लग्न क्या हैं? अथवा कुण्डली का प्रथम भाव क्या हैं? || What is Ascendant (ASC) or What is First House in Astrology?
फलित ज्योतिष में ‘पूर्वी क्षितिज’ प्रथम भाव हैं। कुण्डली का प्रथम भाव—लग्न वा Ascendant (ASC) भी कहलाता हैं। इसके स्वामी को लग्नेश वा लग्नाधिपति कहा जाता हैं। अर्थात जातक ज्योतिष में—शिशु के जन्म काल में पूर्वी क्षितिज पर जो राशि जितने अंशादि पर उदित हो रही होती हैं, वह अंशादि शिशु/जातक का लग्न वा प्रथम भाव का शिरोबिंदु CUSP कहलाता हैं। यह केन्द्र, त्रिकोण, पूर्व दिशा, पीड़ा स्थान, चतुष्टय, कण्टक, पुरुष भाव, चर भाव, उदित केंद्र, विष्णु स्थान हैं। इसका रंग श्वेत हैं। इस भाव का नैसर्गिक कारक सूर्य हैं। ऐसा वृहत् पराशर होरा शास्त्र व अन्य शास्त्रज्ञों का मत्त हैं।

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इसमें (प्रथम भाव वा लग्न में) मिथुन, कन्या, तुला, धनु का पूर्वार्ध व कुंभ राशि पूर्ण बली होती हैं। अर्थात लग्न में इन राशियों को शास्त्रकारों ने 100 फीसदी बलवान माना हैं। मेष, वृषभ, कर्क, सिंह, धनु का उत्तरार्ध, मकर और मीन इसमें मध्यम बली होते हैं। अर्थात इनका बल यहां 50 फीसदी माना गया हैं। लग्न में वृश्चिक राशि का बल एक चौथाई ¼ शास्त्रकारों ने माना हैं। अर्थात वृश्चिक राशि लग्न में कमजोर मानी गई हैं। लग्न के बल का विचार करते समय लग्नेश के बलादि का विचार भी आवश्यक हैं।
चूंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूमती रहती हैं, और एक परिक्रमा 23 घंटे, 56 मिनट और 4.091 में पुरी करती हैं; इसी कारण समस्त आकाश पृथ्वी से पूर्वी क्षितिज पर उदित होती हुई दिखाई देती हैं। इस क्रम में सम्पूर्ण भचक्र (नक्षत्र मण्डल) 360° अंश अर्थात द्वादश राशि समुह क्रमश: एक के बाद एक पूर्वी क्षितिज पर उदित होती रहती हैं। इस प्रकार करीब 24 घंटे वा 60 घटी में समस्त द्वादश राशि समुह एक के बाद एक लग्न बनते रहते हैं; यही लग्न—कुंडली का ‘प्रथम भाव’ कहलाता हैं। अर्थात द्वादश राशि समुह हीं द्वादश लग्न हैं। जो 360° अंश के सम्पूर्ण भचक्र के 12 भागों में एक समान विभाजन हैं, इस तरह प्रत्येक राशि 360°÷12 = 30° अंश की होती हैं।
चूंकि प्रत्येक राशियां तो 30° अंश विस्तार क्षेत्र की हीं होती हैं किन्तु पृथ्वी का परिभ्रमण मार्ग पूर्ण वृताकार न होकर दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) हैं। पृथ्वी अपनी धुरी/अक्ष पर लगभग 23.5° अंश (23.44° अंश) वा 23°27′ झुकी हुई है; व इसका उत्तरी भाग सदैव ध्रुव तारे के ओर (उत्तर दिशा की ओर) झुका हुआ रहता हैं; जिसके कारण भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर लग्नों का उदय मान एक समान न होकर भिन्न-भिन्न हैं।
विभिन्न अक्षांशों पर लग्नों का भिन्न-भिन्न उदय मान || Different rising values of ascendants at different latitudes
शुन्य 0° आक्षांश पर अर्थात भूमध्य रेखा (Equator) पर लग्नों अर्थात राशियों के उदय मान में अत्यंत अल्प अंतर हैं। भूमध्य रेखा (Equator) से उत्तर की ओर बढ़ने पर शुरू की तीन राशियों व अंतिम तीन राशियों अर्थात मेष, वृषभ, मिथुन और मकर, कुंभ व मीन इन 6 राशियों (लग्नों) का उदय मान कम होता जाता हैं, और बाकी के 6 राशियों कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक व धनु (लग्नों) का उदय मान बढ़ता जाता हैं। भूमध्य रेखा (Equator) से दक्षिण की ओर बढ़ने पर इसके उलट मेष, वृषभ, मिथुन, मकर, कुंभ व मीन लग्नों का उदय मान बढ़ता हैं और कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक व धनु लग्नों का उदय मान कम होता जाता हैं।
भूमध्य रेखा (Equator) अर्थात विषुवत रेखा पर मेष, कन्या, तुला व मीन राशि का उदय मान 4 घटी 39 पल अर्थात 1 घंटा 51 मिनट 36 सेकेण्ड;
वृषभ, सिंह, वृश्चिक व कुंभ राशि का उदय मान 4 घटी 59 पल 10 विपल अर्थात 1 घंटा 59 मिनट 40 सेकेण्ड;
मिथुन, कर्क, धनु व मकर राशि का उदय मान 5 घटी 21 पल और 50 विपल अर्थात 2 घंटा 8 मिनट 44 सेकेण्ड हैं। चूंकि उत्तरी गोलार्ध से दक्षिणी गोलार्ध में राशियों का उदय मान विपरीत होगा, अतएव उत्तरी अक्षांश की लग्न सारणियों से दक्षिणी आक्षांश का लग्न स्पष्ट करने हेतु गणित की क्रिया विपरीत होगी।
लग्न के प्रकार|| Types of Ascendant
लग्न के दो रुप हैं—
1• स्थानीय लग्न : यह सभी ज्योतिष कार्य में सर्वमान्य, सबसे ज्यादा प्रचलित लग्न प्रकार हैं। इसमें भुक्त-भोग्यांश विधि, इष्ट व औदयिक सूर्य विधि (भारतीय पद्धति), साम्पातिक काल विधि (पाश्चात्य पद्धति) हैं। वर्तमान में साम्पातिक काल विधि सर्वाधिक प्रचलित है। दृक क्षेपादि, नक्षत्र आदि बिम्बोदयास्त, ग्रहण आदि के निश्चयार्थ स्थानीय लग्न का हीं उपयोग होता हैं।
2• बिंबीय लग्न : चूंकि 60° अक्षांश तक सभी राशियाँ क्रम से उदय होती हैं, लेकिन 63° अक्षांश से राशियों के कुछ भाग लग्न नहीं बनते। इसी तरह साम्पातिक काल जब 18 घंटे हो, तब 66° अंश 33′ कला पर 8 राशि 7° अंश से 2 राशि 7° अंश का लग्न होता हैं। इसके बाद के उत्तरी अक्षांशों पर लग्न एकदम से 6 राशि आगे बढ़ जाता हैं। कुछ अक्षांशों पर लग्न बनता हीं नहीं हैं।
इस प्रकार क्रांतिवृत का सम्पूर्ण प्रदेश सबके क्षितिज पर उदित नहीं होता। इस तरह क्रांतिवृत्तीय लग्न से द्वादश भावों की कल्पना असंभव हैं। इसका निराकरण बिंबीय लग्न से संभव हो जाता हैं। चूंकि भचक्र में द्वादश राशियों का उदय अहोरात्र (अर्थात एक दिन-रात में वा 24 घंटे वा 60 घटी) में हो जाता हैं। इसप्रकार एक राशि का उदय 5 घटी में होगा। अतः भाव लग्न 5 घटी और होरा लग्न 2.5 घटी का होगा। इसलिए जातक के इष्ट, घटी, पल को 6 गुणा करके, गुणनफल का राशि, अंश, कला, विकला बनाने के पश्चात, इसमें सूर्योदय के समय के स्पष्ट सूर्य का राशि, अंश, कला, विकला जोड़ने पर जो योगफल प्राप्त होगा, वह स्पष्ट लग्न होगा। यही बिंबीय लग्न है। इससे जातक के शुभाशुभ, ताजिक, यात्रा, विवाह आदि लौकिक कार्यादि का काल निर्धारण किया जाता हैं।
लग्न स्पष्ट करने की कुछ प्रमुख विधियाँ || Some Major Methods for Determining the Ascendant
इष्ट, औदयिक सूर्य विधि से लग्न स्पष्ट करने की विधि : इस विधि से लग्न निर्धारण के लिए जातक का जन्म तारीख, जन्म समय, जन्म स्थान का अक्षांश देशान्तर, स्थानिक सूर्योदय, औदयिक सूर्य व लग्न सारणी की आवश्यकता होती हैं। इसके लिए सबसे पहले इष्ट काल बनाया जाता हैं। उसके लिए स्थानिक सूर्योदय से जन्म समय तक के घंटा मिनट को घटी, पल में बदलते है, यह इष्ट घटी, पल होता है। तत्पश्चात औदयिक सूर्य का घटी पल, लग्न सारणी से लिया जाता हैं। अब इष्ट घटी पल में, औदयिक सूर्य के घटी पल को जोड़ने पर , योगफल का लग्न सारणी से प्राप्त राशि, अंश, कला, विकला आदि लग्न होता हैं। इसमें अयनांश संस्कार करने पर स्पष्ट लग्न प्राप्त होता हैं। यह भारतीय पद्धति हैं।
साम्पातिक काल (Sidereal Time) से लग्न साधन करने की विधि : साम्पातिक काल से लग्न स्पष्ट करना अपेक्षाकृत ज्याद सरल व शुद्ध हैं। इसके लिए जातक का जन्म तारीख, जन्म समय, जन्म स्थान का अक्षांश देशान्तर, साम्पातिक काल, साम्पातिक काल से साधित लग्न सारणी की आवश्यकता होती हैं। इसमें Standard Time (S.T) को Local Mean Time (L.M.T) में बदलकर उपयोग किया जाता हैं।
सूत्र :- संस्कारित साम्पातिक काल + स्पष्ट स्थानिक समय = विषुव काल RAMC (Right Ascension of the Midheaven)
[ यदि RAMC > 24, तो RAMC – 24 ]
इस विषुव काल से जातक के जन्म स्थान की साम्पातिक काल से साधित लग्न सारणी से लग्न स्पष्ट किया जाता हैं। इस लग्न स्पष्ट से अयनांश घटाने पर निरयण स्थानिक लग्न प्राप्त हो जाता हैं।
संस्कारित साम्पातिक काल = (साम्पात्तिक काल ± समय गति संस्कार ± देशान्तर संस्कार)
स्पष्ट स्थानिक समय = (प्रमाणिक समय ± समय संस्कार)
साम्पातिक काल (Sidereal Time) : यह समय नक्षत्रों की गति से संबंधित है। प्रत्येक नाक्षत्रिक दिन 23 घण्टा 56 मिनिट 4.091 सेकण्ड का होता है। इसकी गति 10 सेकण्ड प्रति घंटा या लगभग 4 मिनिट प्रति दिन (3 मिनिट 56.56636 सेकेण्ड) है। यह मेष संक्रान्ति या वसंत सम्पात पर शुन्य होता है। उसके बाद 4 मिनिट से अधिक या कम प्रतिदिन बढ़ता है। यह सूर्य काल या सावन दिन से 4 मिनिट कम होता है। मध्यान्ह काल का नाक्षत्र काल दशम भाव का विषुवांश है। प्रत्येक देशांन्तर पर ⅔ सेकण्ड या 0.66 पश्चिम के लिए जोड़ना और पूर्व के लिए घटाना पड़ता है।
मध्यम स्थानिक समय (L.M.T) : यह प्रमाणिक समय IST (Standard Time) से बनाया जाता हैं। प्रमाणिक समय के देशान्तर से, जातक के जन्म स्थान के देशान्तर को 4 मिनट प्रति (डिग्री) अंश पूर्व हो तो घटाने पर, पश्चिम हो तो जोड़ने पर, मध्यम स्थानिक समय (Local Mean Time) प्राप्त होता हैं।
जातक ज्योतिष में प्रथम भाव|| The First House in Natal Astrology
प्रथम भाव अथवा लग्न के अन्य नाम हैं— आत्मस्थान, प्रकृति स्थान, उदय, मूर्ति, होरा, कल्प, कल्य, देह, शरीर, शिर, तनु, जन्म, रुप आदि।
अरबी ज्योतिष में इसे अत-तालि या ताले (At-Tali), बैतुल अव्वल (Bayt al-Awwal), हयात (Hayat) व अव्वल खाने कहते हैं।
प्रथम भाव के लिए फारसी शब्द— खाना-ए-अव्वल (Khāna-ye Avval / خانه اول), तन (Tan / تن), मेख-ए-ग्यानान (Mex ī gyānān) व वतद (Watad / وتد) आदि हैं।
पाश्चात्य ज्योतिष जगत (Western Astrology) में इसे Ascendant , House of Self, The Helm अथवा Rising Sign कहा जाता हैं।
जातक की स्थिति लग्न अर्थात प्रथम भाव में हैं। लग्न अर्थात प्रथम भाव जातक का देह / शरीर हैं; तात्पर्य यह कि प्रथम भाव इह लोक में जातक का प्राकट्य हैं, अस्तित्व हैं। उत्तर कालामृत का कथन हैं कि—
देहश्चावयवः सुखासुखजरास्ते ज्ञानजन्मस्थले कोतिःस्वप्नवलायती नृपनयाख्यायूंषि शान्तिर्वयः । कैशाकृत्यभिमानजीवनपरद्यूताङ्कमानत्वचो निद्राज्ञानधनापहारनूतिरस्कारस्वभावारुजः ।।
अर्थात सामूहिक रूप से शरीर, शरीर के अवयव पृथक् पृथक् (लग्नस्थ राशि तथा उसके स्वामी द्वारा), सुख, दुःख, जरावस्था, ज्ञान, जन्म का स्थान, यश, स्वप्न, बल, गौरव, राज्य, नम्रता, आयु, शान्ति, वय, बाल आकृति (Appearance), अभिमान, जीवन वा जीवनी शक्ति, काम-धन्धा, दूसरों से जुआ, निशान, मान, त्वचा, नींद, ज्ञान, दूसरों का धन हर लेना वा महात्वाकांक्षा, दूसरों का अपमान करना, स्वभाव, आरोग्य, वैराग्य, कार्य का करण (Agency), पशु पालन, मर्यादा का सर्वनाश, वर्ण [ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण ( आधुनिक जाति व्यवस्था से भिन्न ) में जन्म ] तथा निज अपमान आदि बातें प्रथम भाव / लग्न से विचारनी चाहिए। इन बातों का कारक प्रथम भाव हैं।
यहाँ सामुहिक रूप से शरीर व शरीर के पृथक-पृथक अवयवों का तात्पर्य यह हैं कि जो अंग शरीर पर व्यापक रुप से जातक को व्यक्त करे, वो अंग भी प्रथम भाव के प्रतिनिधित्व क्षेत्र में आ जाता हैं; यथा धातु, चर्म ( रंग आदि )। इसी प्रकार यदि कोई ग्रह लग्नेश वा लग्नाधिपति बनता हैं, तब उसके विभिन्न कारकत्वों में से उस कारकत्व की विशेष प्रधानता होती हैं, जिस कारकत्व का शरीर पर व्यापक रुप से प्रभाव होता हों। यथा—
यदि किसी व्यक्ति का सिंह लग्न हो तो उसका स्वामी सूर्य चूंकि आँख, हृदय, हड्डी आदि सबका प्रतिनिधि है फ़िर भी जब हम सामूहिक शरीर का विचार करेंगे तो लग्नेश सूर्य को आँख तथा हृदय की अपेक्षा हड्डी का प्रतिनिधि विशेष मानेंगे; क्योंकि वह आँख तथा हृदय की अपेक्षा शरीर में अधिक व्यापक है। इसी प्रकार कर्क लग्न का स्वामी चन्द्र चूंकि मन, छाती तथा रक्त प्रवाह सभी का प्रतिनिधि है, फ़िर भी सामूहिक शरीर में चन्द्र ‘रक्त प्रवाह’ का अधिक प्रतिनिधित्व करेगा, क्योंकि रक्त शरीर में मन तथा छाती की अपेक्षा अधिक व्यापक क्षेत्र में कार्य करता है। इसी प्रकार लग्नेश मङ्गल से मांसपेशियों का, लग्नेश बुध से चर्म ( चमड़ी ) का, लग्नेश बृहस्पति से उदर (पेट) का, लग्नेश शुक्र से वीर्य व रज का वा जननांग का, लग्नेश शनि से नसों वा तंत्रिका तंत्र को सामुहिक शरीर के अर्थ में लिया जाना चाहिए।
यहां विशेष ध्यातव्य हैं कि— लग्न व दशम भाव दोनों से हीं जातक के कीर्ति – अपकीर्ति, यश – अपयश का विषय विचारणीय हैं। यहां शंकित नहीं होना चाहिए। चूंकि किसी भी कीर्ति-अपकीर्ति अथवा यश-अपयश हेतु, व्यक्ति के नाम का होना आवश्यक हैं; और लग्न वा प्रथम भाव जातक स्वयं हीं तो हैं, जातक का प्राकट्य, अस्तित्व अथवा पहचान—लग्न हीं तो हैं। अतः जातक के पद-प्रतिष्ठा वा प्रसिद्धि आदि का विचार दशम से पूर्व लग्न से विचारणीय हैं।
भाव मञ्जरी आचार्य मुकुन्द दैवज्ञ का कथन हैं कि—
देहांकजात्याकृतिदेहमानप्रवाससामर्थ्यबलाबलानि । सुखासुखे कं प्रकृतिर्जनन्यास्तातो वयोमानजनिस्थलाख्ये ॥१॥ ताताम्बिका वर्णगुणस्वभावनिद्राभिमानावयवत्वचश्च । स्वप्नायती राजनयश्च शीलमेताद्विलग्ने निखिलं विचिन्त्यम् ॥२॥ ~ [अ. 2]
अर्थात लग्न कुण्डली के प्रथम भाव से शरीर पर पाए जाने वाले चिन्ह, कुल जाति, आकृति वा कद-काठी, देह अर्थात समस्त शरीर व रंग-रूप, पद-प्रतिष्ठा, विदेश में निवास, शक्ति, पराक्रम, कमजोरी, सुख, दुःख, सिर, प्रकृति (स्वभाव), नाना, बचपन, जवानी आदि अवस्थाएं, आयु, जन्म भूमि, दादी, शरीर का वर्ण, त्याग, शूरता आदि गुण, स्वभाव, नींद, अहंकार, शरीरांग, खाल वा चमड़ी, सपनों का फलाफल अथवा सुख शयन, बुढ़ापा, राजनीति तथा चरित्र आदि का विचार किया जाता हैं। आशय यह है कि प्रथम स्थान इन सबका कारक है।
इसके अतिरिक्त इससे जिज्ञासा, चरित्र, योग्यता, भव्यता, तेज, न्याय, नीति, पाप-पुण्य, मान-अपमान, लाभ-हानि, बुद्धि, कौशल, साहस, पूर्व जन्मों के कर्म, शान्ति, उद्देश्य वा अभियान, आयु, उद्योग, आवास-प्रवास, संतान का भाग्य व भाग्योदय, संतान का परदेश गमन, सहोदर के मैत्री संबंध, सहोदरों को होने वाले लाभ-हानि, नाना, मामा की क्षति, शत्रुओं पर विजय, गुरु भाई, मातृभाषा, प्रबंधन की क्षमता शरीरशास्त्र (Anatomy), मनोविज्ञान (Psychology), आयुर्वेद और स्वास्थ्य (Health & Vitality), सामाजिक शास्त्र और प्रतिष्ठा (Social Standing & Fame), नीति शास्त्र और धर्म (Dharma & Ethics), प्रारंभिक वातावरण (Early Childhood), त्वचाशास्त्र (Dermatology), Equity Law आदि विषय प्रथम भाव से विचारणीय हैं।
मेदिनी ज्योतिष में प्रथम भाव|| First House in Mundane Astrology
मेदिनी ज्योतिष में किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत कुंडली के बजाय, किसी राष्ट्र, क्षेत्र, किसी प्रशासन द्वारा शासित छोटे-बड़े प्रदेश, मौसम, वर्षा, भूकम्प, बाढ़, उत्पात, महामारी, वैश्विक व्यवसाय, युद्ध, विदेश नीति, आर्थिक उतार-चढ़ाव आदि का विचार किया जाता हैं।
इसमें उक्त राष्ट्र अथवा किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र, में उपरोक्त वर्णित विषयों का विचार व भविष्य से जुड़ी घटनाओं का व्यापक अध्ययन व भविष्यवाणियां निहित हैं।
इस विद्या (मेदिनी ज्योतिष Mundane Astrology) के द्वारा भविष्यवाणी करने के कुछ विशेष आधार हैं; यथा
1• काल पुरुष कुंडली द्वारा ग्रह गोचर को आधार बनाकर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में भविष्यवाणी करना,
2• किसी राष्ट्र/देश के के गठन के पाक समय जैसे कि भारत के परिदृश्य में 15 अगस्त 1947 को आधार मानकर कुंडली निर्माण करके उस देश के बारे में भविष्यवाणी करना,
3• विशिष्ट खगोलीय घटनाएं जैसे कि ग्रहण (ग्रहण काल), धूमकेतुओं के उदय, नक्षत्र भेदन आदि को आधार मानकर पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में भविष्यवाणी करना आदि।
मेदिनी ज्योतिष में प्रथम भाव किसी क्षेत्र का शासक, प्रशासक (Administrators), सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority), राजदूत (Ambassadors), प्रवर्तक (Pioneers), खोजकर्ता (Explorers), स्व-नियोजित पेशेवर (Self-employed Professionals), सैन्य कमांडर (Military Commanders), पुलिस प्रमुख (Police Chiefs), मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEOs), निरीक्षक (Inspectors), पैनल सदस्य (Panel Members) आदि का प्रतिनिधि हैं।
मूलतः इस भाव का अधिकारक्षेत्र उन सभी पदों तक विस्तृत है जहाँ व्यक्तिगत पहचान, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और दूसरे पर प्रभाव डालना अनिवार्य होता है।
इसके अतिरिक्त मेदिनी ज्योतिष ( Mundane Astrology) में कुंडली का प्रथम भाव—
राष्ट्र की जनता, उनके सामान्य जनजीवन, स्वास्थ्य, नीति-नियम, मानसिकता, राष्ट्र की शक्ति विस्तार, सार्वजनिक कल्याण-अकल्याण, राष्ट्र की वैश्विक छवि और दुनिया के समक्ष उसका स्वरूप आदि, देश के राजा, राजनीति, मंत्रीमंडल, देश का पक्ष-विपक्ष, उक्त देश का व्यापारिक सामर्थ्य आदि का प्रतिनिधि भी हैं।
प्रश्न ज्योतिष में प्रथम भाव|| First House in Horary Astrology
जातक ज्योतिष (फलित ज्योतिष) में जब जातक का जन्म समय ज्ञात न हो, अथवा विभिन्न जटिल जिज्ञासाओं यथा चुनाव में जीत-हार, मुकदमा में जय-पराजय, किसी बिछड़े से मिलने की संभावना-असंभावना (जिसमें जातक के जिज्ञासा का धरातल स्वयं से सीधे न जुड़कर, अन्य किसी से जुड़ता हैं; अथवा जातक का अभीष्ट अन्य किसी समाज, व्यक्ति अथवा बाहरी विशेष परिस्थितियों में पुरी होती हैं।) आदि के निराकरण हेतु जातक के प्रश्न पूछने के समय व स्थान को आधार मानकर कुंडली बना ली जाती हैं, और उस कुंडली में उपस्थित ग्रहों, जातक के प्रश्नों से संबद्ध भावों आदि का विचार करके, उक्त प्रश्नों का उत्तर दिया जाता हैं। ज्योतिष की यह विद्या ‘प्रश्न कुंडली’ अथवा प्रश्न ज्योतिष कहलाता हैं।
प्रश्न कुंडली में प्रश्नों सिद्धि अथवा असिद्धि के लिए प्रश्न से संबंधित भाव और उस कार्य से संबंधित कार्येश जिम्मेदार होते हैं। इनका शुभ और बली अवस्था में होना कार्य की सिद्धि दर्शाता हैं। इनका क्षीण, निर्बल और पाप प्रभाव में होना कार्य की निष्फलता प्रदर्शित करता हैं।
प्रश्न कुंडली में प्रथम भाव— प्रश्नकर्ता की अवस्था, स्वास्थ्य, प्रयोजन, प्रश्न की प्रासंगिकता, प्रश्नकर्ता के उद्देश्यों का बल, प्रश्न की सिद्धि-असिद्धि, निजता और धारण करने की क्षमता को निर्देशित करता हैं। स्वयं के लाभ से सीधे संबंधित प्रश्नों का कार्येश— प्रश्न कुंडली का प्रथम भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश होता हैं।
प्रश्न कुंडली के प्रथम भाव (लग्न) में उपस्थित बली शुभग्रह व कुंडली में उपस्थित बलवान लग्नेश कार्य की शुभता और सरलता से पूर्णता की पुष्टि करते हैं। व विभिन्न ग्रह अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि के निमित्त किये गये उपक्रमों की प्रकृति की सूचना देते हैं।
प्रथम भाव में स्थित विभिन्न ग्रहों के फल|| Effects of various planets situated in the first house
प्रथम भाव (लग्न) में सूर्य का फल || Sun in the First House
लग्न में सूर्य हो तो जातक रजोगुणी, स्वाभिमानी, क्रोधी, वात-पित्त पीड़ित, जिद्दी, प्रवास में स्व उद्यम से सफलता पाने वाला, मध्यम कद-काठी का शरीर वाला, लम्बी ऊंची नाक वाला, मान-प्रतिष्ठा का भूखा, विशाल ललाट वाला, काम केशों वाला, युद्ध कला में निपुण, बहादुर, खर्चीला होने से अस्थिर संपत्ति वाला अथवा धन-संपत्ति में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने वाला, रक्त वर्णी अर्थात रक्तिम शरीर वाला, उच्च आदर्शों वाला, सीमित उच्च कोटि के व्यक्ति व वस्तुओं को पसंद करने वाला, जिसके कारण जीवनसाथी के चुनाव में भी अधिक समय व्यतीत करने वाला, कम लोगों से मिलनसार, तेज गति को पसंद करने वाला, अच्छी नेतृत्व क्षमता से युक्त, समाज व अपने क्षेत्र पर विशेष प्रभाव रखने वाला होता हैं।
प्रथम भाव का सूर्य यदि कुंडली में बलवान स्थिति में हो, तो जातक उच्च राजनयिक पदों पर प्रतिष्ठित, शासन में उच्चाधिकारी, ग्राम समाज का प्रधान, अच्छा व्यवसाय कुशल, मित्र ग्रहों से संबंधित होने पर अपने प्रभुत्व से धरती को भोगने वाला होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य यदि शत्रु अथवा राहु, शनि आदि पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो नेत्र रोग, दृष्टि दोष, हृदय संबंधी रोग, हृदयाघात, हड्डियों व मांसपेशियों में दर्द, आत्मबल की कमी, सिरदर्द, प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना आदि कष्ट देता हैं। इसके अतिरिक्त जातक में नेतृत्व क्षमता की कमी, निर्णय लेने में परेशानी, पिता व अभिभावकों से वैचारिक मतभेद, नौकरी व व्यवसाय में रुकावट, सरकार वा सरकारी अधिकारियों से पीड़ा, मानहानि, झूठे आरोप आदि का सामना जातक को करनी पड़ती हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में चन्द्रमा का फल || Moon in the First House
लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक सुकोमल, बलिष्ठ, ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसाय करने में चतुर, गीत-संगीत का प्रेमी वा कला प्रेमी, रतिक्रिया में निपुण, थुलथुले मांसल शरीर वाला, अपने परिवार में सबका विशेष दुलारा, तुनकमिजाज, कफ से पीड़ित, कभी अकारण अत्यधिक खुश और कभी अकारण अत्यधिक दुःखी महसूस करने वाला, अच्छी कल्पनाशीलता के गुणों से युक्त, सौन्दर्य प्रेमी, जलयात्रा का शौकीन, प्रेम करने में निपुण, चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाला, घुंघराले बालों वाला, सौम्य प्रकृति का होता हैं।
प्रथम भाव में चन्द्रमा यदि शुभ प्रभावों से युक्त व मित्र ग्रहों से पुष्ट हो तो जातक अत्यधिक सृजनात्मक, प्रसन्नचित्त, व्यापार व्यवसाय में सम्मानजनक सफलता प्राप्त करने वाला, सबका हितैषी, सबका प्रिय, बहुत सारे मित्रों वाला, अतुलित धन बल वाला, विद्वान, सर्वत्र विजयी, अद्भुत सम्मोहन शक्ति वाला, नेत्रों में विशेष चमक से सबका ध्यान अपनी तरफ़ आकृष्ट करने वाला, दीर्घकाल तक पृथ्वी को भोगकर, मृत्यु के पश्चात भी जनसमुदाय में प्रासंगिक और सबका सम्मान पाता हैं।
चूंकि चन्द्रमा मन का नैसर्गिक कारक है अतः प्रथम भाव का चन्द्रमा यदि पाप प्रभाव में अथवा पीड़ित अवस्था में हो तो, जातक अनजाने भय से ग्रस्त, डरावनी कल्पनाओं में डूबा हुआ, विभिन्न मानसिक विकृतियों का शिकार होता हैं। ऐसी स्थिति में डिप्रेशन, घबराहट (anxiety), मन का बार-बार भटकना, मूड स्विंग्स (Mood Swings), नींद न आना (Insomnia), सर्दी-खांसी की समस्या, फेफड़ों से जुड़ी बीमारियाँ, और हार्मोनल असंतुलन, धन संचय (Savings) करने में असमर्थता, भीड़ में भी अकेलापन महसूस करना और आत्मविश्वास की भारी कमी से जातक दुःखी होता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में मंगल ग्रह का फल || Mars in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में मंगल स्थित हो तो, जातक उग्र, क्रूर, साहसी, कामवासना की अधिकता वाला, जल्दीबाज़, भड़कीला, कठोर वचन बोलने वाला अथवा गाली-गलौच करने वाला, युद्ध कला में निपुण, सशक्त, रक्तचाप का रोगी, कलहप्रिय, भाग-दौड़ खेलकूद का शौकिन, अहंकार से भरा हुआ, चंचल, संघर्षशील, परिश्रमी होता हैं। प्रथम भाव में मंगल शत्रु राशि का हो तो, जातक चपल, विचार रहित, कभी-कभी दुस्साहसी होते हुए भी देखा जा सकता है। अंग-प्रत्यंग पर चोट के निशान, सिरदर्द, रक्त संबंधी मूल समस्याओं से संवेदनशील त्वचा व बालों के रोग से ग्रसित प्रथम भाव में अशुभ मंगल के प्रभाव हैं।
चूंकि प्रथम भाव का मंगल— कुंडली में मंगल दोष का भी निर्माण करता हैं, अतः यहाँ स्थित दोषयुक्त पीड़ित मंगल वैवाहिक जीवन में सामंजस्य की कमी, जिद्दी व्यवहार और वैवाहिक जीवन में कड़वाहट देने में सक्षम हैं।
लग्न में शुभ बली मित्रों से समर्थित मंगल जातक को सेना, पुलिस तंत्र, प्रॉपर्टी आदि की ख़रीद फरोख्त से धनलाभ देता हैं। विश्वस्तरीय एथलीट, खिलाड़ी, सुरक्षा कम्पनियों के मालिकों, प्रॉपर्टी डीलर्स, सम्मानित किसान, किसान नेता, भूगर्भवेत्ता, रत्नों के व्यापारी आदि की कुंडली में मंगल का प्रथम भाव में शुभ स्थिति में देखा जा सकता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में बुध ग्रह का फल|| Mercury in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में बुध दिग्बल को प्राप्त करता हैं, अतः यहाँ बलवान बुध जातक के व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देता हैं। जातक दीर्घायु, व्यवहारिक आस्तिक, गणित व तर्क में निपुण, हँसी-मज़ाक करने का शौकीन, रतिक्रिया में निपुण, विनोदी स्वभाव वाला, रोमांटिक, उदारवादी, चतुर, चंचल, विभिन्न विषयों का विद्वान, विपरीत लिंगीयों (यदि पुरुष हैं तो स्त्रियों का/ स्त्री हैं तो पुरुषों का) का स्नेह पात्र, अत्यधिक खर्चीला, सुन्दर वस्त्र-आभूषणों का शौकीन, सुन्दर डील-डौल वाले शरीर वाला, विशेष कोमल और आकर्षक चमड़ी वाला, औषधि आदि चिकित्सा संबंधी विषयों में रुचि रखने वाला, स्वाद लोलुप अर्थात भांति-भांति के खाद्य पदार्थों को चखने वाला, जरुरतमंदों को दान-धर्म करने वाला, कुशाग्र कुटिल बुद्धिमत्ता वाला, लेखन का शौकीन, कलाप्रेमी, व्यवसायिक ज्ञान में निपुण, अर्थशास्त्र, लेखाशास्त्र, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, गेमिंग, शेयर बाजार, बाजार व निवेश, संपादक, लेखक, एडिटर, ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, सद्गुणी होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में बुध यदि अपनी अवस्था अथवा पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो, उतावलापन से युक्त, कट्टरपंथी, चिड़चिड़ा स्वभाव देता हैं। जातक अनर्गल प्रलाप करने वाला, संवेदनशील मुद्दों पर भी निर्दयता पूर्वक हँसने वाला, चर्मरोग व तंत्रिका तंत्र से संबंधित रोग, बोलने में हकलाहट, तुतलाना या स्पष्ट रूप से अपनी बात न कह पाना, याददाश्त कमजोर होना, निर्णय लेने में दुविधा (Confusion) और गणित जैसे गणनात्मक विषयों में कठिनाई, एलर्जी, खुजली, दानों की समस्या या समय से पहले चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, व्यापार में बार-बार घाटा होना, कार्यस्थल पर गलतफहमियां पैदा होना व एकाग्रता की कमी आदि समस्याओं को जन्म देता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में गुरु ग्रह का फल || Jupiter in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में गुरु (बृहस्पति) भी दिग्बली होता हैं; अतः प्रथम भाव में गुरु जातक के विशेष ज्ञान और आध्यात्मिक बल की वृद्धि करता हैं। कुंडली के प्रथम भाव में शुभ प्रभाव से युक्त बलवान गुरु/ बृहस्पति हों तो, जातक धर्मात्मा, विद्वान, ज्योतिषी होता हैं। ऐसा जातक देवगुरु बृहस्पति के प्रभाव से दीर्घायु, अपने कार्य में दक्ष/प्रवीण, अपना प्रभाव सर्वत्र छोड़ने वाला तेजस्वी, स्पष्ट भाषण करने वाला, स्वाभिमान से युक्त, कभी-कभी अभिमानी दिखाई पड़ने वाला, सुन्दर कोमल अंगों वाला, विनयशील, दान कर्म करने का इच्छुक, धनवान, पुत्र-पौत्र आदि संततिवान, राजमान्य अर्थात सरकार से समादर पाने वाला, शिक्षित, सभ्य, व्यवहार कुशल, प्राचीन व गुढ़ ज्ञान के प्रति रुचिवान, विभिन्न तीर्थ यात्राओं को करने का इच्छुक, तर्कशक्ति से अपना प्रभाव जमाने में निपुण, मर्यादित अथवा रुढ़िवादी प्रेम करने वाला, विभिन्न भाषाओं में रुचि रखने वाला, पत्नी, मित्र व साझेदारों को सदैव उचित सलाह देने वाला, क्रोध में भी मर्यादित शब्दों का प्रयोग करने वाला, धैर्यवान होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में गुरु/बृहस्पति यदि स्व नक्षत्र, मित्र नक्षत्र, मित्र दृष्टि से पुष्ट हो तो जातक उच्च कोटि का शिक्षक, प्रोफेसर, शिक्षाविद्, किसी शैक्षणिक संस्थान का प्रमुख, धर्मगुरु, धर्मग्रंथों का रचयिता, दार्शनिक, कुंडली में संन्यास आदि योग होने पर किसी मठ आदि का मठाधीश, विशाल जनसमूह को अपने वक्तव्यों से वशीभूत करने वाला कथावाचक, सलाहकार, मार्गदर्शन, प्रतिनिधिमंडल का सदस्य, नेता, साहित्य प्रेमी होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में अपनी अवस्था वश पीड़ित अथवा पाप ग्रहों से पीड़ित होने पर जातक को पेट, लीवर, किडनी आदि से संबंधित रोग, मोटापा, अस्थमा, कमजोर पाचन तंत्र, तपेदिक, अतिसार, गंभीर चर्मरोग, कैंसर, पीलिया, मधुमेह (diabetes) जैसी गंभीर बिमारियां देता हैं। इसके साथ-साथ हीं समाज में मानहानि, बड़ों के सहयोग में बांधा, विवाह में विलंब, वैवाहिक सुख में कमी, संतानहीनता अथवा संतान सुख का अभाव, शिक्षा में व्यवधान व नौकरी व्यवसाय आदि में अस्थिरता से जातक को पीड़ित करता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में भृगु / शुक्र का फल || Venus in the first house
कुंडली के प्रथम भाव में शुक्र यदि शुभ व बलवान हो तो जातक को अत्यंत सुंदर, आकर्षक, ऐश्वर्यवान, सुखी, मधुर बोलने वाला, घुंघराले चमकीले केशों वाला, प्रवास में भी अपनी जगह आसानी से बनाने की कला में माहिर, प्राचीन व आधुनिक दोनों प्रकार के ज्ञान में निपुण, प्रखर विद्वान, भोग-विलास में रुचिवान, कामक्रीड़ा में निपुण, विभिन्न आसनों में कामक्रीड़ा करने का शौकीन, राज प्रिय वा उच्च कोटि के अधिकारियों व समृद्ध जनों का प्रिय, विपरीत लिंगीयों का प्रिय प्रेमपात्र, कला, संगीत, नृत्य, काव्य वा अभिनय में गहरी रुचि रखने वाला, ऐसे जातक का सौंदर्यबोध (Aesthetic sense) बहुत ऊंचा होता है।
कुंडली के प्रथम भाव में शुक्र यदि मित्र ग्रहों से पुष्ट व स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो, यह विशेष बलवान होकर जातक को उसकी विशेष आकर्षण क्षमता व योग्यता का लाभ उसके व्यवसायिक जीवन में देने लगता हैं। ऐसा जातक फैशन, मीडिया, कॉस्मेटिक्स, आभूषण या लग्जरी आइटम्स के व्यापार में बहुत सफलता प्राप्त करते हैं। जातक का वैवाहिक जीवन रसपूर्ण, माधुर्य से युक्त अत्यंत सुखद होता है। जीवन में विभिन्न रत्नादि आभूषणों से युक्त ऐसे जातक लग्जरी जीवन जीते हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में शुक्र यदि पीड़ित अवस्था में हो तो धनहानि, अनावश्यक कर्ज, सुख-सुविधाओं का अभाव, जीवनसाथी के साथ मतभेद, प्रेम-संबंधों में असफलता, अनावश्यक विवाद, धोखा, ठगी आदि पीड़ा देता हैं। इसके साथ-साथ हीं जातक को मधुमेह (diabetes), गुप्त रोग, जननांग से संबंधित रोग, नेत्रों में दोष, चमड़ी से संबंधित बिमारियां, बालों का झड़ना, रोग-प्रतिरोधक क्षमताओं का कम होना, चेहरे पर कोई दाग़ या दोष होना जो सामान्यतः लोगों का ध्यान उस तरफ़ खींचे, प्रजनन क्षमता का कम होना आदि व्याधियाँ जातक को पीड़ित करती हैं।
प्रथम भाव में शनि का फल || Saturn in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में शनि यदि स्वराशि का हो अथवा मतांतर से स्व नक्षत्र का हो तो स्वाल्प मात्रा में कीर्ति, जीवटता, परिश्रमी, पराक्रम, दीर्घायुष्य, न्यायप्रियता, परिपक्वता (Maturity) आदि गुण देता हैं, किन्तु बहुधा अवगुण भी देता हैं; यथा जातक में परस्त्रीगमन, क्रूरता, ईर्ष्या, दीर्घसूत्रता अर्थात किसी भी कार्य को विलंब से अथवा धीरे-धीरे करने की आदत, पराक्रम में ह्रास, छोटे भाई-बहनों को कष्ट वा उनसे अनबन, विवाह में विलम्ब, शुष्क व्यवहार के कारण नीरस वैवाहिक जीवन, एकाकीपन आदि दुर्गुण भी प्रथम भाव का शनि देता हैं।
किन्तु यही शनि यदि प्रथम भाव में शुभ ग्रहों, मित्र ग्रहों व शुभ रश्मियों से युक्त हो तो, जातक कृशकाय किन्तु स्वस्थ चिमर शरीरी, आकर्षक, आलस्य से युक्त किन्तु सफल, दीर्घकाल तक कीर्तिमान स्थापित करने वाला, व्यवस्थित, विशेष धैर्यवान, दूरद्रष्टा, अपने परिवार व समाज के प्रति सशक्त, जिम्मेदार, कारीगर, शिल्पी, मुर्तिकार, अनुभवी, समाजसेवी, मशीन आदि औजारों का ज्ञान-विज्ञान समझने वाला, इंजीनियरिंग, कानून, न्यायशास्त्र आदि का जानकार, विवाह और वैवाहिक जीवन का सहज निर्वहन करने वाला, शनै शनै धनवान/ प्रगतिशील होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में शनि यदि पाप अथवा शत्रु ग्रह से पीड़ित हों तो जातक को दीर्घकालिक बिमारी (Chronic disease), पक्षघात (paralysis), हड्डियों में कमजोरी, जोड़ों का दर्द, गठिया (arthritis), नसों से संबंधित दीर्घकालिक रोग, कुष्ठ रोगी, कान से मवाद आना, पार्किंसन (Parkinson’s), दांतों की समस्या, सुनने में कठिनाई, समय से पहले बुढ़ापा व वात से संबंधित रोग होता हैं। कभी-कभी जातक भूत-प्रेत आदि ऊपरी बाधा, भ्रम (Hallucination) स्नायु तंत्र (Nervous system) से संबंधित रोगों का शिकार हो जाता हैं। इसके अतिरिक्त अति परिश्रम के बाद भी असफलता, कार्यों में अनावश्यक विलम्ब, मानसिक संताप, नौकरी-व्यवसाय में लगातार असफलता पाप प्रभावित शनि के प्रथम भाव में फल हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में राहु का फल || Rahu in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में राहु हो तो, जातक अति महात्वाकांक्षी, लोभी, छल-कपट करने में माहिर, दुष्ट प्रवृत्ति वाला, मस्तक संबंधी व्याधियों से पीड़ित, स्वार्थी, स्वजनों से द्वेष करने वाला, नीच कर्म करने की ओर प्रेरित, दुर्बल, अति कामुक, अप्राकृतिक मैथुन प्रिय, अल्प संततिवान, अवसरवादी, कुटिल, म्लेच्छों के प्रति रुचिवान होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में राहु यदि स्व नक्षत्र युक्त अथवा मित्र दृष्टि से पुष्ट हो अथवा वृषभ, मिथुन वा कन्या राशि स्थित हो तो, जातक सफल राजनीतिज्ञ, रुढ़िवादी परंपराओं को ध्वस्त करके नई व्यवस्थाओं का जनक, नवयुग का प्रवर्तक, विदेशी संस्कृति व सभ्यता के तारतम्यता से जीवन जीने वाला, प्रखर बुद्धि, विदेश यात्राओं व विदेशी निवेश से धनार्जन करने वाला, चतुर, अपने संभाषण से जबरदस्त जनादेश प्राप्त करने वाला, विजयी और अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करने वाला होता हैं। ऐसा जातक नई टेक्नोलॉजी यथा AI सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा, सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर, ई- कॉमर्स व ऑनलाइन व्यवसाय, जनसंपर्क (PR Team), अभिनय (Acting), सिनेमेटोग्राफी या निर्देशन, विज्ञापन (Advertising), आयात-निर्यात (Import-Export), ट्रैवल और टूरिज्म, फार्मास्युटिकल, विष विज्ञान (Toxicology), मनोविज्ञान (Psychology), ज्योतिष (Astrology), जासूसी (Investigation) आदि क्षेत्रों में विशेष दिलचस्पी रखने वाला व सफलता प्राप्त करने वाला होता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में राहु यदि असहज अथवा पीड़ित हो तो जातक को मतिभ्रम (Confusion), अत्यधिक क्रोध और चिड़चिड़ापन, झूठ बोलने की प्रवृत्ति, अकारण भय (Phobia), सिर और मस्तिष्क के रोग, बार-बार सिरदर्द, माइग्रेन, याददाश्त में कमी, रहस्यमयी बीमारियाँ यथा ऐसी बीमारियाँ जिनका डॉक्टर पता नहीं लगा पाते (Diagnostic failure), नशे की लत, अनिद्रा (Insomnia), गलत संगति, विवाहेत्तर संबंधों से वैवाहिक जीवन में तनाव, भ्रम व लालच में लिए गये निर्णय से करियर के चुनाव में गलतियांँ व धन की अकस्मात हानि— राहु जातक को देता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में केतु का फल || Ketu in the First House
कुंडली के प्रथम भाव में केतु हो तो, जातक उद्विग्न, जिद्दी, निरर्थक वाद-विवाद करने वाला, अतार्किक, मुर्ख, चपल, जुझारू, बलिष्ठ, आध्यात्मिक, रहस्यमय, मनमौजी होता हैं। जातक बहुधा गंभीर प्रवृत्ति, अप्रमाणिक को भी प्रमाणिक मानने वाला, ज्यादा सोच-विचार न करने वाला, आसानी से किसी के भी बातों में आ जाने वाला होता हैं। लग्न का केतु जातक को अंधभक्त बनाता हैं। ऐसा जातक कभी निराशावादी तो कभी कही-सुनी बातों पर विश्वास करके अत्यंत आक्रामक आशावादी व्यवहार प्रदर्शित करता हैं।
कुंडली के प्रथम भाव का केतु यदि वृश्चिक अथवा धनु राशि का हो तो थोड़े शुभ फल भी देता हैं। शुभ व बलवान कारक ग्रहों से प्रेरित होकर लग्न अर्थात प्रथम भाव का केतु जातक को आत्म विश्लेषण करने वाला, रहस्यमयी भाव-भंगिमा वाला, तंत्र-मंत्र जादू-टोने में निपुण, पराविद्या में रुचि रखने वाला, सृष्टि चक्र का मर्मज्ञ, विचित्र बुद्धि वाला, वैरागी, मोक्ष, धर्म, आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रबल तर्क रखने वाला, योग, आसन, प्राणायाम, सूक्ष्म जगत का अनुभव करने वाला, आश्चर्यजनक स्मरण शक्ति वाला (कभी-कभी पूर्व जन्म से जुड़ी चीजें भी याद रह जाती हैं।), विभिन्न Conspiracy Theories में विश्वासी, रहस्यमय मुस्कान वाला, दार्शनिक बुद्धि देता हैं।
प्रथम भाव का केतु पीड़ित अथवा पाप प्रभाव में हो तो जातक को असाध्य बिमारियांँ, पेट में कीड़े, उल्टी, जी मिचलाना, श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग़), बवासीर, भगंदर, दाद-खाज खुजली, गठिया, सायटिका, फोड़े-फुंसी, नस से संबंधित रोग, रहस्यमयी बीमारियाँ (Undiagnosed Illness), मस्तिष्क और तंत्रिका शिकार, माइग्रेन, नसों में खिंचाव, मिर्गी के दौरे (Epilepsy), भ्रम (Hallucinations), कोई परछाईं दिखना, सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia), दूर की आवाज़ सुनाई देना, वास्तविकता से कटाव (Loss of Reality), स्वयं से बात करना (Self-Talking), व्यक्तित्व का विखंडन (Identity Crisis), रक्त संक्रमण (इन्फेक्शन), आग से दुर्घटना, चोट, सर्जरी, कुपोषण, सिर पर आघात आदि पीड़ाएं देता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में Uranus (अरुण) का फल || Uranus in the First House
प्राचीन पारंपरिक भारतीय ज्योतिष में Uranus (अरुण ग्रह) का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता है, क्योंकि इसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता; 13 मार्च 1781 को अंग्रेज खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल (William Herschel) ने इसे पहली बार अपने दूरबीन की सहायता से देखा; आधुनिक भारतीय ज्योतिष में इसे हर्शेल/हर्षल, प्रजापति अथवा अरुण ग्रह कहा हैं।
एक प्राचीन ग्रीक देवता Ouranos जो आकाश के देवता माने जाते हैं उनके नाम पर इस ग्रह का नाम पश्चिमी ज्योतिषियों ने Uranus रखा।
कुंडली के प्रथम भाव में यूरेनस जातक को अति स्वच्छंद, आजाद विचारधारा वाला, अति आधुनिक, नवाचारी (Innovative), तकनीकी शिक्षा में रुचिकर, अत्यंत भड़कीला, ज्ञानी, निष्पक्ष विचारों वाला, सरलतम शब्दों में नवीनता को प्रस्तुत करने वाला, अति शौकीन, क्रांतिकारी परिवर्तन करने का इच्छुक, उथल-पुथल मचाने वाला, बड़े परिवर्तन का इच्छुक, उन्नत लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक, अत्याचार अनाचार का धुरविरोधी, स्वच्छंद यौनाचारी अर्थात यौन क्रियाओं में विचित्र वासनापूर्ण (सामान्यतः विकृत मैथुन प्रवृत्ति वाला), चुम्बकीय आकर्षण क्षमता वाला, जिज्ञासु, सबके अंतर की बात सहज समझ लेने वाला, लुभावना, उतावला, दूसरों को प्रभावित करने की असीम क्षमता वाला, अपरंपरागत, शोधकर्ताओं जैसा बुद्धि वाला, सुन्दर दाँत और मोहक आँखों वाला, अति तीव्र, आवेगी, आत्मघाती स्वभाव का बनाता हैं।
प्रथम भाव के यूरेनस पर यदि शुभ प्रभाव हुआ तो जातक विलक्षण प्रतिभा का धनी, हँसमुख, अत्यंत आकर्षक, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अभिनय के क्षेत्र में सफल, राजनयिक, टेलीपैथी, हिप्नोटिज्म में निपुण, जादूगर, तांत्रिक, समाज सुधारक, बागी, इन्फ्लूएंसर, पर्यटक, खगोलशास्त्री, पुरातत्व प्रेमी, परमाणु आदि आधुनिक अस्त्र-शस्त्र का अन्वेषक आदि होता हैं।
प्रथम भाव में उपस्थित यूरेनस यदि पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो, जातक को pituitary gland, pineal gland, मोटर तंत्रिका तंत्र (Motor Nervous System), मस्तिष्क, उन्माद, पागलपन, हिस्टीरिया, चेहरे का लकवा, तेज दर्द, ऐंठन, अंगों में सुनापन (Numbness), झनझनाहट (Tingling), मतिभ्रम, अनियंत्रित यौन व्यवहार, यौन परपीड़न विकार (Sexual Sadism Disorder) जैसी विचित्र बिमारियांँ होती हैं। ऐसा जातक शौकिया अपराधी होने की ओर प्रवृत्त हो जाता हैं। अपराध करना, अप्राकृतिक यौन आचरण करना, समाजिक व्यवस्था को बार-बार चुनौती देना और इसके विरुद्ध भड़काऊ विचार रखने जैसी दोष जातक के चरित्र में देखी जा सकती हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में Neptune (वरुण) का फल || Neptune in the First House
प्राचीन पारंपरिक भारतीय ज्योतिष में Neptune (वरुण) का भी प्रत्यक्ष वर्णन नहीं मिलता हैं, कारण कि इसे भी 23 September 1946 को जर्मन खगोलशास्त्री Johann Gottfried Galle ने बर्लिन वेधशाला में पहली बार Neptune को देखा। रोमन पौराणिक कथाओं में Neptune समुद्र के देवता हैं। ग्रीक में इन्हें Poseidon कहा गया हैं। नेप्च्यून का रंग समुद्र जैसे नीले और रहस्यमय होने के कारण इसका नाम नेप्च्यून रखा गया।
इसी गुण के सामान होने से आधुनिक भारतीय ज्योतिष में इसे समुद्र अथवा जल के देवता के नाम पर वरुण ग्रह कहा जाने लगा। जैसे समुद्र अथवा जल के देवता वरुण अत्यंत रहस्यमय, छद्म, अपरिमित प्रभावशाली, जीवनधारा युक्त हैं; वैसे हीं नेप्च्यून भी सपने, भ्रम (illusion), कल्पना, अंतर्ज्ञान (intuition), आध्यात्मिकता, करुणा, रहस्यवाद, कला, संगीत, सिनेमा, जादू-टोना जैसी चीजें, धोखा, नशा, व्यसन, अस्पष्टता, आत्मप्रवंचना, पुरातन वस्तुएं, रत्न, रहस्यवादी धार्मिक समुह, Scam, सामुहिक नैतिक किन्तु bogus movements, socialism, communism, collectivism, fascism जैसी विचारधारा का कारक हैं।
कुंडली के प्रथम भाव में Neptune वरुण यदि शुभ ग्रहों के प्रभाव में बली अवस्था में हो तो जातक उन्नत ललाट वाला, भरी हुई ठंडी स्वप्निल आँखों वाला, शांत, रहस्यमय छवि वाला, सुन्दर दांत, मंद-मंद मुस्कुराने की आदत वाला, तरंग जैसे कोई नृत्य हों वैसे चलने वाला, कलात्मक, शीतल, मधुर किन्तु सीमाहीन व्यवहार करने वाला, दोहरे व्यक्तित्व वाला अर्थात जातक जैसा दिखता है वैसा होता नहीं, अपने मनोभावों को छुपाने में माहिर, कलात्मक और सृजनात्मक क्षेत्रों में नाम और धन प्राप्त करता हैं।
वहीं यदि कुंडली के प्रथम भाव में नेप्च्यून अशुभ ग्रहों से पीड़ित व दोषपूर्ण अवस्था में हो, तो जातक की सृजनात्मक क्षमता बाधित होती हैं। जातक व्यग्र, क्षोभित, निर्णय लेने में असमर्थ, आवेगी, अशांत, उपद्रवी, हुडदंगी, बखेड़िया, दंगैत हो जाता हैं। ऐसे में जातक अन्य व्यक्तियों के प्रभाव में जल्दी आ जाता हैं। भ्रम की अवस्था में वास्तविकता से दूर भागने की आदत होती हैं, व ऐसे में दिशाहीनता का शिकार हो जाता हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में Pluto (यम) का फल || Pluto in the First House
प्राचीन पारंपरिक भारतीय ज्योतिष में Pluto (यम) का भी प्रत्यक्ष वर्णन ज्योतिषिय संदर्भ में नहीं मिलता। कारण कि इसे 18 फरवरी 1930 को एक 24 वर्षीय अमरीकी खगोलशास्त्री Clyde William Tombaugh द्वारा खोजा गया, हालांकि फोटोग्राफिक प्लेट पर इसे 23 जनवरी 1930 को कैप्चर किया गया था। इसकी शुरूआती संकल्पना अमेरिकी खगोलशास्त्री Percival Lowell की हैं। 19वीं सदी के अंत में इन्होंने “Planet X” की भविष्यवाणी की थी, क्योंकि Uranus और Neptune की कक्षाओं में anomalies (विचलन) थे। इनकी मृत्यु के पश्चात 1929 में यह सर्च Clyde William Tombaugh को सौंपा गया। 13 मार्च 1930 को Lowell की जन्मतिथि और Uranus की खोज की सालगिरह पर, सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा हुई। रोमन पौराणिक कथाओं में Pluto Underworld (नरक) के देवता हैं, जिनके साथ इस पिंड का गुण जो कि ठंडा, दूर और अंधेरे में हैं, से मेल खाता हैं, साथ हीं Percival Lowell के नाम को दोनों शब्दों के प्रथम अक्षर P औरL को लेकर इस पिंड का नामकरण Pluto किया गया।
देर बाद 2006 में International Astronomical Union (IAU) ने Pluto को dwarf planet घोषित कर दिया, क्योंकि यह अपनी कक्षा साफ नहीं करता (Kuiper Belt object)। लेकिन आधुनिक पाश्चात्य ज्योतिष में इसका महत्व बरकरार है। भारतीय Neo Vedic ज्योतिषी भी इसे इसके गुणों के अनुरूप यम/यमराज के रूप में स्वीकार करते हैं। अतः प्लूटो को परिवर्तन, पुनर्जन्म, गहन शक्ति, रहस्य, नियंत्रण और क्रांतिकारी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
कुंडली के प्रथम भाव में Pluto (यम) यदि समान गुणों वाली राशियाँ यथा वृश्चिक आदि अथवा नक्षत्रों में स्थित होकर बली अवस्था में हों तो जातक छुपे हुए छवि के साथ अपने कार्य में लगनशील, प्रभावशाली, समय के साथ सबपर नियंत्रण करने को इच्छुक, रहस्यमय, बार-बार स्वयं को पुनर्स्थापित करने में दक्ष, विजयी होता हैं। ऐसे जातकों में बड़े संकटों से वापसी करने की अद्भुत क्षमता होती हैं। नेतृत्व, अनुसंधान, गहन अध्यात्म, या परिवर्तन से जुड़े क्षेत्रों (जैसे psychology, occult, transformation work में रुचि होती हैं। सामाजिक कार्यों या क्रांतिकारी बदलाव लाने की चाह रखता हैं। साथ हीं साथ अस्पष्ट मनोवृत्ति व असाध्य रोग होते हैं।
कुंडली के प्रथम भाव के Pluto (यम) पर नकारात्मक ग्रहों का प्रभाव व विपरीत गुण धर्मी राशियों अथवा नक्षत्रों में स्थित होने पर यह पीड़ित होकर जातक को अज्ञात भय, संकोच, एकाकीपन, कर्महीन, विजातीय, क्षोभित, ईर्ष्यालु, निर्दयता, हिंसात्मक, महात्वाकांक्षी बनाता हैं। साथ हीं साथ जातक को अकस्मात दुर्घटना, सर्जरी, मनोरोग, जुआ, सट्टा आदि की लत, संबंधों में क्रूरता आदि विकारों से पीड़ित करता है।
प्रथम भाव (लग्न) में कुछ विशिष्ट ग्रह योगों से उत्पन्न होने वाले कुछ विशिष्ट प्रभाव || Specific Effects Arising from Certain Planetary Combinations in the First House
1• कुंडली का प्रथम भाव अर्थात लग्न जितना अधिक सौम्य प्रभाव में हों, जातक उतना अधिक सुखी, सुभग, दीर्घायु, सर्वजन का प्रिय, सुन्दर, विनयशील, पवित्र आत्मा होता हैं।
सौम्य प्रभाव का तात्पर्य हैं कि—
(a) कुंडली का लग्नेश सौम्य ग्रह की राशि में हों,
(b) शुभ व सौम्य ग्रह लग्न में स्थित हों अथवा लग्न पर दृष्टिपात करें,
(c) लग्न स्पष्ट शुभ वा सौम्य ग्रह के वर्गों में हो, तो लग्न को सौम्य प्रभाव में माना जाता हैं।
Note:- शुभ ग्रहों की राशियाँ, सम राशियाँ, व शीर्षोदय राशियाँ— सौम्य मानी गईं हैं।
पाप व क्रूर ग्रहों की राशियाँ, विषम राशियाँ व पृष्ठोदय राशियाँ क्रूर मानी गईं हैं।
2• कुंडली का लग्नेश यदि लग्न में बली अवस्था में स्थित हों, तो जातक स्वस्थ, बलवान, पराक्रमी, मनस्वी, श्रेष्ठ होता हैं। जातक पृथ्वी को राजा की भांति भोगता हैं। परस्त्रीगमन भी करता हैं।
3• यदि लग्नेश वा कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी, केन्द्र (1,4,7,10 भाव में), धर्म त्रिकोण (1,5,9 भाव में) शुभ कारक ग्रहों के साथ अथवा इन ग्रहों से दृष्ट हों, तो ऐसा जातक अत्यंत यशस्वी व कीर्तिशाली होता हैं।
4• लग्न में यदि उदित बुध और गुरू की युति हों, अथवा लग्न के बुध पर गुरु की दृष्टि हो और ये ग्रह शुभ प्रभाव में बली अवस्था में हो तो जातक वाक्पटु, अत्यंत विद्वान, हँसमुख, सुन्दर, ललित कला का प्रेमी, सुन्दर मूर्ति होता हैं।
5• यदि बलवान दशमेश लग्न में हों, अथवा लग्नेश और दशमेश का परस्पर राशि परिवर्तन हों, और कोई अशुभ प्राभाव (युति/दृष्टि आदि) न हो, तो जातक स्वयं के पराक्रम से कीर्तिमान स्थापित करके विश्वविख्यात होता हैं।
6• लग्न पर दृष्टिपात करने वाला ग्रह, लग्नेश और लग्न में स्थित ग्रह— ये तीनों 6ठे, 8वे व 12वे भाव के स्वामी के प्रभाव में हों, तो दैहिक सुख नहीं होता, व जातक विभिन्न रोगों व दुर्घटनाओं का शिकार होता रहता हैं।
7• लग्न में यदि अग्नि तत्व (मेष, सिंह, धनु) की राशि हों, और उसमें अग्नि तत्व के हीं ग्रह बैठे हों, तो जातक रजोगुणी, पित्त प्रकृति, क्रोध और आक्रामक होता हैं। लग्न में यदि भूमि तत्व (वृषभ, कन्या, मकर) की राशि हों, और उसमें भूमि तत्व के हीं ग्रह विराजमान हों, तो जातक व्यवहार कुशल, चतुर, व्यवसायिक बुद्धि, प्रखर विद्वान होता हैं। लग्न में यदि वायु तत्व (मिथुन, तुला, कुंभ) की राशि हों, और वायु प्रधान ग्रह भी लग्न में स्थित हों तो, जातक वायुदोष से पीड़ित, चंचल, मनमौजी, मस्तमौला, फक्कड़ प्रवृत्ति का होता हैं, किन्तु अपने प्रभाव, आवेग व कठिन जीवटता से सफल होता हैं। लग्न में यदि जल तत्व (कर्क, वृश्चिक, मीन) की राशि हों, और जल तत्व के ग्रह भी लग्न में विराजमान हों, तो जातक कफ प्रकृति, शांत, सुन्दर, थुलथुले शरीर वाला, पुष्ट शरीरी होता हैं।
8• यदि लग्न व लग्नेश शत्रु ग्रहों के मध्य हों, अर्थात द्वितीय और द्वादश भाव में लग्नेश के शत्रु ग्रह हों, अथवा लग्नेश दो शत्रु ग्रहों के मध्य हों, तो ऐसा जातक आजीवन शत्रुओं, दुर्घटनाओं, व्याधियों से घिरा रहता हैं; व अकारण भयभीत होता रहता हैं।
9• लग्न में मंगल और राहु अथवा शनि और राहु की युति हो, तो जातक को यौनांग संबंधी रोग होते हैं। कभी-कभी यौन मनोरोग भी होते हैं।
10• यदि लग्न में राहु या केतु हो और लग्नेश 6ठे, 8वे या 12वें भाव में स्थित हों, तो जातक के शरीर में कठोर आघात से चिह्न/निशान होता हैं।
उपसंहार || Important Considerations
इस प्रकार स्पष्ट हैं कि कुंडली का प्रथम भाव अर्थात लग्न, कुंडली का मूल स्तंभ हैं। लग्न के शुद्ध होने से हीं कुंडली के सभी भावों के शुद्धि व स्वस्थ भावेशों का निर्धारण संभव हैं, जिससे जीवन के समस्त शुभाशुभ का निर्धारण काल के सूक्ष्मतम सीमा तक की जा सकती हैं।
बलवान प्रथम भाव व लग्नेश विपरीत परिस्थितियों में भी उबरने, स्वयं को पुनर्स्थापित करने व सदा-सर्वदा विजयी बनाने के लिए समर्थ होता हैं। वहीं बलहीन प्रथम भाव व लग्नेश जीवन में अकारण संघर्ष, दुर्घटना, व्याधियांँ व कष्ट से कुंडली के अन्य राजयोगों को भी कम करके मध्यम जीवन जीने पर विवश कर देता हैं।
Note :- प्रथम भाव में उपरोक्त स्थित ग्रहों के ये फल भाव स्थिति आधारित हैं व योगों की व्याख्या सीमित हैं। भावों में इनकी (इन ग्रहों की) उपस्थिति किन राशियों, नक्षत्रों, नक्षत्र चरणों व अंशों में हैं, इससे इन ग्रहों के फलों में व्यापक भिन्नता देखने को मिलती हैं। ठोस दृष्टि से भिन्न जातकों की कुंडली में उपस्थित ग्रहों के एक समान भावों में उपस्थिति दिखने पर भी, राशियों, नक्षत्रों, नक्षत्र चरणों व अंशों के अन्तर से ग्रह स्थितियांँ भिन्न-भिन्न हैं, इसी कारण से सृष्टि के प्रत्येक जीव की कुंडली, कर्म, प्रारब्ध भिन्न-भिन्न हैं। अतः व्यक्तिगत जन्मकुंडली विश्लेषण हेतु किसी प्रबुद्ध ज्योतिषी से मार्गदर्शन अनिवार्य हैं।
~ Krishna Pandit Ojha
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