रकृति च कार्यकरणं जोवक्रियासूद्यमो मर्यादाप्रविनाशनं त्विति भवेद्वर्णापवादस्तनोः

वाग्वित्तास्तिकपोषकत्वनखसं भोज्यानि सत्यानृते जिह्वाक्ष्यम्बर वज्ञताम्रमणयो मुक्ताग्रहौ कृत्रिमः ॥२॥ कौटुम्बं क्रयविक्रयौ मृदुवचो दातृत्ववित्तोद्यमाः,

साहाय्यं सखकान्तिवित्त कृपणप्रासन्न वाग्वैभवाः ।

विद्यास्वर्णसुरौप्यधान्यविनया नासामनस्थैर्यके,

तत्पार्श्वस्थनरो गमागमविधिर्जीवाढ्यता द्रव्यभात् ॥३॥

                                        (अ. 5 श्लोक. 2 & 3)

अर्थात अनुराग-वैराग्य, कार्य करने, जीवनयापन से संबंधित उद्यम, मर्यादाहीनता, शरीर के वर्ण में विकार उत्पन्न होना अर्थात चर्मरोगों, वाणी अर्थात आवाज वा बोली वा बोलने की कला, धन, आस्तिकता, पालन-पोषण, नाखून (Nails), भोज्यपदार्थ अथवा भोजन की आदतें अथवा रुचि-अरुचि, सत्य अथवा मिथ्या भाषण की आदतें, जीभ, आँख, वस्त्र अथवा वस्त्रों के प्रकारों में रुचि-अरुचि अर्थात पहनावा आदि, हीरा, ताँबा, रत्न, मणियाँ, मोती, हठ, धूप आदि सुगन्ध की रुचि, कुटुम्ब संबंधी बातें, विरासत, सगे-संबंधी आदि, क्रय-विक्रय अर्थात व्यापार-व्यवसाय, मृदु अथवा कठोर वाचन, दानशीलता, वित्त संबंधी उद्यम, सहायता, मित्रता, कान्ति, कृपणता अर्थात कंजूसी, स्पष्ट व्याख्यान शक्ति, विद्या, सोना, चाँदी, धान्य, नम्रता, नाक, मन की स्थिरता, अपने पर आश्रित व्यक्ति, गमन-आगमन, आजीविका संबंधी द्रव्योपार्जन आदि का विचार द्वितीय भाव से करना चाहिए।

जैसा कि ऊपर श्लोक में लिखा है कि— द्वितीय भाव से विद्या का विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त पञ्चम भाव को भी विद्या व बुद्धि का भाव शास्त्रकारों ने माना हैं। चतुर्थ को भी मन, गहन कल्पना, दर्शन व मतांतर से विद्या के लिए उत्तरदाई माना गया हैं। शास्त्रकारों के भिन्न-भिन्न मत्तों के होते हुए भी इतना स्पष्ट है कि— इन भावों व इनके भावाधिपतियों के परस्पर बलवान संबंध जातक को उच्च कोटि की बुद्धिमत्ता, शैक्षणिक योग्यता और विद्वत्ता प्रदान करेगा। आधुनिक मतों में द्वितीय भाव को प्रारंभिक शिक्षा व पारिवारिक संस्कार का द्योतक और पञ्चम भाव को उच्च शैक्षिक उपाधि या अकादमिक डिग्री का द्योतक माना हैं।

इसी प्रकार श्लोक में आये “भोज्यानि” शब्द से स्पष्ट होता हैं कि— कुंडली का द्वितीय भाव भोजन की आदतों (खाद्य व पेय पदार्थों) का प्रतिनिधित्व भी करता हैं। अतः इस भाव में पाप ग्रह शनि (Saturn), राहु का प्रभाव जातक को व्यसनों का शिकार बनाता हैं। इस भाव के वाणी पर प्रभाव होने से, इस भाव में उपस्थित शनि, राहु से जातक की बोली कठोर व कर्कश होती देखी गई हैं। कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य, मंगल जैसे क्रूर ग्रह की उपस्थिति से जातक की बोली, रौबदार व तीखी होती हैं। इस भाव में शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध की स्थिति जातक की बोली को सरल, प्रेममय, विद्वतापूर्ण बनाती हैं।

मंत्रेश्वर ने फलदीपिका के माध्यम से कहा हैं कि— 

“वित्तं विद्या स्वान्नपानानि भुक्ति वक्षाज्यास्यं पत्रिका वाक्कुटुम्बम् ।।” (अ. 1, श्लोक – 11)

अर्थात धन, विद्या, अपनी वस्तु (धन पर अधिकार), खाना पीना, भोजन, दाहिना नेत्र, चेहरा, पत्रिका (चिट्ठी), वाणी (बोलने की शक्ति), कुटुम्ब -यह द्वितीय घर के नाम हैं अर्थात् इन सब का विचार द्वितीय भाव से करें।

आचार्य मुकुन्द दैवज्ञ का भी कथन हैं कि—

वित्तं कुटुम्बं मणिदक्षिणाक्षिवाग्वकत्रविद्याबहुभाषणानि।

स्वर्णादिकानां क्रयविक्रयौ च रत्नादिकानामपि सञ्चयश्च ।।

दातृत्ववित्तोद्यमकृत्रिमाश्च वर्द्धिष्णुता चास्तिकपोषकत्वे । गमागमस्येह विधिः करोत्थानृते च नासारसनाम्बराणि ।।

मुक्ताफलं भुक्तिविशेषसत्य। मित्राणि मित्रं निजपूर्वजार्थम् । दासार्थसिद्धी निधनस्यजालं प्रासन्नधान्ये विनयोऽर्थगेहात् ।। (भा.म. अ. 2, श्लोक 3,4,5)

अर्थात द्वितीय स्थान धन स्थान है, अतः इस स्थान से धन, कुटुम्ब, रत्न, दायीं आंँख, वाणी, मुख, विद्या, ज्ञान, वाक्पटुता, सुवर्णादि धातुओं का क्रय विक्रय, दानशीलता, धन के लिए प्रयत्न, बनावट या प्रदर्शन की भावना, वृद्धि, ईश्वर में विश्वास, परिवार का उत्तरदायित्व, समीप दूर की यात्राएंँ तथा चलने का ढंग, नाखून, असत्यवादिता, नाक, जीभ, कपड़े, मोती, भोग, सत्यप्रियता, शत्रु, मित्र, पैतृक धन, नौकर, धन-लाभ, मृत्यु, विचार पद्धति, प्रसन्नता, धान्य तथा विनयशीलता आदि का विचार करना चाहिए।

धन, धन से किए जाने वाले कार्य तथा धन कमाने का प्रयोजन, ये सब बातें परस्पर सम्बद्ध हैं, अतः इनका विचार भी इसी भाव से किया जाता है। 

मेदिनी ज्योतिष (Mundane Astrology) में द्वितीय भाव || 2nd House in Mundane Astrology

मेदिनी ज्योतिष (Mundane Astrology) में द्वितीय भाव (Second House)— मुख्य रूप से राष्ट्र की आर्थिक स्थिति, धन-संपदा, वित्तीय संसाधनों, कृषि, स्वर्ण भंडार, खनिज संपदा, देश की जनता, देश में प्रचलित भाषाई विविधता, देश की संस्कृति आदि से जुड़ा होता है। यह भाव देश की समग्र संपत्ति और आर्थिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। 

मेदिनी ज्योतिष में द्वितीय भाव से राष्ट्रीय बजट (National Budget), खजाना (Treasury / Exchequer), बैंकिंग संस्थान, रिज़र्व बैंक, स्टॉक एक्सचेंज, शेयर बाजार, वित्तीय बाजार (Banks, Stock Exchanges, Financial Markets, Federal Reserve), मुद्रा की मजबूती (Strength of Currency), मुद्रा का मूल्य और उसका प्रसार, व्यापार और वाणिज्य (Trade & Commerce), निर्यात (National Exports), व्यापार का संतुलन, लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power of the People), राष्ट्रीय आय (National Income), वित्तीय स्थिरता (Financial Stability), प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली आय (Wealth from natural resources), कर संग्रह (Taxation Revenue), सरकारी राजस्व के स्रोत, देश की आर्थिक नीतियां और वित्तीय संस्थानों की स्थिति, पड़ोसी देशों या अन्य राष्ट्रों के साथ आर्थिक संबंध और कुछ व्याख्याओं में कर्ज़/ऋण की स्थिति आदि विषय विचारणीय हैं।

इसके अतिरिक्त द्वितीय भाव से अर्थ शास्त्र (Economics), लेखाशास्त्र (Accountancy), धर्मशास्त्र, होटल मैनेजमेंट, ज्योतिष, आयुर्वेद, वाणिज्य (Commerce), गायन-वादन (Music), भाषा और साहित्य (Languages & Literature), वस्त्र उद्योग, कहानी, उपन्यास, लोक निर्माण विभाग, बीमा कंपनी, सोना-चांदी, रत्न, द्रव्य आदि के बाजार, ज्यामिति (Geometry), सर्वेक्षण विभाग, एकाउंटेंट, बिलिंग स्टॉफ, रसोइया (Master Chef), शराब आदि विक्रेता का विचार किया जाता हैं।

द्वितीय भाव का स्वामी (Lord of 2nd House) राष्ट्र की धन प्राप्ति के मुख्य स्रोतों को दर्शाता है। यदि द्वितीय भाव व भावेश बली हो, और शुभ भावों व प्रचुर शुभ ग्रहों से संबंध स्थापित करते हुए राष्ट्र कुण्डली में स्थित हों, तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती हैं; व उस राष्ट्र के कोष सदैव भरे रहते हैं। जनता समृद्ध और सुखी होती हैं। जबकि पीड़ित होने पर आर्थिक संकट, मुद्रा अवमूल्यन, बजट घाटा, बैंकिंग संकट, व्यापार में घाटा, घोटाला, जन विद्रोह, गरीबी, अकाल, भूखमरी, वित्तीय आपात, बाढ़, सुखा, अपराध आदि की वृद्धि के योग देश में बनते हैं।

प्रश्न ज्योतिष (Horary Astrology) में द्वितीय भाव || 2nd House in Horary Astrology

प्रश्न कुंडली में द्वितीय भाव से, प्रश्नकर्ता को मिलने वाले सहयोग, लाभ-हानि, किसी अन्य की शक्ति व संसाधनों का लाभ, आभूषण आदि बेशकीमती रत्न, माणिक्य, सोना-चांदी जैसे स्थाई संपत्ति, कागज़ी दस्तावेज, विचारों की अभिव्यक्ति की योग्यता व शैली, पुनर्विवाह, संतानप्राप्ति, नवागंतुक से लाभ, सामाजिक दृष्टिकोण, दाहिनी आँख व अवलोकन की क्षमता, स्मृति, नाखून, नीयत, जिह्वा, नाक, दंत, गाल, दाढ़ी, आदि से संबंधित विषय, कल्पनाशीलता, पारिवारिक सदस्य, राष्ट्रीय संपदा, बैंकिंग गतिविधियांँ, राजस्व, प्रश्नकर्ता का सत्य अथवा असत्य चरित्र, इत्र आदि सुगन्धित द्रव, वाक् सिद्धि, जमीन-जायदाद पर ऋण अथवा जमीन-जायदाद के बिकने से संबंधित लाभ, संतान के मान-धन की लाभ-हानि, पिता अथवा पिता तुल्य अभिभावक की हानि आदि का विचार किया जाता हैं।

इसके अतिरिक्त प्रश्न कुंडली के द्वितीय भाव से, प्रश्नकर्ता के निकट संबंधी सभी रिश्तेदार, ऋण / कर्ज से संबंधित मुद्दे, संपत्ति, गहने आदि खोने या चोरी होने से संबंधित मुद्दे, मंत्र सिद्धि आदि का विचार किया जाता हैं।

द्वितीय भाव में स्थित विभिन्न ग्रहों के फल || Effects of Different Planets Situated in the 2nd House

द्वितीय भाव में सूर्य का फल || Sun in the 2nd House

कुंडली में द्वितीय भाव में सूर्य होने से वह जातक को मुख संबंधी रोगी, नाक, कान, गले का रोगी, संपत्तिवान, भाग्यशाली, झगड़ालू, स्वाभिमान की अधिकता जिससे जातक को कभी-कभी अहंकारी होता हुआ देखा जा सकता हैं। राजा, राजकर्मचारी व पावरफुल लोगों के समक्ष झुकने वाला अथवा उनकी चापलूसी करने वाला, स्त्री लोलुप व स्त्रियों के लिए स्व-कुटुम्बियों से लड़ने-झगड़ने वाला, अत्यधिक मितव्ययिता के कारण कभी-कभी धन संबंधी जोखिम जीवन में देखनी पड़ती हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर कुंडली के कारक ग्रहों व शुभ ग्रहों का प्रभाव हों, व सूर्य स्वयं भी शुभ व बली अवस्था में हो तो, जातक लाल-गुलाबी मांसल हाथों वाला, रोम युक्त शरीर से लक्षणयुक्त, धनवान, सम्मानित, सूर्य के बल अनुसार अपने मित्रमंडली, क्षेत्र, किसी संगठन अथवा समुह का प्रधान होता हैं। व्यक्ति धनवान, सम्पत्तिशाली और आर्थिक रूप से मजबूत बनता है। सरकारी नौकरी, उच्च पद या सरकारी स्रोतों से आय की संभावना बढ़ती है। वाणी में तेज, स्पष्टता और प्रभावशाली अंदाज आता है। जातक विरासत और कुटुम्बियों से सुखी, नाना प्रकार के भोज्यपदार्थों व पेय पदार्थों का भोग करने वाला, रत्न आभूषणों से युक्त शासक वृत्ति का होता हैं।

वहीं यदि कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर, पाप प्रभाव हो, सूर्य निर्बल व पीड़ित अवस्था में हो तो, जातक को नाना प्रकार के नाक, कान, गला व मुख संबंधी रोग, दांँतों की सड़न (Cavities), मसूड़ों की सूजन (Gingivitis), मुंँह के छाले (Ulcers), सांसों की दुर्गंध (Halitosis), ओरल थ्रश (फंगल संक्रमण), दांँत पीसना (Bruxism), मुंँह सूखना (Dry mouth), ल्यूकोप्लाकिया (सफेद धब्बे) और मुंँह का कैंसर (Oral Cancer) जैसे रोग पीड़ित करते हैं। जातक झूठे दिखावे में इतना खर्च करता हैं कि दिवालिया होने की नौबत आ जाती हैं। ऐसे में पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में तनाव, धन संचय में परेशानी, विरासत से दूर, चिड़चिड़ा स्वभाव का होता हैं।

द्वितीय भाव में चन्द्रमा का फल || Moon in the 2nd House 

कुंडली के द्वितीय भाव में चन्द्रमा हों तो, जातक मधुरभाषी, सुन्दर मुखड़े वाला, संततिवान, भोग-विलास का शौकीन, रचनात्मक प्रतिभा का धनी, परदेश में निवास करने वाला, सहनशील, परिवार में सबका प्रिय, इश्वर भक्त अर्थात आस्तिक, तरल संपत्ति वाला अर्थात चल संपत्ति से युक्त, शांति प्रिय, कुटुम्बियों में सबसे मिलनसार, सौभाग्यशाली होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित चन्द्रमा यदि शुभ, शक्तिशाली कारक ग्रहों से संबंध स्थापित करता हैं, तो जातक विदेशी व्यापार में सफल, कच्चे माल का व्यापारी, तीव्र प्रखर बुद्धि वाला, जबरदस्त जान-पहचान वाला, दिव्य कांतिमान, धनी, निवेश से लाभ प्राप्त करने वाला, उच्च शिक्षित, सभ्य, प्रकृति प्रेमी, अपने समाज का मुखिया अथवा जनप्रतिनिधि होता हैं। 

द्वितीय भाव में स्थित चन्द्रमा यदि पाप पीड़ित व निर्बल अवस्था में हों, तो जातक को अधिक भावुक बनाता हैं। जीवन में आर्थिक नुकसान भी वित्त संबंधी भावुक निर्णयों का परिणाम होता हैं; इसके साथ-साथ अनियंत्रित विवादित बयान, आर्थिक उतार-चढ़ाव, कुटुम्बियों से मतभेद व भावनात्मक दूरी, छद्म शत्रु, जीवनसाथी पर संदेह अथवा जीवनसाथी से धोखा, समाज, सहकर्मी, पारिवारिक सदस्यों से अलगाव की भावनाएं आदि जातक को मानसिक अस्थिरता देती हैं। द्वितीय भाव में में निर्बल व पाप पीड़ित चन्द्रमा आंखों की समस्या, सिरदर्द, मस्तिष्क पीड़ा, तनाव, डिप्रेशन, अनिद्रा, भय-घबराहट, रक्त विकार, दमा, मिर्गी या मानसिक असंतुलन की संभावना बढ़ती है।

द्वितीय भाव में मंगल का फल || Mars in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में मंगल हो तो, जातक कड़वा बोलने वाला, आक्रामक व उत्तेजित स्वर वाला, धनहीन, निर्बुद्धि मतांतर से ईर्ष्यालु व क्षोभित बुद्धि वाला, पशुपालन व कृषि कार्य में उन्नतिवान, परिवार में कलह करने वाला, चोर / दस्युओं (डाकुओं) की भक्ति करने वाला अर्थात इनसे मैत्री संबंध वाला, अपने विचारों का कट्टर वा अपने पंथ (हिंदू/मुस्लिम आदि) का कट्टर समर्थक, आँख, कान, नाक, गला में खून, मवाद, घाव-फोड़ा संबंधित रोगी, कड़वा व तीखा भोज्यपदार्थ व पेय पदार्थों में रुचिवान होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित मंगल पर मित्र ग्रहों व कुंडली के कारक ग्रहों का दृष्टि/युति आदि प्रभाव हो, तो जातक प्रबल प्रभावशाली, कृषि व पशुधन से गाढ़ी कमाई करने वाला, समाज का मुखिया अथवा सरपंच, दुष्ट व्यक्तियों का गुरु अर्थात चोर-बदमाश, गुंडे-मवालियों का शासक, बलिष्ठ, बाहुबल से धनार्जन करने वाला, पुलिस, सेना, प्राशासनिक विभाग में नियुक्त, राजा अथवा राजतुल्य प्रभावशाली नेता / नेतृत्व की दाहिनी भुजा (Right hand) होता हैं। 

किन्तु यहीं द्वितीय भाव में स्थित मंगल यदि निर्बल, पाप ग्रहों वा शत्रु ग्रहों द्वारा पीड़ित हो, तो जातक को मिथ्या अहंकारी, क्रोधी, नीच जनों द्वारा धन हानि का शिकार बनाता हैं। जातक परिवार व निकट संबंधों में क्लेश करने वाला, अपशब्द व गाली-गलौज करने वाला, दुष्ट बुद्धि, ज्वर, कमजोरी, नशीले पदार्थो के सेवन से धन और शरीर दोनों की क्षति करने वाला होता हैं। ऐसे में जातक पैतृक संपत्ति का नाश करने वाला, मुकदमा आदि से पीड़ित, बार-बार धोखे का शिकार होता हैं।

द्वितीय भाव में बुध का फल || Mercury in the 2nd House 

कुंडली के द्वितीय भाव में बुध हो तो जातक सफल स्पष्ट वक्ता, मृदुभाषी, चतुर, व्यवसायिक बुद्धि वाला, सुखी, सुराही के समान सुन्दर और भरे हुए गले वाला, सुन्दर मुखड़ा, मिष्ठान व नाना प्रकार के पकवानों का प्रेमी, खट्टे, चटपटे भोजन और पेय में रुचिकर, गणित , कंप्यूटर, अकाउंट्स, मैनेजमेंट, आदि विषयों की गहरी समझ रखने वाला, दलाली, वकालत, संभाषण, तर्क-वितर्क से धनाढ्य होने वाला, साज-सज्जा में अत्यधिक खर्चीला, धन संग्रह करने में अति निपुण, सोना, चाँदी आदि चमकदार और कीमती धातुओं का संग्रहकर्ता, धर्म युक्त आचरण करने वाला, सत्कर्म करने वाला, अतीव साहसी होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित बुध यदि उच्च, स्वराशि, मित्र राशि में शुभ, उदित और बली अवस्था में हो, एवं शुभ मित्र ग्रहों से दृष्टि/युति आदि संबंधों में हो तो जातक अत्यंत रुपवान, हँसमुख, गणित, कंप्यूटर, विज्ञान, लेखाशास्त्र का मर्मज्ञ, अधिक मित्रों वाला, विपरीत लिंगीयों का प्रिय, प्रचुर मैथुन सुख वाला, यात्राओं का शौकीन, फुर्तीला, खेलकूद प्रतियोगिता में रुचिवान, विनोद पूर्वक गुढ़ बातें कह जाने वाला, कीमती रत्न व धातुओं के निवेश से लाभ अर्जित करने वाला, लग्जरी संसाधनों व उपकरणों से सुखी, कौटुंबिक सहयोग से लाभान्वित, प्रचुर पैतृक संपदा से युक्त, बहुत से प्रेम संबंधों वाला होता हैं। 

कुंडली के द्वितीय भाव में बुध पाप ग्रहों से पीड़ित, निर्बल व शत्रु वर्गों में स्थित हों तो जातक बड़बोले स्वभाव का, दाग, छिद्र व रोम युक्त चेहरे वाला, हकला कर या तुतला कर बोलने वाला, साइनस, तंत्रिका विकार, चर्म रोग से पीड़ित, कमजोर शरीरी, कुपोषण का शिकार होता हैं। मितव्ययिता, अभाव, अनियोजित खर्च से चिड़चिड़ा स्वभाव का, दूसरों का धन छल से या धोखे से चोरी करने वाला होता हैं। पारिवारिक संबंधों में तनाव व जीवनसाथी के संबंध में अनैतिक मूल्यों वाला, अप्राकृतिक यौन व्यवहारों वाला होता हैं।

द्वितीय भाव में गुरु (बृहस्पति) का फल || Jupiter in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में गुरु (बृहस्पति) के, शास्त्रकारों ने बड़े शुभ फल बताए हैं। यथा जातक, सुन्दर दीर्घ शरीरी, दीर्घायु, मधुर ज्ञान संयुक्त संभाषण करने वाला, संपत्तिवान, कुटुम्ब व संतत्तियों से युक्त, लोक में आदर का पात्र, राजा, राजकर्मचारी अर्थात सरकार से लाभान्वित, दान-पुण्य, यज्ञादि कर्म करने को आतुर, सत्य और धर्म युक्त कार्यों से चिरकाल तक यश प्राप्त करने वाला, परम भाग्यशाली, शत्रु दल पर विजय प्राप्त करने वाला, धर्मात्मा होता हैं। 

चूंकि आर्ष ज्योतिष ग्रंथों में गुरु (बृहस्पति) को द्वितीय भाव का कारक माना गया हैं; और ज्योतिष का सर्वमान्य सूत्र “कारको भावनाशाय” अर्थात भाव कारक यदि भाव में हीं स्थित हों, तो अभीष्ट भाव के फलों का नाश करता हैं। इस सूत्र से भी और व्यवहार में भी द्वितीय भाव के गुरु (बृहस्पति) के अधिकतर फल द्वितीय भाव के कारकत्व के संबंध में नकारात्मक हीं मिलते हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित गुरु (बृहस्पति) शुभ मित्र ग्रहों से दृष्टि/युति संबंध में, बलवान अवस्था में हो तो जातक धर्मकार्यों में संलग्न, सुन्दर भव्य शरीरी, तेजस्वी मुखाकृति, दीर्घायु, नीतिज्ञ, संभ्रांत, सौम्य, प्रभावशाली, कुटुम्ब और समाज में सम्मानित, सरकार व प्रशासनिक संबंधों वाला, उदार, कर्त्तव्यपरायण, शिक्षा, धर्म, अध्ययन, अध्यापन, ज्योतिष कानून, वित्त, सरकारी क्षेत्र, बैंकिंग,रसायन शास्त्र आदि क्षेत्रों से धनार्जन करने वाला, विरासत और ससुराल से भी धन लाभ प्राप्त करने वाला, बड़े परिवार वाला, मानी, जनकल्याणकारी, विविध विषयों का ज्ञाता होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित गुरु (बृहस्पति) पर यदि पाप प्रभाव हो, अथवा गुरु निर्बल व पाप वर्गों में स्थित हो, तो जातक में लोभ, मोह, अहंकार जैसे दुर्गुण देखने को मिलते हैं। ऐसा जातक शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ करने वाला, अहंकारयुक्त भाषण करने से परिवार में द्रोह करने वाला, पैतृक संपदा का नाश करने वाला, अनावश्यक खर्च से आर्थिक तंगी देखता हैं। पेट, लीवर, मोटापा, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदयाघात, ब्रेन हैमरेज जैसी बिमारी और दुर्घटनाओं से पीड़ित, मुकदमेबाजी में उलझना, बार-बार मानहानि का शिकार, दूसरों के पचड़े में टांग अड़ाने की आदत से लाचार होता हैं।

द्वितीय भाव में शुक्र का फल || Venus in the 2nd House 

कुंडली के द्वितीय भाव में यदि शुक्र हो तो जातक धनवान, यशस्वी, लोकप्रिय, कीर्तिमान स्थापित करने वाला, सुखी, भोग-विलास के संसाधनों से भरपूर, दीर्घजीवी, सौन्दर्य प्रेमी, ललित कला, संगीत आदि का शौकीन, मिष्ठान व स्वादिष्ट भोजन के प्रति आसक्त, बहुमूल्य रत्न आदि का व्यवसाय करने वाला, व इन रत्नों व स्वर्ण आदि बहुमूल्य धातुओं का संग्रहकर्ता, कुटुम्ब में सम्मान का पात्र, विपरीत लिंगीयों का प्रिय व उनसे धन प्राप्त करने वाला, सुन्दर, कलात्मक बातें करने वाला, इश्वर भक्त, भाग्यवान, कविता, लेखन आदि करने वाला, नाना प्रकार के कीमती वस्त्राभूषणों का शौकीन, प्रचुर वाहन सुख वाला होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित शुक्र, बली, पुष्ट, मित्र ग्रहों व कुंडली के कारक ग्रहों के प्रभाव में होकर, शुभ वर्गों में स्थित हो, तो जातक की मुखाकृति सुंदर, चमकदार, आकर्षक नेत्र और दांँत होते हैं। जातक मानी, धनी, सुखी, मांसल हाथों व जांघों वाला, सुन्दर केशों वाला, संगीत, नृत्य, कला आदि क्षेत्रों में रुचि रखने वाला, कामकला में निपुण, परिवार में सम्मानित, मिलनसार, बुद्धिमान होता हैं। जीवनसाथी सुंदर, सहयोगी और सुखदायी होता है। प्रेम संबंध मजबूत रहते हैं। घर में सौंदर्य और आराम का माहौल रहता है। कला, फैशन, सौंदर्य, ज्वेलरी, मनोरंजन, होटल, फूड इंडस्ट्री, संगीत या विलासिता संबंधी क्षेत्रों में सफलता, सरकारी अनुकूलता व यश मिलता है।

वहीं यदि कुंडली के द्वितीय भाव में शुक्र निर्बल, पाप ग्रहों से पीड़ित व पाप वर्गों में स्थित हों, तो जातक अत्यधिक विलासिता, खर्चीला स्वभाव व अस्थिरता के कारण धन की बर्बादी करता हैं। परिवार में कलह, जीवनसाथी से मतभेद व वैवाहिक संबंधों में ठंडक / तनाव रहता हैं। स्वास्थ्य में मुंँह, दांँत, गले या आँखों की समस्या; मोटापा या विलासिता से जुड़ी बीमारियाँ, कभी-कभी नैतिकता से समझौता, अवैध साधनों से धन कमाने की प्रवृत्ति, व अवैध संबंधों में लिप्त रहता हैं। ऐसे शुक्र पर यदि दो या दो से अधिक पाप प्रभाव (राहु-केतु, शनि, मंगल का दृष्टि/युति संबंध) हो तो, जातक अप्राकृतिक मैथुन व समलैंगिकता की ओर झुकाव रखता हैं।

द्वितीय भाव में शनि का फल || Saturn in the 2nd House 

कुंडली के द्वितीय भाव में शनि स्वराशि के अतिरिक्त किसी अन्य राशि में हो तो, जातक मुख, दाँत, मसूड़ों से संबंधित दीर्घकालिक रोगों वाला, साधु-संतों-सज्जन पुरुषों का अपमान करने वाला, मिथ्याचारी, कड़वा ईर्ष्या से युक्त संभाषण करने वाला, कट्टु-तिक्त भोज्यपदार्थ व मादक पेय पदार्थ में रुचिकर, अपने घर से दूर परदेश में रहने वाला, कठिन परिश्रम करने को मजबूर, दुर्गंधयुक्त मुख वाला, बार-बार दुर्घटनाओं का शिकार, अनियमित आय वाला होता हैं। स्वराशि अथवा उच्च का होने पर कुछ शुभ फल शास्त्रकारों ने कहे हैं— यथा परिश्रम से धनी, कुटुम्ब से दूर किन्तु संबंधों में बने रहने वाला, धन संग्रह करने में निपुण, कुटिल मृदुभाषी होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित शनि यदि स्वराशि या उच्च राशि का होकर, शुभ ग्रहों व कुंडली के कारक ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक कम उम्र में ही परिपक्व, परिवार का मुखिया, पैतृक संपत्ति का रक्षक दूरदर्शी और जिम्मेदार बुद्धिमान, न्यायप्रिय, दयालु और आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होता है। अनुशासन और मेहनत से यश मिलता है। प्रॉपर्टी, भारी व्यापार या तकनीकी क्षेत्र, इंजीनियरिंग, खनन, भेड़-बकरियांँ, ऊँट आदि के पालन, कम्बल, गद्दा, रजाई, रुई, आदि से संबंधित व्यवसाय, फाइनेंस, श्रम या सरकारी क्षेत्र, न्यायिक व प्रशासनिक क्षेत्र, ठेकेदारी, नशीले पदार्थों के व्यवसाय आदि से लाभ मिलता हैं। बढ़ती उम्र के साथ आर्थिक स्थिति शनै-शनै मजबूत होती हैं। परिपक्वता और जीवन दर्शन की गहरी समझ होती हैं, जिसके कारण मित्र कम किन्तु उपयोगी होते, शरीर दुबला, छरहरा किन्तु मजबूत होता हैं। आँखें छोटी, गहरी व व्यवहार शांत और गंभीर होता हैं।

वहीं कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित शनि अधिक बलवान, पाप ग्रहों से संयुक्त अथवा दृष्ट हो, व कोई शुभ प्रभाव न हो, तो जातक बाल्यकाल से हीं दरिद्रता में जीवन जीने को विवश, आलसी, रोजी-रोटी का अभाव, कटु बोलने वाला, निर्दयी, ईर्ष्यालु, चिड़चिड़ा, कठोर हृदय होता हैं। घर-परिवार से दूर परदेशवासी होता हैं। शनि के निर्बल होकर पीड़ित होने पर, जातक अपनी वास्तविक उम्र से अधिक उम्र का दिखता हैं। नाना प्रकार के असाध्य रोग, नस व स्नायु तंत्र से संबंधित रोग, नशाखोरी, नपुंसकता व कुष्ठ रोग से जातक पीड़ित होता हैं।

द्वितीय भाव में राहु का फल || Rahu in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में यदि राहु हो तो जातक परदेश गामी, अल्प संतति व थोड़े कुटुम्ब वाला, कठोर अपशब्द बोलने वाला, विदेशी भाषाओं का ज्ञान रखने वाला, अल्प धनी अथवा बेईमानी से धन हड़पने वाला, कंजूस, संग्रह करने में निपुण, मादक द्रव्य व धुम्रपान आदि नशा करने वाला, अथवा अखाद्य / अभक्ष्य का भक्षण करने वाला, शत्रुंजय, दलाली, मुनाफ़ाख़ोरी, मिलावट करके व्यापार करने वाला, नेतागिरी से धन इकट्ठा करने में निपुण, सुन्दर भव्य निवास मे रहने वाला, काम, क्रोध, मद, मोह आदि सभी दुर्गुणों से युक्त, भ्रम युक्त व्यवहार करने वाला, शत्रुओं पर विजयी, धोखेबाज, अस्थिर संपत्तिवान् होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में राहु यदि अनुकूल राशियों [मिथुन (Gemini), कन्या (Virgo), कुंभ (Aquarius) आदि] वा अनुकूल नक्षत्रों में स्थित होकर कुंडली के शुभ कारक ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो, जातक सफल व्यापारी अथवा कुटनीतिज्ञ, अच्छा वक्ता, मोटिवेशनल स्पीकर, विभिन्न स्रोतों से धनागम करने वाला, भारी आवाज़ वाला किन्तु मधुरभाषी, दाँतों पर विशेष आकर्षण वाला, अधिक मित्रों वाला, अच्छे-बुरे सभी प्रकार के लोगों से मधुरता पूर्वक अपने काम निकलवाने में माहिर, राजनीतिक जीवन में सक्रिय, स्वर्ण, रत्न आदि बहुमूल्य धातुओं के शौकीन, अपराधिक मानसिकता वाला, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, ख़तरनाक व जोखिम भरे टेक्नोलॉजी, राजनीतिक स्रोतों, विदेशी मुद्रा, स्टॉक एक्सचेंज, Forex trading, Crypto currency आदि से संबंधित कार्यक्षेत्रों से धनी होता हैं।

वहीं कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित राहु प्रतिकूल राशियों व नक्षत्रों में स्थित होकर, कुंडली के अकारक ग्रहों से दृष्टि-युति आदि संबंध स्थापित करे तो, जातक अश्लील, विवादित, कठोर वचन बोलने वाला, झूठा, मिथ्याचारी, अत्यधिक लालसा, लालच, छल-कपट या अनैतिक/जोखिम भरे तरीकों से कमाई की कोशिश में, कभी अचानक लाभ के साथ कभी अचानक नुकसान करने वाला होता हैं। रिश्तेदारों से कर्ज के लेने-देने में विवाद, अस्थिर छद्म व्यवहार के कारण प्रेम संबंधों व वैवाहिक सुख में बाधा, भय, आत्मघाती विचार या भावनात्मक अस्थिरता से जातक पीड़ित होता हैं। चेहरे (ठोड़ी पर) पर निशान, बड़ी बेडौल नाक, उबड़-खाबड़ या ऊंचे दाँत या मसूड़ा, मुँह से बदबू, नशीले पदार्थों व अखाद्य को खाने-पीने की आदत, पीले धूम्रवर्णी आँख, खुरदरी अथवा असामान्य त्वचा अथवा त्वचा संबंधी रोग, असामान्य खान-पान की आदतों से पाचन संबंधी समस्याएँ (कब्ज, त्वचा रोग आदि), उत्तेजना, भूत-प्रेत जनित भय आदि जैसे मनोरोगों से जातक शारीरिक व मानसिक रुप से पीड़ित होता हैं।

द्वितीय भाव में केतु का फल || Ketu in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में केतु के स्थित होने पर जातक दिशाहीन परिश्रम करने वाला, राजा, शासन वा प्रभावशाली लोगो से प्रभावित, अंधश्रद्धा में जीने वाला, जिद्दी, अविवेकी, निडर, असाध्य रोग से पीड़ित, कुलीन लोगों से ईर्ष्या अथवा शत्रुता रखने वाला, बागी वा विरोधी विचारों वाला होता हैं। आँख, मुख, गले पर घाव चोट का चिह्न, व इन अंगों से संबंधित व्याधि अथवा दुर्घटना में इन अंगों को क्षति पहुंँचती हैं। जातक गुढ़ विषयों यथा तंत्र, आध्यात्म आदि में रुचि रखने वाला, कमोबेश विरक्त स्वभाव, विविध भाषाओं में रुचि रखने वाला, आकर्षक व्यक्तित्व का धनी होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में केतु यदि अनुकूल राशियों [धनु (Sagittarius), मीन (Pisces)आदि] अथवा अनुकूल नक्षत्रों में हो, व कुंडली के शुभ कारक ग्रहों से प्रभावित हो, तो जातक अंतर्मुखी, ज्ञानी, आने वाले समय की विलक्षणता को व सम्मुख बैठे व्यक्ति के मन को अच्छी तरह भांप लेने वाला, कम किन्तु ठहराव के साथ बोलने वाला, मजबूत याददाश्त वाला, विचित्र वस्त्रों का शौकीन, दूसरों की संपत्ति यथा ससुराल से दहेज अथवा दूर के कुटुम्ब या रिश्तेदार के संपत्ति से लाभान्वित, प्रचुर पैतृक संपत्ति वाला, पुरातन / ऐतिहासिक वस्तुओं के संग्रह का प्रेमी, खान-पान में विशेष रुचि न रखने वाला, आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर, संतुलित पारिवारिक संबंधों को जीने वाला, तीक्ष्ण बुद्धि, शोध, ज्योतिष या गूढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाला, वैवाहिक जीवन अथवा प्रेमी जीवन में, प्रेम करने में उदासीन किन्तु कामक्रीड़ा में आक्रामक, भौतिकता के प्रति कम लगाव, ज्यादा विरक्ति का भाव होता हैं।

वहीं कुंडली के द्वितीय भाव में केतु यदि प्रतिकूल राशियों वा नक्षत्रों में स्थित होकर पाप व कुंडली के अकारक ग्रहों से युति-दृष्टि आदि संबंधों में हो, तो जातक की वाणी दोषयुक्त यथा हकलाना, तुतलाना अथवा बोलते वक्त शब्द भूल जाना, धन संग्रह के प्रति उदासीन, लेन-देन में धोखाधड़ी, व्यवहारिकता का अभाव, निकट संबंधों में कलह व कभी-कभी रक्तपात भी, भ्रम, भाग्य के प्रति निराशा का भाव, अकेलेपन की आदत, आलस्य व ज्यादा सोने की आदत, लड़ाकू, कुतर्क करने की आदत, लाभरहित विषयों में समय व्यर्थ करता हैं। शरीर पर जलने अथवा चोट के निशान होते हैं।

द्वितीय भाव में Uranus (अरुण) का फल || Uranus in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में Uranus (अरुण) जातक को सुन्दर आकर्षक मुखड़ा, सीधे केश, चंचल व आवेगी बनाता हैं। जातक जोखिम भरे कार्यक्षेत्र व निवेश से धन कमाने में जबरदस्त उतार-चढ़ाव का सामना करता हैं। जातक उन विषयों में रोजगार और निवेश तलाशते हैं, जो भविष्य में आने वाले हैं; अर्थात नवाचारी करियर, फ्रीलांसिंग, Tech, Crypto, अनुसंधान संस्थान आदि क्षेत्रों से धनागम करने वाला, जोखिम, नवाचार व जोखिम से भरे कार्यक्षेत्र में त्वरित रुचि के कारण वित्तीय उतार-चढ़ाव आम होती हैं; अर्थात कभी अचानक बहुत अधिक लाभ, तो कभी अचानक बहुत अधिक आर्थिक हानि। अनियोजित खर्च के कारण बचत की आदत नहीं होती। पैतृक संपत्ति में भी अचानक परिवर्तन, मुकदमा, बँटवारे आदि के कारण अनिश्चितता बनी रहती हैं। जातक के बोलने का ढंग क्रांतिकारी व्यंग्य युक्त और उग्र होता है। बाजार की चीज़ें व अनोखे खान-पान की वजह से रक्त विकार, तंत्रिका संबंधी विकार, इन्फेक्शन आदि का खतरा बना रहता हैं। कुटुंब वा पारिवारिक संबंधों से अलगाव के कारण जातक अकेला रहना पसंद करता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में Uranus (अरुण) यदि शुभ, स्वगुणी राशियों या नक्षत्रों में होकर, कुंडली के शुभ कारक ग्रहों से संबंध स्थापित करता हो, तो जातक पारम्परिक धन संग्रह के तरीकों के बजाय, अनोखा व नया संग्रह का तरीका अपनाते हैं। जातक सरल व सहज शब्दों में गुढ़ वैज्ञानिकता व आधुनिक अनुसंधानों की व्याख्या करने में निपुण, इन्वेंटिंग, टेक्नोलॉजी, इंटरनेट, इलेक्ट्रॉनिक्स, साइंस, क्रिप्टोकरेंसी, फ्रीलांस वा अनकन्वेंशनल करियर से अचानक लाभ प्राप्त करते हैं। रचनात्मक और इनोवेटिव सोच की वजह से समाज में आदर के पात्र और प्रतिष्ठित होते हैं। नई विचारधारा के पोषक, मौज-मस्ती में जीवन जीने वाले, तीक्ष्ण बुद्धि, व्यंग्यात्मक शैली में लिखने या बोलने वाले, विनोदी स्वभाव, डार्क ह्यूमर में अभ्यस्त होते हैं।

वहीं कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित Uranus (अरुण) प्रतिकूल राशियों या नक्षत्रों में स्थित होकर, कुंडली के पाप व अकारक ग्रहों से पीड़ित हो तो, जातक झगड़ालू स्वभाव का, मिथ्या अभिमानी, आर्थिक स्थिति में भयंकर उतार-चढ़ाव देखने वाला, क्षोभित, ईर्ष्यालु, उद्दंड, परिवार में अपयश का पात्र, जोखिम भरे फैसलों से अचानक नुकसान, आलसी, आराम पसंद, गैरजिम्मेदार, व्यसनों का आदी, हीन भावना का शिकार हो जाता हैं।

द्वितीय भाव में Neptune (वरुण) का फल || Neptune in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में Neptune (वरुण) की स्थिति से जातक प्रखर, आकर्षक, मस्तमौला, काव्यात्मक शैली में बातें करने वाला, खर्चीला, वस्त्राभूषणों का शौकीन, धन कमाने के लिए दूसरों के आधीन अथवा आसान राह ढूंढने के कारण लापरवाह, कला, आध्यात्म, NGO, अभिनय, जुआ सट्टा आदि से धन कमाने की ओर अग्रसर, भौतिकता को ज्यादा अहमियत नहीं देने वाला होता हैं; जिस कारण से कभी-कभी वित्तीय संकट का सामना भी करना पड़ता हैं। अंतर्ज्ञान से अच्छा निवेश या क्रिएटिव फील्ड जैसे आर्ट, म्यूजिक, फोटोग्राफी, लेखन आदि क्षेत्रों से अच्छी कमाई करता हैं। व्यसनों के कारण पाचनतंत्र, फेफड़े, गुर्दे की बिमारी की संभावना, पारिवारिक संबंधों और वैवाहिक जीवन में भी व्यवहारिकता से दूर कल्पनाशील और Impulsive (आवेगपूर्ण) व्यवहार से संबंधों में तनाव का सामना करना पड़ता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव Neptune (वरुण) यदि अनुकूल राशियों अथवा नक्षत्रों में, कुंडली के कारक व शुभ ग्रहों से दृष्टि-युति आदि संबंधों में स्थित हो, तो जातक आकर्षक मुखाकृति वाला, घुंघराले अथवा तरंगनुमा Wavy बालों वाला, सुन्दर सकारात्मक कल्पनाशील, रिश्तों में भावनात्मक लगाव वाला, काव्यात्मक शैली में प्रेम पूर्वक बातें करने वाला, सहृदयी, अंतर्ज्ञान से सही अवसर पकड़ने की क्षमता वाला, कलात्मक क्षेत्रों यथा (संगीत, कला, अभिनय, लेखन, फोटोग्राफी आदि) हीलिंग, आध्यात्म, योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, समुद्री व्यापार, शंख, मोती, वन्य सामग्री, जड़ी-बूटी, seafood आदि के व्यवसाय अथवा इन क्षेत्रों के कार्य से धनवान होता हैं। जातक टेलीपैथी, हिप्नोटिज्म, रहस्यमयी क्षेत्र यथा तंत्रमंत्र, जादू-टोना, ज्योतिष, शरीर विज्ञान, नाड़ी ज्ञान आदि में विशेष प्रतिभा से भी धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करता हैं। आजाद ख्याल और बंधनों से मुक्त जीवन जीने की आदत से, यदा-कदा संबंधों में उतार-चढ़ाव व यात्राओं से पर्याप्त दुरी भी बनती रहती हैं।

वहीं कुंडली के द्वितीय भाव में Neptune (वरुण) यदि प्रतिकूल राशियों अथवा नक्षत्रों में में विजातीय पाप व अकारक ग्रहों से पीड़ित हो तो, जातक आत्मग्लानि मे डूबा, मलीन, अकर्मण्यता का शिकार हो जाता हैं। जातक अवास्तविक अथवा करीब-करीब नामुमकिन कल्पनाओं में खोकर, ख्याली पुलाव बनाने में समय नष्ट करता हैं। परिवार अपेक्षाकृत बड़ा और कौटुंबिक सहयोग ना के बराबर मिलता हैं। किसी भी पारंपरिक सुरक्षा (stable income/savings) से संबंधित कार्य (व्यवसाय अथवा नौकरी) को ठहराव के साथ ना करके, कार्यों के बीच अनावश्यक Gapping/Break लेने की आदत, जीवन में अनियोजित खर्च और आर्थिक संकट पैदा कर देती हैं। भावुक आवेगपूर्ण निर्णयों से जातक व्यसन, आर्थिक धोखाधड़ी, भावनात्मक दिवालियापन का शिकार हो जाता हैं।

द्वितीय भाव में Pluto (यम) का फल || Pluto in the 2nd House

कुंडली के द्वितीय भाव में Pluto (यम) की स्थिति जातक को वित्तीय मामलों में प्रबल नियंत्रण देता हैं। जातक समय का सदुपयोग करने वाला, संसाधनों (resources) का सघन उपयोग करने वाला, रिसर्च, खनन, या गुप्त/ताकतवर क्षेत्रों जैसे पॉलिटिक्स, रिसर्च, फाइनेंस, गुप्तचर (Spy), अपराधिक गतिविधियों, घोटाले आदि क्षेत्रों से धन आगम की संभावना प्रबल होती हैं। शुष्क और ठंडा भोजन करने वाला, धीरे किन्तु भारी बोलने वाला, सदैव अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में Pluto (यम) यदि अनुकूल राशियों अथवा नक्षत्रों में, कुंडली के शुभ कारक ग्रहों से से दृष्टि-युति आदि संबंधों में हो, तो जातक गंभीर चित्त, कम बोलने वाला, अपने लक्ष्य की ओर ठहराव के साथ धीरे-धीरे अग्रसर होता हैं। जातक में अत्यधिक धन संचय की क्षमता, संसाधनों का कुशल प्रबंधन, निवेश आदि का गुण होता हैं। जातक शक्ति पर नियंत्रण रखने वाला, विपरीत परिस्थितियों में भी पुनर्निर्माण की अद्भुत क्षमता रखता हैं। परिवार व संबंधों में विशेष लगाव नहीं रखता, किन्तु कर्तव्यों का निर्वहन ऐसा करता हैं जैसे किसी के साथ अन्याय न हो, शांति व गंभीरता से दूसरों के वित्तीय संसाधनों पर भी जातक का परोक्ष नियंत्रण संभव होता हैं। अकस्मात धन लाभ, विरासत, रिसर्च, मनोविज्ञान, क्रिप्टो, पावर सेक्टर, भौतिक जीवन में नेपथ्य (Backstage) से अपने संपर्क में आने वाले लोगों का भविष्य (अच्छा या बुरा) तय करने अर्थात बड़े संगठनात्मक परिवर्तन करने की क्षमता रखने वाला होता हैं।

कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित Pluto (यम) यदि पाप व क्रूर ग्रहों से संबंध स्थापित करता हो, तो जातक को घोर दरिद्रता, अपमान, पारिवारिक कलह, अस्थाई निवास स्थान अर्थात बंजारों जैसी जिन्दगी देता हैं। जातक अपने मनोभाव को व्यक्त करने में असमर्थता का अनुभव करता हैं। जातक में दूसरों की जिन्दगी में ताक-झांक करने की आदत, धुर ईर्ष्या, चुगलखोरी का भाव आ जाता हैं।

द्वितीय भाव में कुछ विशिष्ट ग्रह योगों से उत्पन्न होने वाले कुछ विशिष्ट प्रभाव|| Some specific effects arising from certain planetary combinations in the 2nd house

1• यदि द्वितीयेश लग्न में हो और शुभग्रह कुंडली के दूसरे भाव में हो, तो जातक सर्व उत्कृष्ट गुणों वाला, धनी, सुन्दर मुख वाला, दूरदर्शी और सत्कुटुम्ब वाला होता है। यदि धनेश अर्थात द्वितीय भाव के स्वामी का सूर्य से सम्बन्ध हो तो जातक लोक का उपकार करने वाला, विद्वान् और धनवान् होता हैं। यदि धनेश का शनि मे सम्बन्ध हो तो जातक की विद्या क्षुद्र (छोटे प्रकार की) और अल्प होती हैं। ( फ. दी. अ.-16 श्लोक -5)

2• यदि धनेश अर्थात द्वितीय भाव के स्वामी का, बृहस्पति से संबंध हो तो जातक वेद आदि धर्मशास्त्रों में विद्वान् होता है। अर्थात उच्च कोटि का ज्ञान रखने वाला होता हैं। यदि द्वितीयेश का संबंध बुध से हो तो जातक अर्थशास्त्र, लेखाशास्त्र, मधुरभाषी, कुटनीति में कुशल होता हैं। यदि द्वितीयेश का संबंध शुक्र से हो तो, जातक श्रृंगार सम्बन्धी शास्त्र में (साहित्य, कामशास्त्र, नाट्यशास्त्र आदि) में; व यदि द्वितीयेश का संबंध चन्द्रमा से हो तो, जातक भिन्न-भिन्न कलाओं, व कल्पनाशीलता में कुशल होता हैं।; यदि द्वितीयेश का संबंध मंगल से हो तो जातक क्रूर कलाओ में विद्वान् होता हैं, और चुगलखोर भी होता हैं। यदि राहु द्वितीय स्थान में स्थित हो (या द्वितीयेश के साथ हो) तो स्पष्ट उच्चारण न करने वाला अथवा वाणी दोषयुक्त होती हैं; और यदि केतु द्वितीय में हो तो हकलाहट, तुतलाहट या असत्य वचन बोलने वाला होता हैं। यदि धनस्थान में पाप-ग्रह हो तो मनुष्य मूर्ख और निर्धन होता है। (फ. दी. अ.-16 श्लोक -6)

3• द्वितीयेश यदि बृहस्पति के साथ अपनी राशि में हो या केन्द्र में स्थित हो तो वह जातक को सर्व सम्पत्तियुक्त करता है। वहीं यदि द्वितीयेश बृहस्पति के साथ त्रिक (6-8-12) स्थान में हो तो जातक दुःखभागी और धनहीन होता है । यदि द्वितीयेश और द्वादशेश (12वें भाव का स्वामी) शुक्र एवं लग्नेश से युत होकर त्रिक (6-8-12 भाव) में स्थित हों, अथवा चन्द्रमा पापग्रह और शुक्र से युत होकर द्वितीय भाव में स्थित हो तो जातक नेत्रहीन होता है। (जा.अ., अ.-2, श्लोक-5)

4• सूर्य, मंगल और शनि यह तीनों ही यदि धन भाव को देखते हों तो मनुष्य धनहीन होता हैं; इसके साथ-साथ यदि हीन चन्द्रमा भी द्वितीय भाव से युक्त हो, अथवा द्वितीय भाव पर दृष्टिपात करे, तो जातक अवश्य निर्धन होता हैं। (यवनाचार्य मतेन) || फलकथन के समय आचार्यों के शब्दों को अक्षरशः ना लेकर उनके भाव को समझना आवश्यक हैं। अतः उक्त वक्तव्य के सापेक्ष प्रयोग में यह देखा जाता रहा हैं कि— सूर्य, मंगल और शनि ये तीनों हीं दृष्टि युति द्वारा द्वितीय भाव को प्रभावित करें, और कुंडली में क्षीण चन्द्रमा भी द्वितीय भाव में स्थित हो, अथवा द्वितीय भाव पर दृष्टिपात करे अर्थात अष्टमगत हो, तो जातक निर्धन होता हैं; और अति परिश्रम करने के बाद भी धन संग्रह नहीं कर पाता व बड़ी कठिनाई से जीवनयापन कर पाता हैं।

5• जो धन स्थान अर्थात द्वितीय स्थान में शुक्र हो और उसे बुध देखता हो, तो धन की प्राप्ति होती हैं। यदि द्वितीय स्थान स्थित शुक्र शुभ कारक ग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो, तो बहुत से धन की प्राप्ति होती हैं। धन भाव में पाप ग्रहों की दृष्टि अधिक हो तो धन नाश होता हैं, व सौम्य ग्रह की दृष्टि अधिक हो तो धन का लाभ होता हैं। (यवनाचार्य मतेन)

प्रयोग में ये दिखाईं पड़ता हैं कि— यदि धन स्थान में पाप / क्रूर ग्रह स्वराशि अथवा स्व-नक्षत्र युक्त होकर विद्यमान हो, और शुभ वा कुंडली के कारक ग्रह उनके साथ दृष्टि युति आदि संबंध स्थापित करते हो, तो जातक पाप / क्रूर कर्मों द्वारा धन संग्रह करता हैं।

6• धनेश अर्थात द्वितीय स्थान का स्वामी मंगल से युत होकर द्वितीय स्थान में स्थित हों, तो जातक धनी होता हैं। धनेश/ द्वितीयेश और लाभेश/ एकादश स्थान का स्वामी यदि स्थान परिवर्तन करें, अर्थात यदि द्वितीय भाव का स्वामी एकादश (11वें) स्थान में और एकादश स्थान का स्वामी द्वितीय स्थान में हों, अथवा द्वितीयेश और एकादशेश युत होकर कुंडली के केन्द्र स्थानों (कुंडली के 1,4,7,10 स्थान/भाव केंद्र स्थान हैं) में विराजित हों तो जातक धनवान होता हैं। 

धनेश / द्वितीयेश केंद्र में हों, और लाभेश अर्थात एकादशेश उससे त्रिकोण में हो, और गुरु-शुक्र से युत-दृष्ट हो, तो भी जातक को धन लाभ होता रहता हैं। (वृ.प.हो.शा.)

7• धन स्थान का स्वामी अर्थात द्वितीयेश और लाभ स्थान का स्वामी अर्थात एकादशेश कुंडली के 6ठे भावगत हो, और द्वितीय व एकादश स्थान पापयुत या पाप दृष्ट हो, तो जातक निर्धन होता हैं। यदि धनेश व लाभेश पाप ग्रहों से युत होकर कुंडली के दुःस्थान अर्थात 6ठे, 8वें या 12वें स्थान में हो, तो जातक जन्मजात दरिद्र व भिखारी होता हैं। (वृ.प.हो.शा.)

8• द्वितीय भाव में शुक्र व 11वें भाव में गुरु हो, द्वितीयेश अर्थात द्वितीय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों से युत हो, और 12वें भाव में शुभ ग्रह स्थित हो, तो धर्म युक्त कार्यों में धन का व्यय होता हैं; अर्थात जातक दान-पुण्य करने वाला, जलाशय, कूप, बावड़ी आदि बनवाने वाला, समाजसेवी होता हैं। 

9• यदि द्वितीयेश लग्न मे हो और लग्नेश धन स्थान में हो, अर्थात लग्नेश और द्वितीयेश यदि परस्पर स्थान परिवर्तन करें, तो अत्यल्प परिश्रम से हीं धन प्राप्ति होती है। कुंडली के जिस भाव में लग्नेश और धनेश की युति हो, उस भाव से संबंधित कार्यों से धन की प्राप्ति होती है। जैसे चतुर्थ भाव से भूमि, भवन, वाहन, माता व सुख आदि तथा कालपुरुष का चतुर्थ अंग कर्क में होने से चन्द्रमा के प्रतिनिधित्व में जो कार्य व्यवहार आते है; (यथा जल वा जलीय / समुद्री व्यवसाय, कला, लेखन, द्रव, रसायन आदि) उनसे धन प्राप्त होगा। इसी प्रकार अन्य भावों से फल विचारणीय हैं। यदि चन्द्रमा द्वितीय स्थान में शुक्र से दृष्ट हो तो जातक धनाढ्य होता हैं। यदि बुध द्वितीय में शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक सदैव धनी बना रहता है।

10• यदि द्वितीयेश शुभग्रह से युक्त-दृष्ट या शुभ नवमांश में हो तो जातक की आँखें सुन्दर होती हैं। इस योग में शुक्र को कुछ विद्वतजन शुभ ग्रह की श्रेणी में नहीं मानते, उनका मानना हैं कि, शुक्र नेत्र-दोष देने के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि मेरा मानना हैं कि, निर्बल, अकारक, अथवा पाप प्रभाव में शुक्र नेत्र विकार देता हैं, अन्यथा नहीं। यदि सूर्य, चन्द्र, मंगल एवं शनि किसी भी क्रम में , 2सरे, 6ठे, 8वें और 12वे भावों में हो (चाहें ये चारों ग्रह इनमें से चारों भावों में, तीन भावों में, दो भावों में अथवा किसी एक भाव में भी उपस्थित हों) तो इनमें से जो बलवान् ग्रह होगा, उससे संबंधित दोष (वात-पित्त-कफ) आदि से नेत्रहीनता, वाणी दोषयुक्त अथवा कान या गले का रोग होता है।

11• यदि द्वितीयेश राहु के साथ दुःस्थान (6,8,12 भाव) में स्थित हो, अथवा द्वितीयेश दुःस्थान में राहु के राशि स्वामी के साथ स्थित हों, तो द्वितीयेश, राहु अथवा राहु के राशि स्वामी के परस्पर दशा-अन्तर्दशा में मसूड़ों व दाँतों से संबंधित बिमारियाँ, दर्द, व रक्त स्राव होता हैं। यदि राहु, द्वितीयेश व तृतीयेश कुंडली के द्वितीय स्थान में युति करे, अथवा अकारक शनि व मंगल एक साथ द्वितीय स्थान में युति करे, तो गले, कंठ, नेत्र, गाल, दाँत, जीभ, कान व जो राशि द्वितीय स्थान में हों, काल पुरुष कुंडली अनुसार उस अंग में दर्द, पीड़ा, रक्तस्राव अथवा ऑपरेशन आदि अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं।

12• यदि द्वितीय भाव में मंगल शुभ ग्रह के साथ हो, व उसके साथ बुध, दृष्टि-युति आदि संबंधों में हो, अथवा द्वितीय भाव में शुभ ग्रह युक्त मंगल हो, और केन्द्र स्थानों (1,4,7,10वे भाव) में षड्बल अनुसार बली बुध विराजमान हो, तो जातक गणितज्ञ, विज्ञान व खगोल का ज्ञाता होता हैं।

13• यदि सूर्य अथवा मंगल द्वितीयेश होकर (कर्क ♋, तुला ♎, व मीन ♓ लग्न में ये संभव हैं।) अपने परावतांश (षोडश वर्गों में से 6 वर्गों में यदि कोई ग्रह एक समान राशि में हो, तो उस ग्रह को परावतांश में होना समझा जाता हैं।) में स्थित हों, और लग्न कुंडली में ये बृहस्पति व शुक्र से दृष्ट हों, तो जातक तर्क-वितर्क में माहिर, युक्तिपरक बातें करने वाला होता हैं। यदि द्वितीयेश बृहस्पति षड्बल अनुसार पूर्ण बलवान और उस पर सूर्य, बुध व शुक्र दृष्टिपात करें, तो जातक शब्दशास्त्र, छंदशास्त्र व व्याकरण का बहुभाषी विद्वान होता हैं।

14• यदि द्वितीयेश और सप्तमेश (6,8,12 भावों) में युति करें, एवं बृहस्पति और शुक्र पाप ग्रहों से पीड़ित, और बलहीन हों, तो जातक पति/पत्नी द्वारा पीड़ित, कुटुम्ब में द्रोह करने वाला, झगड़ालू और एक से अधिक वैवाहिक / अवैध संबंधों वाला होता हैं। यदि द्वितीयेश अथवा सप्तमेश उच्च के हों, और कुंडली के कारक ग्रहों से दृष्ट हों, तो बार-बार समझौते होते रहते हैं।

15• यदि द्वितीय स्थान में सूर्य या मंगल हो, तो कड़वा, तीखा भोजन करने वाला, बुध, शुक्र, बली व शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा और बृहस्पति हो तो मिष्ठान प्रेमी, व विभिन्न रंगीन, मीठे पेय पदार्थों को चखने वाला, यदि शनि, राहु हो, अथवा शनि, राहु से युत मंगल हो, तो अभक्ष्य का भक्षण करने वाला, मदिरा आदि नशीले पेयपदार्थों का शौकीन होता हैं। केतु हों तो भोजन के प्रति उदासीन होता हैं। यदि मिश्रित गुणों वाले ग्रह हो, तो उसी अनुसार उनके बलाबल के अनुपात में मिश्रित स्वाद वाला भोजन पसंद करना जातक का गुण होता हैं।

उपसंहार || Important Considerations

Uranus (अरुण/ प्रजापति – 13 मार्च 1781) Neptune (वरुण – 23 सितंबर 1946) और  Pluto (यम – 18 फरवरी 1930) ये तीन आधुनिक खोजें गये ग्रह हैं। इनका फलित ज्योतिष में प्रत्यक्ष विवरण किसी भी आर्ष ज्योतिष ग्रंथों में नहीं मिलता। पाश्चात्य ज्योतिषी और Neo Vedic Astrology में कुछ नये भारतीय ज्योतिषी भी इन ग्रहों का उपयोग फलित में कर रहे हैं। हालांकि यहांँ ध्यातव्य हैं कि— कुंडली के किसी भाव आधारित, राशि आधारित अथवा नक्षत्र आधारित फलों का कमोबेश वर्णन पाश्चात्य अथवा Neo Vedic ज्योतिषियों द्वारा इन ग्रहों के गुणों वा दोषों के आधार पर किया जा रहा हैं। 

इन्होंने Uranus (अरुण / इन्द्र / प्रजापति) को कुंभ (Aquarius ♒), Neptune (वरुण) को मीन (Pisces ♓) और Pluto (यम / रुद्र) को वृश्चिक (Scorpion ♏) राशि का सह-स्वामी (Co-ruler) भी माना हैं; किन्तु पारंपरिक ज्योतिष शास्त्र में इन ग्रहों को किसी भी नक्षत्र का स्वामित्व प्राप्त नहीं हैं; और  ग्रहों के अपने शुभाशुभ फल देने का समय उनकी दशा-अन्तर्दशा में शास्त्रकारों ने बताया हैं फलतः ग्रह दशा निर्णय में, इन ग्रहों की दशा का निर्धारण करना अभीतक संभव नहीं हो सका हैं। अपितु जो भी हों जन्मकुंडली में व गोचर में इनकी स्थिति जिन भावों में होती हैं, अपनी स्थिति अनुसार ये ग्रह भी उन भावों के फलों को प्रभावित करते हैं। ज्योतिषीय परिदृश्य में अभी इन ग्रहों पर और भी शोध की आवश्यकता हैं।

⭐ हिन्दू वैदिक साहित्य में इन्द्र और प्रजापति दो अलग शक्तियांँ किन्तु Greek Mythology में Uranus को आकाश के देवता होने से Neo Vedic Astrology में भारतीय ज्योतिषीगण ने इसे इन्द्र की संज्ञा दी हैं, चूंकि यह नवाचार, तकनीकी व सृजनात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता हैं, अतः इसे प्रजापति भी कहा हैं।

Note :- द्वितीय भाव में उपरोक्त स्थित ग्रहों के ये फल भाव स्थिति आधारित हैं व योगों की व्याख्या सीमित हैं। भावों में इनकी (इन ग्रहों की) उपस्थिति किन राशियों, नक्षत्रों, नक्षत्र चरणों व अंशों में हैं, इससे इन ग्रहों के फलों में व्यापक भिन्नता देखने को मिलती हैं। ठोस दृष्टि से भिन्न जातकों की कुंडली में उपस्थित ग्रहों के एक समान भावों में उपस्थिति दिखने पर भी, राशियों, नक्षत्रों, नक्षत्र चरणों व अंशों के अन्तर से ग्रह स्थितियांँ भिन्न-भिन्न हैं, इसी कारण से सृष्टि के प्रत्येक जीव की कुंडली, कर्म, प्रारब्ध भिन्न-भिन्न हैं। अतः व्यक्तिगत जन्मकुंडली विश्लेषण हेतु किसी प्रबुद्ध ज्योतिषी से मार्गदर्शन अनिवार्य हैं।

~Krishna Pandit Ojha..

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1• कुंडली के 12 भावों की अवधारणा, इतिहास और परिचय

2• लग्न अथवा कुंडली का प्रथम भाव

3• कुंडली का द्वितीय भाव वा धन भाव वा कुटुम्ब भाव

4• कुंडली का तृतीय भाव / सहज भाव / पराक्रम भाव 

5• कुंडली का चतुर्थ भाव / सुख भाव 

6• कुंडली का पञ्चम भाव / प्रेम भाव / विद्या भाव / पूर्वजन्म कृत कर्मफलों का भाव

7• कुंडली का षष्ठम भाव / रोग, ऋण, शत्रु भाव / नौकरी का सहायक भाव

8• कुंडली का सप्तम भाव / विवाह वा जीवनसाथी का भाव / व्यवसाय का सहायक भाव

9• कुंडली का अष्टम भाव / आयु, मृत्यु, जीवन रहस्यों का भाव / जीवन में अकस्मात् घटनाओं का भाव

10• कुंडली का नवम भाव / भाग्य भाव / मतांतर से पितृ भाव

11• कुंडली का दशम भाव / कर्म भाव / रोजगार, प्रतिष्ठा, सफलता का भाव

12• कुंडली का एकादश भाव / आय भाव / मित्र भाव

13• कुंडली का द्वादश भाव / सय्या सुख / हानि / व्यय / मोक्ष / मुक्ति / मृत्यु का मुख्य भाव

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